बिना ठोस रणनीति आसान नहीं, बांग्लादेशी घुसपैठियों को भगाना

जागरूक टाइम्स 170 Jul 31, 2018

बांग्लादेशी घुसपैठिये पिछले दो दशकों से भारतीय राजनीति में एक जोरदार मुद्दा बने हुए हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जैसे ही कोई चुनावी मौसम आता है, यह मुद्दा गर्म होकर आसमान छूने लगता है। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म हो जाता है, वैसे ही यह मुद्दा हमारी तमाम प्राथमिकताओं से कुछ इस तरह से गायब हो जाता है, जैसे गधे के सिर से सींग।

सवाल है क्या इतने लापरवाह अंदाज से हिंदुस्तान अवैध घुसपैठियों से निपट सकता है। इस बार मुद्दा रोहिंग्या का नहीं, असम में अवैध घुसपैठ किए बांग्लादेशियों का है, जिसे वापस लेने के सवाल पर ढाका में चुप्पी है। चुप्पी हो भी क्यों नहीं, पिछले चार वर्षों में शीर्ष स्तर पर कभी यह मुद्दा भारत ने बांग्लादेश से छेड़ा ही नहीं। अब जबकि असम में रविवार से भय व्यापा हुआ है; क्योंकि सूबे के सात जिलों-दारांग, बारपेटा, डीमा हासो, सोनितपुर करीमगंज, गोलाघाट और धुबरी में निषेधाज्ञा लागू है।

इस स्थिति पर न तो अब बांग्लादेश का मीडिया रिएक्ट कर रहा है, न वहां की सरकार। असम में जिन इलाकों में चिंता का सबब है, वो हैं बंगाली मुस्लिम इलाके। उन जगहों पर ऐसी अफवाह को हवा दी गई है कि जो लोग एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन) की अंतिम सूची में नहीं हैं, उन्हें कैंपों में रखा जाएगा। हालांकि रविवार को मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि ऐसे लोग अपने घरों में रहेंगे और जिनके नाम किन्हीं वजहों से छूट गए हैं, उसे शामिल करने का अवसर मिलेगा। यह दिलचस्प है कि जो बांग्लादेशी हिंदू सीमा पार से आए हैं, उनमें किसी तरह की घबराहट नहीं दिख रही है। बांग्लादेश से सीमा पार करके भारत में बसने वाले हिंदुओं की संख्या भी कम नहीं है। मगर, हम यह भी नहीं कह सकते कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान की तरह बांग्लादेश से हिंदुओं का वहां से सफाया हो गया। 1971 के युद्ध से पहले 18.50 फीसदी हिंदू पूर्वी पाकिस्तान में थे।

1974 में बांग्लादेश में पहली जनगणना हुई, तो 13.50 प्रतिशत हिंदू वहां रह गए थे। 2015 में 10.7 प्रतिशत हिंदुओं की संख्या बांग्लादेश में बताई गई है। इनका केंद्र गोपालपुर, दीनाजपुर, सिलहट, सुनामगंज, खुलना, मयमनसेन, जैसोर, चिटगांव और ढाका जैसे शहरों में है। जिस बात का डर है, वो ये है कि जैसे ही बांग्लादेशी मुसलमानों की वतन वापसी का मुद्दा परवान चढ़ेगा, एक बार फिर से वहां के रूढिवादी हिंदुओं पर कहर बरपाएंगे। दोनों देशों की सरकारें इस पर गौर नहीं करके मूल समस्या से मुंह चुरा रही हैं। सबसे अधिक ऊहापोह 24 मार्च 1971 वाले ‘कट ऑफ डेट’ को लेकर रहा है। 1985 में असम समझौता राजीव गांधी की सरकार और ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के बीच हुआ था, जिसमें विदेशियों को सूबे से बाहर करने का संकल्प लिया गया था। मगर, राज्य सरकार विदेशियों की निशानदेही में विफल रही थी। 2005 में तरूण गोगोई की सरकार, केंद्र सरकार और आसू के बीच एक बार फिर त्रिपक्षीय समझौता हुआ और यह तय हुआ कि 1951 में जो पहली जनगणना हुई थी, उसे आधार मानकर ‘एनआरसी’ को अद्यतन (अपडेट) किया जाए।

तत्कालीन गोगोई सरकार ने कुछ जिलों में राष्ट्रीय नागरिक पंजीयन (एनआरसी) पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया, मगर दंगा-फसाद के कारण यह लटक सा गया। जुलाई 2009 में असम पब्लिक वक्र्स (एपीडब्ल्यू) नामक एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी कि असम से बांग्लादेशियों की पहचान और उन्हें बाहर करने के वास्ते सूची तैयार की जाए। यह ध्यान में रखने की बात है कि राष्ट्रीय नागरिक पंजी. (एनआरसी) ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद मई 2015 से अपडेट करने का काम आरंभ कर दिया था। उसके लिए असम भर से 68 लाख 27 हजार परिवारों ने आवेदन किया।

एनआरसी सेवा केंद्रों को इससे संबंधित साढ़े छह करोड़ दस्तावेज मिले, जिसकी सही से पुष्टि के बाद सूची को प्रकाशित करनी थी। अब यह बात समझ से बाहर है कि एक परिवार ने दस्तावेज जमा किया, तो कहीं दो सदस्यों के नाम हैं, तो बाकी चार के गायब हैं। कहीं पत्नी है, तो पति नहीं, बाप है, तो बेटा नहीं। यह पूरी सूची ही गड़बड़झाले से ग्रस्त है। उसके बाद भी असम बीजेपी श्रेय लेने के लिए उछल-कूद कर रही है। एनआरसी सेवा केंद्रों में आवेदन लेने की प्रक्रिया मई 2015 में प्रारंभ होती है, उस समय सूबे में तरूण गोगोई की सरकार थी। असम में बीजेपी की सरकार उसके साल भर बाद मई 2016 में आती है, तो इसमें क्रेडिट लेने वाली कौन सी बात हो गई। सवालों के घेरे में पूरी प्रक्रिया है। विवादों से परे ‘फुल प्रूफ सूची’ तैयार करने में जाने कितने साल और लगेंगे आलोचक पूछते हैं, इसमें 32 साल लगे, तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है। विवाद के केंद्र में बांग्लादेशी नागरिक हैं, क्या उन्हें वतन वापस भेजना इतना आसान है।

देश में विपक्ष भी सरकार से सवाल नहीं कर रहा। एनआरसी की पहली सूची के प्रकाशन के दूसरे दिन ढाका में अवामी लीग के महासचिव ओवैदुल कादर की टिप्पणी को ध्यान से समझना चाहिए। कादर ने कहा था ‘हम इससे अवगत हैं कि असम सरकार अवैध बांग्लादेशियों की सूची तैयार कर रही है। अगर कोई समस्या खड़ी होती है, तो हम नई दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार से बात करेंगे।’ अवामी लीग के महासचिव ओवैदुल कादर के इस वक्तव्य का क्या मतलब निकालें सीधी सी बात है, अब तक केंद्र सरकार ने बांग्लादेश से वापसी वाले फार्मूले पर बात नहीं की है। एनआरसी सूची सिर्फ असम में तैयार हो रही है, जबकि बांग्लादेशी घुसपैठिये दिल्ली और देश के दक्षिणी हिस्से तक बिखरे पड़े हैं। असम के पड़ोसी राज्यों में अलर्ट है कि कोई बांग्लादेशी वहां से निकलकर उनके यहां न बस जाए। मगर, राज्यों के बीच खुली सीमा और घने जंगलों का फायदा घुसपैठिये उठा ही लेते हैं। केंद्र सरकार के पास कोई समग्र योजना नहीं दिखती कि घुसपैठ किए बांग्लादेशियों की पूरे देश में निशानदेही कर, उन्हें वापस उनके वतन कैसे भेजे जाएं। एक स्थिति में पहुंचकर यह कोशिश सिर्फ चुनावी नारा और हिंदू वोट बैंक को मजबूत करने की कवायद भर क्यों दिखने लगती है, इस सवाल पर विचार होना चाहिए।


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