
महाराज शरणानंद जी ने कहा कि वचनाराम राठौड़ द्वारा चार वर्ष का उपासना कर केवल पानी पर जीवित रहना साइंस के लिए एक चैलेंज है। स्थानीय सोजत पूरणेश्वर धाम में चल रही गोविंद गिरी महाराज द्वारा श्रीमद्भागवत कथा में वचनाराम राठौड़ को शरणानंद जी महाराज द्वारा काषाय वस्त्र पहनाकर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ गोविंद गिरी महाराज की साक्षी में वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करवाया। शरणानंद जी ने कहा वचनाराम जी से प्रश्न– करने पर उन्होंने जो उत्तर दिया वो नाथ सम्प्रदाय के रहस्य से प्रस्फुटित हैं वानप्रस्थ के लिए भागवत में नियम हैं कि वह वन में भी जा सकता है घर में भी रह सकता है। सच्चा साधु जब प्रयास करता तो उस परिधी में रहने वाले सभी -को लाभ मिलता है उनकी सेवा करनेवालाको भी मिलता है। शरणानंद जी महाराज ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ 4 वर्ष से उपासना कर रहे वचनाराम राठौड को वानप्रस्थ की दीक्षा दी।शरंणानंद जी महाराज ने कहा कि जीव पर चार ऋण देव ऋण ऋषि ऋण पित ऋण समाज ऋण इसे संस्कृत में उऋण कहते है मैं समाज में हूँ। पितरो ने जन्म दिया, देवताओं ने अन्न जल दिया ऋषियों ने हमें ज्ञान दिया है। समाज में अंतिम श्वास तक हमें बहुत कुछ मिला है यह ऋण हमें चुकाना हैगायत्री का अनुष्ठान से संध्या करना त्रैवर्णिक के लिए आवश्यक कर्तव्य है । समाज की सेवा भी प्रत्येक मनुष्य का कर्म हैं।विधि विधान से पत्नी के साथ संतति उत्पन्न करना भी ऋण है। जो उपलब्धि हमे मिली हैं उसे देवताओं एवं राष्ट्र तथा समाज को दे यह ऋण अदा करने का तरीका है। पठन पाठन परंपरा से शिष्य उत्पन्न करना इसका ध्येय । उत्तमन एवं अधमन में से उत्तमन श्रेष्ठ कर्तव्य है धर्म करके सद्गुण पूर्वक प्रयास करना मनुष्य का कर्तव्य है अर्थ का उपयोग अनर्थ के लिएनहीं होना चाहिए। चार पुरषार्थ धर्म अर्थ काम एवं मोक्ष के लिए विधिवत कार्य होना चाहिए।.कथा व्यास गोविन्द गिरी जी ने भागवत कथा पूर्णाहुति में विभिन्न पात्रों के प्रसंग सुनाएं जिसमें श्री कृष्ण के पुत्र सांब को यादवों द्वारा साड़ी पहनाकर ऋषियों” से मजाक करके पेट में लड़का है या लड़की पर ऋषियों ने शाप दिया । राजा निमी का प्रसंग सुनाया देवताओ ने भगवान को अन्तर्ध्यान होने का आग्रह किया । दतात्रेय प्रभु का ज्ञान पृथ्वी से सहनशीलता आकाश से व्यापकता जल से तृप्तता एवं माधुर्य,सूर्य से मधुर प्रतिक्रिया कबूतर से प्रेन से च्युत हो जाए ऐसा सागर ,पतंगे से भी सीख ली। यदुवंश के पतन की पूर्व सूचना पर बलराम के समुद्र में समाधिस्थ होने एवं प्रभास क्षेत्र में जरा नामक व्याध द्वारा 125 वर्ष की अवस्था में श्रीकृष्ण के पावो में तीर मारने का प्रसंग सुनाया गया। भगवान श्री कृष्ण ने जरा को कहा यह नियति है तुम दुःख मत करो और भगवान विमान में बैठकर अन्त्तध्यर्धान हो गए। भगवान आगे चलकर बुद्ध एवं कल्कि के रूप में आएंगे । उन्होंने कहा कि चारो युग सतयुग, त्रेता युग द्वापर युग,, कलयुग क्रमशः आते रहते है। परीक्षित को तक्षक द्वारा डंसने के बाद परीक्षित के पुत्र जनमेजय द्वारा सर्प यज्ञ किया गया जिसमें नागों को मरते देखकर बाद में ऋषि ने उन्हें रोका। कथा समापन के बाद पत्रकारों एवं कार्यकर्ताओं का सम्मान किया गया।शास्त्रों की विवेचना की रमण रेती से आए शरणानंद जी महाराज ने बताया कि मीमांसा शास्त्र में लिखा है विद्यादान श्रेष्ठ है। वानप्रस्थ के लिए तपस्या बहुत आवश्यक है समापन पर इच्छा पूर्ण बालाजी मंदिर के महंत नृसिंह दास जी महाराज, भीमराज भाटी, नैनाराम निकुंम, बाबुलाल,मदन पंवार, जुगल किशोर निकुंम,नरपत सोलंकी, राकेश पंवार,तरुण सोलंकी,श्याम लाल, राणाराम,सुजाराम, सुरेश कुमार, मोहनलाल सहित बड़ी संख्या में गणमान्य जन उपस्थित थे । संचालन ओम आचार्य ने किया। वहीं व्यास पीठ पर ओम जय जगदीश हरे की आरती के बाद मंदिर के पास प्रांगण में आम प्रसादी का शहर वासियों ने पुण्य लाभ लिया।
रिपोर्ट – बाबूलाल पंवार
