
राजसमंद (Rajsamand) कुंभलगढ़ महोत्सव में राजस्थान की ताल और लोक-परंपरा एक बार फिर अपने शानदार अंदाज में नजर आई। अ ड्रम ओडिसी फ्रॉम राजस्थान नाम से आयोजित विशेष नगाड़ा कॉन्सर्ट के दौरान नगाड़ों की थाप ने स्पष्ट संदेश दिया कि राजस्थान का लोक-संगीत आज भी उतना ही जीवंत और असरदार है जितना सदियों पहले था।कार्यक्रम की शुरुआत तेज़ और दमदार नगाड़ों की थाप से हुई। राजस्थान का नागाड़ा जो शौर्य, उत्सव और परंपरा का प्रतीक माना जाता है इस प्रस्तुति का मुख्य आकर्षण रहा।थापों की गूंज किले की विशाल दीवारों से टकराकर एक ऐसा माहौल बना रही थी कुंभलगढ़ महोत्सव की विजय घोष किया जा रहा हो। 21 कलाकार—ताल, सुर और नृत्य का संगममंच पर कुल 21 कलाकारों ने मिलकर प्रस्तुति दी। इनमें प्रमुख नगाड़ा वादक,लोक-गायक,पारंपरिक नृत्यांगनाएं, और अंतरराष्ट्रीय संगीतकार शामिल थे। सभी कलाकारों ने मिलकर ढोल, नगाड़ा, भपो, चंग और लोक-नृत्य की लय को इस तरह पिरोया कि दर्शक केवल सुन ही नहीं रहे थे, बल्कि ताल को महसूस भी कर रहे थे। घूमर और लोक-नृत्य की भंगिमाओं ने प्रस्तुति को और रंगीन बना दिया।वैश्विक मंचों पर अपनी पहचान बना चुके कलाकारइस प्रस्तुति की खासियत यह रही कि इसमें शामिल अधिकांश कलाकार देश–विदेश के बड़े आयोजनों में अपनी प्रतिभा दिखा चुके हैं। ये कलाकार इससे पहले जी- 20 शेरपा समिट (रणकपुर), मोमासर उत्सव, पुष्कर मेला, हवा महल फेस्टिवल (जयपुर) में प्रदर्शन कर चुके हैं।कुंभलगढ़ में इन्हीं अनुभवी कलाकारों ने एक बार फिर अपनी धुनों से दर्शकों को बांधे रखा।राजस्थान के पारंपरिक वाद्यों और विदेशी संगीतकारों के आधुनिक बीट्स के मेल ने ऐसा फ्यूज़न तैयार किया जिसने परंपरा में नई ऊर्जा भर दी। यह प्रस्तुति बताती है कि राजस्थान का लोक-संगीत समय के साथ नए रूप अपनाते हुए भी अपनी मूल आत्मा को संजोए हुए है।अ ड्रम ओडिसी फ्रॉम राजस्थान ने साबित किया कि राजस्थान का लोक-संगीत और ताल परंपरा न केवल क्षेत्र की पहचान है, बल्कि वैश्विक दर्शकों को भी अपनी ओर खींचने की क्षमता रखती है। कुंभलगढ़ महोत्सव में हुआ यह कॉन्सर्ट राजस्थान की वही सांस्कृतिक धड़कन है, जो समय बदलने के बावजूद आज भी उतनी ही असरदार और जीवंत है।
रिपोर्ट – नरेंद्र सिंह खंगारोत
