राजसमंद (Rajsamand) कोहरे से लिपटे मार्ग पर करीब 14 कि.मी. का विहार कर तबीजी पहुंचे आचार्य श्री महाश्रमण जीवन में सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति के महत्त्व को आचार्यश्री ने किया व्याख्यायित जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्यश्री महाश्रमण जनकल्याण अबाध रूप से निरंतर गतिमान हैं। भयंकर सर्दी के मौसम में भी आचार्यश्री महाश्रमण प्रतिदिन प्रायः 15 किलोमीटर से अधिक की पदयात्रा कर रहे हैं। तेरापंथ धर्मसंघ के कार्यकर्ता राजकुमार दक ने बताया कि मंगलवार को प्रातःकाल आचार्यश्री महाश्रमण अपनी धवल सेना के साथ अगले गंतव्य की ओर बढ़े तो पूरा विहार मार्ग मानों कोहरे की चार में लिपटा हुआ था। बाहर में जो लोग दिखाई दे रहे थे, वे या तो गर्म कपड़ों से पूरे शरीर को ढंके हुए नजर आ रहे थे या स्थान-स्थान पर अपने ढंग से आग आदि के माध्यम से शरीर को सर्दी से बचाने का प्रयास करते दिखाई दे रहे थे। ऐसे में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जनकल्याण के गतिमान थे। आचार्यश्री की आध्यात्मिक ऊर्जा के समक्ष कोहरा और सर्द हवाएं भी मानों प्रणत थीं। आचार्यश्री लगभग 14 किलोमीटर का विहार कर तबीजी में स्थित कच्छावा रिसोर्ट में पधारे। रिसोर्ट परिसर में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण ने उपस्थित जनता को पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि हम अपनी यात्रा में सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की बात बताया करते हैं। विभिन्न जाति, धर्म, संप्रदाय, राजनैतिक दल, विचार भिन्न आदि के होने के बाद भी आदमी को सभी प्रति सद्भावना रखन का प्रयास करना चाहिए, हिंसा, मारकाट, हिंसा हत्या में नहीं जाना- ये सद्भावना की बात होती है। दूसरी बात है-नैतिकता अर्थात् ईमानदारी। आदमी को अपने जीवन में ईमानदारी रखने का प्रयास करना चाहिए। कोई भी कार्य करें, जहां भी रहें, वहां ईमानदारी रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को छल-कपट, चोरी और झूठ आदि से बचने का प्रयास करना चाहिए। सच्चाई व ईमानदारी के रास्ते पर चलना तो कठिनाइयों से भरा हो सकता है, लेकिन आदमी को थोड़ी कठिनाई तो भले हो जाए तो भी आदमी को ईमानदारी के पथ को नहीं छोड़ना चाहिए। ईमानदारी का मार्ग कई बार कष्टप्रद हो सकता है, किन्तु उसकी आगे की मंजिल अच्छी हो सकती है। इसलिए आदमी को ईमानदारी के पथ पर ही आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। जो आदमी झूठ बोलने वाला होता है, वह अपना भरोसा खो देता है। उससे लोगों का भरोसा उठ जाता है। ईमानदारी और सच्चाई के राह पर चलने वालों की गति भी अच्छी हो सकती है और लोग ईमानदारी आदमी पर भरोसा भी करते हैं। मानव जीवन प्राप्त कर आदमी मोक्ष की गति की साधना भी करने का प्रयास करना चाहिए। मोक्ष की प्राप्ति मनुष्य जीवन के बाद ही होती है। किसी अन्य जन्म या योनि से मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं होती। इसलिए चौरासी लाख जीव योनियों में मानव जन्म प्राप्त हो जाना भी दुर्लभ बात है। इसलिए इस मानव जीवन का आदमी को लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए। अन्य गतियों में तो कोई भी आ सकता है, किन्तु मोक्ष गति में केवल मनुष्य ही जा सकता है। इसलिए इस मनुष्य जीवन में ईमानदारी व सच्चाई के राह पर चलने में थोड़ी कठिनाई हो तो हो, लेकिन सच्चाई, ईमानदारी के मार्ग पर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
रिपोर्ट – नरेंद्र सिंह खंगारोत
