जैसलमेर (Jaisalmer) जिले के सुनहरे धोरों के बीच, जहाँ पानी की एक-एक बूंद अमृत के समान है, वहाँ 211 साल पहले एक परिवार ने जनहित का ऐसा बीज बोया जिसकी छाया आज भी जनमानस और मवेशियों को शीतलता दे रही है। यह कहानी है बांधा गांव की और अचलदास डांगरा परिवार के उन पूर्वजों की, जिन्होंने अपनी संपत्ति और समर्पण से समाज का गला तर किया।मर्यादा और सम्मान का प्रतीक:रियासत काल में हर किसी को निर्माण की अनुमति नहीं मिलती थी। तत्कालीन महाराजा द्वारा अचलदास डांगरा परिवार के पूर्वजों को ‘गिरधारी की तलाई’ बनाने की विशेष अनुमति देना इस बात का प्रमाण है कि यह परिवार रियासत के सबसे प्रतिष्ठित और विश्वसनीय परिवारों में से एक था। जैसलमेर के आधिकारिक पर्यटन पोर्टल पर यहाँ की जल संरक्षण परंपराओं की महत्ता को समझा जा सकता है।बंदील: प्रतिष्ठा का आभूषण:इतिहास गवाह है कि रियासत काल में ‘बंदील’ (शाही पगड़ी/पोशाक का हिस्सा) पहनने का अधिकार केवल उन खास लोगों को था जिन्होंने समाज के प्रति असाधारण योगदान दिया हो। डांगरा परिवार को मिला यह सम्मान उनके पूर्वजों के सामजिक कद और महाराजा के साथ उनके गहरे संबंधों को दर्शाता है।आज भी जीवित है सेवा भावना:211 वर्षों बाद भी ‘गिरधारी की तलाई’ में वर्षा का जल एकत्रित होता है। जब आधुनिक तकनीकें विफल हो जाती हैं, तब पूर्वजों द्वारा निर्मित यह पारंपरिक जल स्रोत आज भी ग्रामीणों और बेजुबान मवेशियों का सहारा बना हुआ है। यह तलाई केवल एक जल संरचना नहीं, बल्कि डांगरा परिवार की ‘परोपकार परमो धर्मः’ की जीवित मिसाल है।फोटो रियासत काल में अचलदास डांगरा परिवार के पूर्वजों द्वारा बनवायी गई ‘गिरधारी की तलाई’ का दृश्य 2.जैसलमेर की शाही पगड़ी बंदील धारण किये अचलदास डांगरा।
रिपोर्ट – कपिल डांगरा
