बाड़मेर (Barmer) राजकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय बाड़मेर के विद्यार्थियों ने पेट्रोल की गुणवत्ता में सुधार एवं खपत में कमी लाने के लिए बायोइथेनॉल के उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण परीक्षण किया है। उन्होंने मेम्ब्रेन टेक्नोलॉजी के तहत विभिन्न प्रकार की झिल्लियांे का संश्लेषण किया है, जिसका उपयोग इथेनॉल एवं जल के मिश्रण से 99.5 फीसदी इथेनॉल को अलग करने के लिए किया जा सकता है। इससे ऊर्जा क्षेत्र में नई उम्मीद जगी है। मौजूदा समय में इथेनॉल के उत्पादन के लिए सामान्य डिस्टिलेशन का इस्तेमाल किया जाता है। कॉलेज प्रशासन और छात्रों के अनुसार आगामी समय में इस परीक्षण को वृहद स्तर पर किया जाएगा,ताकि व्यावहारिक उपयोग की संभावनाओं का पता लगाया जा सके।प्राचार्य डॉ संदीप रांकावत ने बताया कि मौजूदा समय में इंडस्ट्रियल बायोइथेनॉल सेपरेशन की तरफ मेम्ब्रेन टेक्नोलॉजी पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। राजकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ डा.पी.के.बर्नवाल के निर्देशन मंे कुछ समय पूर्व राहुल सुथार एवं प्रोजेक्ट टीम ने मेम्ब्रेन डिस्टिलेशन और परवेपोरेशन को इथेनॉल से पानी को अलग करने असरदार तरीका बताया है। यह एक थर्मली-इंड्यूस्ड प्रोसेस है, जिसका इस्तेमाल फ़ीड मिक्सचर से ज़रूरी चीज़ों को फिजिकली अलग करने के लिए किया जाता है। इस टीम मंे राहुल सुथार के साथ कशिश त्रिवेदी,प्रेम,चैतन्य,गौरव शामिल रहे। प्राचार्य डॉ संदीप रांकावत के मुताबिक बायो एथेनॉल एक सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल वैकल्पिक ईंधन है। जो हाल ही में कई देशों में एक सस्टेनेबल एनर्जी रिसोर्स के रूप में उभरा है। उनके मुताबिक यह परीक्षण केमिकल और पेट्रोलियम इंजीनियरिंग विभाग के छात्रों की टीम ने किया है। इसमें इथेनॉल को पेट्रोल में मिक्स करने से उसकी गुणवत्ता में सुधार होने के साथ खपत में कमी आती है। इसके परिणाम में प्रदर्शन में सुधार, कम उत्सर्जन और बेहतर दक्षता जैसे सकारात्मक पहलू सामने आए है। कॉलेज के प्राचार्य डा.संदीप रांकावत के मुताबिक इंजीनियरिंग छात्रों का यह प्रयास नवाचार का उदाहरण है। बाड़मेर जैसे क्षेत्र में तेल संसाधनों की मौजूदगी के बावजूद नवीकरणीय ऊर्जा पर फोकस जरूरी है। बड़े स्तर के परीक्षण से हम इंडस्ट्री और सरकार के साथ सहयोग बढ़ाएंगे। यह पहल भारत की आत्मनिर्भर ऊर्जा और नेट जीरो लक्ष्य (2070) की दिशा में युवा पीढ़ी के योगदान को दर्शाती है। राजकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय इंजीनियरिंग ब्रांच के प्रभारी डा.पी.के.बर्नवाल के मुताबिक भारत जैसे देश में जहां कच्चे तेल का 85 फीसदी से अधिक आयात होता है। इथेनॉल गन्ना, मक्का और चावल जैसी फसलों से बनता है, जो नवीकरणीय स्रोत है। इसे पेट्रोल में मिलाकर इस्तेमाल करने से कई फायदे होते हैं। यह पर्यावरण अनुकूल होने के साथ इसके जलने पर कम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन होता है, जिससे प्रदूषण कम होता है। उनके मुताबिक इससे आयात पर निर्भरता कम होने के साथ विदेशी तेल पर खर्च होने वाली मुद्रा की बचत होगी। इसके अलाव फसल आधारित उत्पादन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होने के साथ किसानांे को आर्थिक संबल मिलेगा। भारत सरकार ने 2025 में ही 20 फीसदी ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल कर लिया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इथेनॉल को बढ़ावा देने के लिए इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम और फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स को प्रोत्साहन दिया है। छात्रों का कहना है कि यह प्रयोग देश की ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम है। इधर, विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे स्थानीय प्रयोग राष्ट्रीय स्तर पर इथेनॉल अपनाने को गति दे सकते हैं। दुनिया भर में इथेनॉल की खपत और उत्पादन के लिहाज से संयुक्त राज्य अमेरिका 29 फीसदी इस्तेमाल करता है। जबकि भारत में इसकी खपत महज दो फीसदी है। फिलहाल इंजीनियरिंग छात्रों के इस परीक्षण से ऊर्जा क्षेत्र में नई उम्मीद जगी है।*अभी तक आसवन प्रक्रिया का इस्तेमालः* पेट्रोल की गुणवत्ता में सुधार एवं खपत में कमी लाने के लिए बायोइथेनॉल के उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण परीक्षण किया गया है। एथेनॉल और पानी के जलीय मिश्रण से एथेनॉल को अलग करने के लिए अधिकतर आसवन प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है, लेकिन इस मामले में एथेनॉल को अलग करने के लिए एक अलग झिल्ली का संश्लेषण किया गया है। एथेनॉल को अलग करने के लिए झिल्ली के संश्लेषण में एक गैर-हानिकारक विलायक, डाइमिथाइल सल्फोक्साइड (डीएमएसओ) का उपयोग किया गया है। मेम्ब्रेन टेक्नोलॉजी के तहत विभिन्न प्रकार की झिल्लियांे का संश्लेषण किया है, जिसका उपयोग इथेनॉल एवं जल के मिश्रण से 99.5 फीसदी इथेनॉल को अलग करने के लिए किया जा सकता है। मौजूदा समय में इथेनॉल के उत्पादन के लिए सामान्य डिस्टिलेशन का इस्तेमाल किया जाता है।
रिपोर्ट – ठाकराराम मेघवाल
