बाड़मेर (Barmer) वेदांता ग्रुप द्वारा प्रस्तुत जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) 2026 का पहला दिन थार रेगिस्तान की सौंधी माटी की महक, क्षेत्रीय भाषाओं की डिजिटल ऊर्जा और थार की महिलाओं की अनमोल कारीगरी से पूरी तरह रंग-बिरंगा हो उठा। होटल क्लार्क्स अमेर के लॉन और अनिल अग्रवाल फाउंडेशन (AAF) बागान में फैला यह उत्सव साहित्य, संस्कृति, सशक्तिकरण और सतत विकास का अनूठा संगम बन गया। फेस्टिवल में सबसे पहले सुर्खियां बटोरीं थार आर्टिसन प्रोड्यूसर कंपनी की महिलाओं द्वारा हाथ से तैयार किए गए अजरख प्रिंट के उत्पादों ने। केयर्न वेदांता के बाड़मेर ऑयल फील्ड्स के आसपास की ग्रामीण बहनों ने प्राकृतिक रंगों और सदियों पुरानी पारंपरिक ब्लॉक प्रिंटिंग तकनीक से दुपट्टे, कुर्ते, स्कार्फ और होम डेकोर आइटम्स बनाए हैं, जो हिंद और सिंध की साझा सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत पैटर्नों में दर्शाते हैं। ये उत्पाद इतने खूबसूरत और अर्थफुल हैं कि Gen Z मेहमानों ने इन्हें ट्रेंडी फैशन के रूप में जमकर खरीदा, जबकि विदेशी साहित्य प्रेमियों ने इन्हें स्मृति-चिह्न के तौर पर संग्रहित किया। ये कारीगरी न केवल फैशन का बयान है, बल्कि थार की मेहनती महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन, सशक्तिकरण और सांस्कृतिक संरक्षण की जीती-जागती मिसाल भी है।इसके बाद मेहमानों का ध्यान खींचा जीजी बाई बाजरे की मिलेट कुकीज़ ने, जो थार की मिट्टी और परंपरा से प्रेरित हैं। केयर्न वेदांता के बाड़मेर ऑयल फील्ड्स के आसपास की ग्रामीण महिलाओं द्वारा जीजीबाई स्वयं सहायता समूह आदर्श दुंधा के तहत तैयार की गई ये कुकीज़ 100% बाजरा, गुड़ और देसी घी से बनी हैं, पूरी तरह ग्लूटेन-फ्री, लो-ग्लाइसेमिक और स्वास्थ्यवर्धक स्नैक विकल्प हैं। मेहमानों ने इन्हें चखते ही तारीफों के पुल बांधे और कहा कि “ये तो असली माटी की महक है”, स्टॉल पर लगातार भीड़ रही और कई लोगों ने पैकेट भरकर घर ले जाने की जिद की। ये कुकीज़ राजस्थान की मिलेट संस्कृति को नई पीढ़ी और वैश्विक मेहमानों तक पहुंचाने का बेहतरीन माध्यम साबित हुईं।AAF बागान में आयोजित मुख्य सत्र “माटी की महक” ने हिंदी, राजस्थानी, असमिया, बंगाली और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के डिजिटल युग में पुनर्जागरण पर गहन और प्रेरणादायक चर्चा की। सत्र के संचालक अयोध्या प्रसाद ने कहा कि हमारी जड़ें और माटी की महक ही हमें डिजिटल चुनौतियों से बचाएंगी और सोशल मीडिया ने स्थानीय कहानियों को वैश्विक आवाज दी है। साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता गजे सिंह राजपुरोहित ने बताया कि राजस्थानी की वीर गाथाएं, लोककथाएं और डिंगल-पिंगल परंपरा अब यूट्यूब, इंस्टाग्राम रील्स और सोशल मीडिया क्रिएटर्स के जरिए नई पीढ़ी तक तेजी से पहुंच रही है। डॉ. हरिदास व्यास ने हिंदी साहित्य में ब्लॉग्स, यूट्यूब चैनल्स और इंस्टाग्राम पोएट्री कम्युनिटीज़ की क्रांतिकारी भूमिका पर जोर दिया, जबकि पारोमिता नाग ने उत्तर-पूर्व में Gen Z द्वारा रील्स, वीडियो स्टोरीटेलिंग और ऑनलाइन कम्युनिटीज़ से असमिया-बंगाली भाषाओं को नया जोश मिलने की बात साझा की। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि मातृभाषा से जुड़े रहना ही सच्चा विकास है और डिजिटल युग ने क्षेत्रीय साहित्य को न सिर्फ बचाया, बल्कि वैश्विक पटल पर नई चमक दी है।केयर्न वेदांता की यह पहल जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 को महज साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक-आर्थिक-डिजिटल महोत्सव बना रही है। थार की महिलाओं की कारीगरी, बाजरे की पौष्टिकता, क्षेत्रीय भाषाओं की डिजिटल ऊर्जा और माटी की महक सब कुछ एक साथ गूंज रहा है। माटी की महक अब डिजिटल हवाओं में फैल रही है, अजरख की चमक दिलों में उतर रही है और बाजरे की खुशबू जीभ पर बसी है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 – जहां संस्कृति सचमुच जीवंत हो रही है!
रिपोर्ट – ठाकराराम मेघवाल
