
ऐक्टर: प्रभास, संजय दत्त, ज़रीना वहाब श्रेणी: हॉरर–फैंटेसी, पारिवारिक ड्रामा डायरेक्टर: मारुति
अवधि: लगभग 2.5 घंटे (अनुमानित)
रेटिंग: ⭐⭐½ / 5
राजा साब एक ऐसी कहानी है जो पारिवारिक भावनाओं से शुरू होकर रहस्य, भ्रम और डर की दुनिया में प्रवेश करती है। फिल्म के केंद्र में है राजू (प्रभास), जो अपनी बुज़ुर्ग दादी गंगादेवी के साथ रहता है। बीमारी से जूझ रहीं गंगादेवी आज भी अपने पति कनक राजू के लौटने का इंतज़ार कर रही हैं, जो कई दशक पहले अचानक परिवार से अलग हो गए थे। दादी की इस अधूरी इच्छा को पूरा करने का जिम्मा राजू अपने ऊपर ले लेता है। दादा की तलाश उसे एक ऐसे रास्ते पर ले जाती है, जहां सच और अफ़वाहें आपस में उलझी हुई हैं। हैदराबाद में उसे कुछ नए लोग मिलते हैं और धीरे-धीरे यह साफ़ होने लगता है कि कनक राजू कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। उनकी मौजूदगी नरसापुर के जंगलों में बनी एक पुरानी हवेली से जुड़ी है, जिसे लेकर लोग तरह-तरह की डरावनी कहानियां सुनाते हैं। यही हवेली फिल्म का रहस्यमय केंद्र बन जाती है। कहानी और प्रस्तुति फिल्म खुद को हॉरर-फैंटेसी के रूप में स्थापित करने की कोशिश करती है, लेकिन इसका स्वर कभी भावनात्मक पारिवारिक ड्रामा बन जाता है, तो कभी मसाला एंटरटेनर। यह असंतुलन कहानी की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आता है। निर्देशक कई शैलियों को एक साथ पिरोना चाहते हैं—डर, रोमांस, कॉमेडी और रहस्य—लेकिन इनमें से कोई भी तत्व पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाता। कहानी का शुरुआती हिस्सा उम्मीद जगाता है। हवेली और जंगल से जुड़ा माहौल रहस्य पैदा करता है, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, वह इस माहौल को बनाए रखने में असफल रहती है। गाने और गैरज़रूरी दृश्य कथानक की गति को बार-बार रोकते हैं। किरदार और अभिनय प्रभास फिल्म में आकर्षक और ऊर्जावान नज़र आते हैं, लेकिन उनके किरदार को गहराई नहीं मिल पाती। कुछ गंभीर दृश्यों में वह असर छोड़ते हैं, पर संवाद अदायगी हर जगह संतुलित नहीं लगती। तीन महिला पात्रों की मौजूदगी कहानी को विस्तार देने के बजाय उलझा देती है। किसी भी किरदार को ऐसा स्पेस नहीं मिलता जिससे दर्शक उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ सके। संजय दत्त का रोल रहस्य से भरा जरूर है, लेकिन पटकथा उनके किरदार को पूरी तरह खोल नहीं पाती। ज़रीना वहाब फिल्म की भावनात्मक आत्मा हैं और उनका अभिनय सहज व प्रभावशाली है। सहायक कलाकारों से हास्य की उम्मीद थी, लेकिन कॉमेडी दृश्यों में टाइमिंग की कमी साफ दिखती है। डर और रोमांच हॉरर फिल्म से दर्शक जिस डर और तनाव की उम्मीद करता है, वह यहां महसूस नहीं होता। हवेली जैसे लोकेशन के बावजूद वातावरण उतना भयावह नहीं बन पाता। पात्र कई बार ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे वे किसी सामान्य जगह पर हों, जिससे खतरे का अहसास कमजोर पड़ जाता है। रहस्य को खोलने की प्रक्रिया भी अपेक्षित रोमांच पैदा नहीं कर पाती। तकनीकी पक्ष फिल्म का सेट डिज़ाइन भव्य है और कुछ दृश्य आंखों को अच्छे लगते हैं। हालांकि वीएफएक्स असमान है—कुछ जगह प्रभावी, तो कुछ जगह साफ तौर पर कमजोर। संगीत कहानी के साथ घुलने के बजाय अलग-थलग महसूस होता है। बैकग्राउंड स्कोर कई दृश्यों में ज़रूरत से ज़्यादा शोर करता है। क्लाइमैक्स और निष्कर्ष अंतिम हिस्से में फिल्म थोड़ी पकड़ बनाती है। कहानी को मनोवैज्ञानिक मोड़ देने की कोशिश की जाती है, जो आंशिक रूप से काम करती है। हालांकि, जिस किरदार को शुरू में बेहद चालाक और बुद्धिमान दिखाया जाता है, उसका अंतिम रूप पहले के निर्माण से मेल नहीं खाता। अंतिम फैसला राजा साब एक महत्वाकांक्षी फिल्म है, जिसमें विचार और पैमाना दोनों बड़े हैं, लेकिन कमजोर पटकथा और असंतुलित निर्देशन इसके असर को सीमित कर देते हैं। न यह पूरी तरह डराती है, न हंसाती है और न ही भावनात्मक रूप से गहराई तक पहुंच पाती है। प्रभास के प्रशंसकों के लिए यह एक बार देखने लायक हो सकती है, लेकिन एक प्रभावी हॉरर-फैंटेसी के रूप में यह फिल्म अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाती।
