
राजस्थान सरकार ने आधिकारिक रूप से यह स्वीकार किया है कि निजी कंपनी ओजस्वी मार्बल्स एंड ग्रेनाइट्स प्राइवेट लिमिटेड को खनन के लिए आवंटित की गई जमीन अरावली पर्वत श्रृंखला के दायरे में आती है। इसके बाद सरकार ने संबंधित क्षेत्र में सभी खनन गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से रोकने का निर्देश जारी कर दिया है।
यह पहला अवसर है जब राज्य सरकार ने स्पष्ट रूप से माना है कि खनन के लिए दी गई भूमि अरावली क्षेत्र का हिस्सा है और वहां की जा रही खनन गतिविधियां अवैध श्रेणी में आती हैं।
ग्रामीणों की याचिका के बाद बढ़ा मामला
यह कार्रवाई सीकर जिले के नीम का थाना क्षेत्र के दीपावास गांव के कुछ ग्रामीणों द्वारा 19 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई हस्तक्षेप याचिका के बाद सामने आई। ग्रामीणों ने यह याचिका 16 जनवरी 2026 से कंपनी द्वारा शुरू की गई खनन गतिविधियों के विरोध में दायर की थी।
मामले को गंभीरता से लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया, क्योंकि यह गतिविधियां न्यायालय के पूर्व आदेशों का उल्लंघन मानी गईं।
खनन विभाग और पर्यावरण प्राधिकरण का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध का उल्लंघन होने की स्थिति को देखते हुए राजस्थान सरकार ने कंपनी को निर्देश दिया कि वह आवंटित भूमि पर सभी कार्य तत्काल बंद करे, क्योंकि यह क्षेत्र अरावली पर्वतमाला के अंतर्गत आता है।
राजस्थान के खान एवं भूविज्ञान विभाग ने 24 जनवरी को कंपनी को पत्र भेजकर स्पष्ट किया कि संबंधित खनन लीज क्षेत्र भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की 25 अगस्त 2010 की रिपोर्ट में निर्धारित अरावली पहाड़ियों के परिभाषित क्षेत्र (पॉलीगॉन) के भीतर आता है।
पत्र में 29 दिसंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी उल्लेख किया गया, जिसमें कहा गया था कि अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार की खनन अनुमति देने से पहले न्यायालय की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होगी। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया था कि यदि इस निर्देश के बाद खनन कार्य शुरू किया जाता है तो उसे अवैध माना जाएगा और तुरंत रोका जाएगा।
राजस्थान की राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) ने भी कंपनी को इसी आशय का पत्र जारी किया। इसकी प्रतियां राज्य के पर्यावरण विभाग, खान विभाग और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी भेजी गईं।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों का हवाला
9 मई 2024 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, भारतीय वन सर्वेक्षण की 2010 की रिपोर्ट में परिभाषित अरावली क्षेत्र में अंतिम खनन अनुमति बिना न्यायालय की पूर्व स्वीकृति के नहीं दी जा सकती। इस प्रावधान को 29 दिसंबर 2025 को जारी स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) आदेश में भी दोहराया गया था।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया
‘पीपल फॉर अरावलीज’ समूह की संस्थापक नीलम अहलूवालिया ने कहा कि कंपनी को 25 सितंबर 2024 को अंतिम वन स्वीकृति दी गई थी, जबकि उससे पहले 9 मई 2024 को सुप्रीम कोर्ट आदेश जारी कर चुका था। यही तथ्य ग्रामीणों द्वारा दायर हस्तक्षेप याचिका का आधार बना।
नीलम अहलूवालिया वर्तमान में अरावली पर्वत श्रृंखला की सुरक्षा के लिए लगभग 700 किलोमीटर की पदयात्रा पर हैं।
इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली क्षेत्र से संबंधित चल रही स्वतः संज्ञान कार्यवाही के दौरान कंपनी ने भी एक हस्तक्षेप याचिका दायर कर खनन कार्य दोबारा शुरू करने की अनुमति मांगी है।
