बाड़मेर (Barmer) जिला राजस्थान का वह दुर्गम इलाका है, जहां छितराई हुई आबादी है। लोग ढाणियों में दूर-दूर रहते हैं। एक बूथ के मतदाता कई किलोमीटर तक में फैले हुए हैं। जब भारत निर्वाचन आयोग ने एसआईआर कार्यक्रम शुरू किया, तो प्रशासन के लिए इसको समय पर निष्पादित करना चुनौती थी। इसलिए यहां निर्वाचन की टीम ने विशेष रणनीति बनाई, जिसके तहत समय से उनके घर तक पहुंच कर गणना प्रपत्र पहुंचाया जा सके और उसे वापस लेकर डिजिटिलाइज्ड किया जा सके। इसके लिए धोरों में रहे रहे लोगों तक पहुंचने के ऊंटों का सहारा लिया गया। उदाहरण के तौर पर भारत-पाक बॉर्डर का सीमांत गांव बावरवाला में एसडीएम सेड़वा बद्रीनारायण विश्नोई और उनकी टीम ने 2 किमी. रेत के टीबे पर टीम के साथ पैदल चल कर कोली, भील और देवासी जातियों के मतदाताओं के अन्यत्र निवास होने का उनके घर-घर जाकर भौतिक सत्यापन किया। सीमांत क्षेत्र के नागरिकों और मतदाताओं से बीएलओ को गणना प्रपत्र भरवाने में सहयोग करने और उनको दो रंगीन फोटो,एपिक, आधार और मोबाइल नंबर की सही जानकारी उपलब्ध करवाने की अपील की। इसके साथ ही चौहटन और शिव के क्षेत्रों के दूरस्थ इलाकों में भी बीएलओ ने गांव में ही कैम्प किया। यहां एक ढाणी से दूसरी ढाणी की दूरी 5 से 7 किलीमीटर तक सामान्य है। इसके लिए बीएलओ यहां के स्थानीय परिवहन का भी उपयोग कर रहे हैं। यहां तक वो मतदाताओं के घर पर ही खाना खाकर सो जाते हैं फिर दूसरे दिन दूसरे स्थान पर जाते हैं। इसके साथ ही एक चुनौती इंटरनेट कनेक्टिविटी की भी आई, इसके लिए उन्होंने ऐसे प्वाइंट खोजे जहां से इंटरनेट सुगमता से मिल सके,ताकि फॉर्म को डिजिटिलाइज्ड किया जा सके। लेकिन इन दुर्गम परिस्थितियों में भी बीएलओ का हौसला कम नहीं हो रहा है और इस कार्य को करने में अपनी पूरी क्षमता से लगे हुए हैं, जिसका परिणाम है कि बाड़मेर जिला एसआईआर के कार्य में अग्रणी बना हुआ है।
रिपोर्ट – ठाकराराम मेघवाल
