
ऐक्टर: अगस्त्य नंदा, धर्मेंद्र, जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया
श्रेणी: वॉर ड्रामा / बायोपिक
डायरेक्टर: श्रीराम राघवन अवधि: 2 घंटे 18 मिनट रेटिंग: ⭐⭐⭐☆☆ (3/5)
क्या है कहानी?
श्रीराम राघवन की इक्कीस (Ikkis) किसी धमाकेदार युद्ध दृश्य से नहीं, बल्कि एक सन्नाटे से शुरू होती है—एक पिता का सन्नाटा, जिसके मन में 30 साल बाद भी वही सवाल अटका है। सवाल यह नहीं कि बेटा शहीद कैसे हुआ, सवाल यह है कि जब उसे लौटने का आदेश मिला था… तो वह लौटा क्यों नहीं?यहीं से फिल्म आपको अतीत में ले जाती है, जहां सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल से मुलाकात होती है—एक 21 साल का नौजवान, जो दोस्तों के साथ मस्ती भी करता है, प्यार भी करता है, लेकिन जब देश की बात आती है तो एक पल भी नहीं हिचकता। एक छोटी-सी लव स्टोरी, फौजी ट्रेनिंग के पल और फिर अचानक ज़िंदगी जंग के मैदान में पहुंच जाती है।इक्कीस जंग को ग्लैमराइज नहीं करती। यह दिखाती है कि युद्ध सिर्फ़ गोलियों और टैंकों का खेल नहीं, बल्कि फैसलों, डर और कुर्बानी की कहानी है—और कभी-कभी उन फैसलों की कीमत ज़िंदगी होती है।
परफॉर्मेंस
अगस्त्य नंदा इस फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज़ हैं। थिएटर में उनका पहला कदम ही आत्मविश्वास से भरा है। अरुण खेत्रपाल के किरदार में वे जोश, मासूमियत और देशभक्ति को बिना ओवरएक्ट किए पेश करते हैं। कई सीन ऐसे हैं जहां उनका चेहरा ही संवाद बन जाता है।धर्मेंद्र… और बस धर्मेंद्र। 89 साल की उम्र में स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी दिल भारी कर देती है। यह उनकी आख़िरी फिल्म है और शायद इसी वजह से उनका हर सीन और ज़्यादा असर करता है। बेटे की याद, गर्व और अधूरापन—सब कुछ उनकी आंखों में साफ झलकता है।जयदीप अहलावत हर फ्रेम में मजबूत हैं। उनके किरदार के भीतर चल रही कशमकश फिल्म को एक अलग लेयर देती है।सिमर भाटिया अपने सीमित रोल में ठीक लगती हैं। दीपक डोबरियाल और असरानी के कैमियो भावुक कर जाते हैं—खासतौर पर असरानी को धर्मेंद्र के साथ देखना।
वर्डिक्ट
इक्कीस मसाला एंटरटेनर नहीं है, लेकिन इसका इमोशनल असर लंबे वक्त तक रहता है। यह फिल्म देशभक्ति को शोर में नहीं, खामोशी में कहती है।कहानी कहीं-कहीं धीमी पड़ती है, लेकिन सेकेंड हाफ के वॉर सीक्वेंस और आख़िरी संदेश दिल जीत लेते हैं।अगर आप थिएटर में सीट से उछलने नहीं, बल्कि सीट पर चुपचाप बैठकर महसूस करने वाली फिल्म देखना चाहते हैं—तो इक्कीस आपके लिए है।
