
राजसमंद (Rajsamand) देवी चित्रलेखा ने कहा कि सारा संसार यही चाहता है कि भगवान उससे प्रसन्न हो जाए। ऐसी ठाकुर जी को क्या चीज चढ़ाएं या ऐसी क्या मनुहार करें कि वह हम पर प्रसन्न हो जाएं। उन्होंने कहा कि संसार में सारा कुछ दिया हुआ तो ठाकुर जी का ही है। ऐसे में उनके द्वारा ही दिया गया उनको ही कैसे अर्पित करें, कुछ देना ही है तो अपनी ओर से ही देना चाहिए। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर ठाकुर जी को क्या समर्पित किया जाए। उन्होंने कहा कि पैसा पद प्रतिष्ठा आदि सभी ‘प’ बेकार हैं, लेकिन एक ‘प’ है, जिससे ठाकुर जी को पाया जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह मीरा बाई प्रेम भाव से ठाकुर जी को पाया इस तरह अपना प्रेम ठाकुर जी को समर्पित करते हुए उन्हें पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भगवान का प्रेमी वही हो सकता है जिसके मन में ठाकुर जी के चरण बस जाएं। कल होने कहा कि भगवान का भक्त और प्रेमी बनने का बस यही एक तरीका है। इस प्रसंग पर देवी ने हरिपाल भक्त की कहानी सुनाते हुए बताया कि हरिपाल की भक्ति पर कृपा करने के लिए ठाकुर जी स्वयं मां लक्ष्मी के साथ लुटने के लिए आए और सर्वस्व अपने भक्त को लुटा दिया। उन्होंने भगवान जगदीश की भक्त कर्मा बाई की कहानी सुनाते हुए कहा कि प्रेम में नियम और कानून मायने नहीं रखते। उन्होंने कहा कि प्रेम में भूल और गलतियां मजा देती है और इसी प्रेम के वशीभूत होकर ठाकुर जी कर्मा बाई की ओर से उल्टे-सीधे तरीके से बनाई गई खिचड़ी का भी भोग धरने आ जाते थे। उन्होंने कहा कि वो कर्मा बाई थीं, जो भाव में डूबी थी और भाव में ही सब कुछ हो रहा था। लेकिन, हमारा सामर्थ्य मां कर्मा बाई और शबरी मां जैसा नहीं है, इसलिए हमें उनकी तरह नहीं करते हुए ठाकुर जी की सेवा नियमों में रहते हुए ही करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ठाकुर जी की सेवा में यह नियम कायदे निरंतर चलते रहेंगे और फिर एक दिन एक साथ आएगा कि सब नियम पीछे छूट जाएंगे और केवल भाव रह जाएगा।उन्होंने कहा कि हमारे कानों और आंखों पर माया का पर्दा लगा हुआ है इसलिए ठाकुर जी कुछ बोले और इशारा करें तो भी हमें सुनाई वह दिखाई नहीं देता है। इसलिए हमें माया का पर्दा हटाना पड़ेगा और यह माया का पर्दा जितना सत्संग करेंगे जितना भजन सुनेंगे तो धीरे-धीरे हटेगा। उन्होंने कहा कि जो माया के इस पर्दे को हटाकर के हमारे जीवन में प्रकाश फैलाता है ठाकुर का दर्शन करवाए उसे ही गुरु कहते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु हमारे अंधकार को मिटाकर आंखों पर ज्ञान रूपी काजल लगाता है। उन्होंने कहा कि जब तक संसार से बंधी आपकी रस्सी आप नहीं खोलेंगे तब तक आप ठाकुर जी की ओर नहीं बढ़ सकते। उन्होंने कहा कि भक्ति का मतलब समर्पित भाव होता है अर्थात आप जब तक ठाकुर जी के चरणों में समर्पित ना हो जाएंगे तब तक आप उन्हें नहीं पा सकते। प्रारंभ में स्वागत कान्हा राजगुरु व परिवार के सदस्यों ने किया।कथा के दौरान उन्होंने करम इतना बिहारी जी एक बार मुझ पर हो जाए, सांवरिया है सेठ मारी राधा जी सेठानी है, सांवरा आछी बजाई रे तू तो बांसुरी, लागे वृंदावन निको आली मने, मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है, भजन सुनाते हुए श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया।
रिपोर्ट – नरेंद्र सिंह खंगारोत
