गौवंश की सेवा कर लौटाएं भारत का गौरव

जागरूक टाइम्स 972 Jun 1, 2021

माता मनुष्य को मिला ईश्वर का सबसे उत्तम उपहार है। प्राचीन काल से ही भारतवंशी गौवंश को मुख्य धन मानते आए हैं, तभी तो इसे गौधन कहा गया है। जिसमें गाय के साथ ही नंदी भी शामिल है। इस लिए हर प्रकार से गौरक्षा, गौसेवा एवं गौपालन पर जोर दिया जाता रहा है। हमारे हिंदू शास्त्रों, वेदों में गौरक्षा, गौ महिमा, गौ पालन आदि अनेक के प्रसंग मिलते हैं। रामायण, महाभारत, भगवद् गीता जैसे ग्रंथों में भी गाय का किसी न किसी रूप में उल्लेख मिलता है। ज्योतिषशास्त्र में गाय माना गया है कि सूर्यादि नवग्रहों के साथ ही वरुण, वायु आदि देवताओं को यज्ञ में दी हुई प्रत्येक आहुति गाय के घी से देने की परंपरा है। जिससे सूर्य की किरणों को विशेष ऊर्जा मिलती है। यही विशेष ऊर्जा वर्षा का कारण बनती है और वर्षा से ही अन्न, पेड़-पौधों आदि को जीवन मिलता है। ये सारे गुण हमें देसी गाय में ही मिलते हैं। यही कारण है कि हमारे पूर्वज अपने घरों में गौपालन को महत्व देते थे।

कहा जाता था कि जिस के दरवाजे पर गाय बंधी होती थी, वहां सदैव सुख-शांति का वास रहता था। परन्तु समय के साथ जिस तरह इंसान की जीवनशैली बदली। उसी के समानांतर गाय की सामाजिक स्थिति में भी बदलाब आया है। आज गौपालन करने वालों की संख्या में काफी कमी आई है जो निरंतर बढ़ती ही जा रही है। जब गाय दूध देने लायक नहीं रहती तब उसे यूं ही आवारा छोड़ दिया जाता है, ईश्वर भरोसे। वह शहरों-गांवों की गलियों में भूखी-प्यासी भटकती है। यही हाल नंदी का है। यहां-वहां बैठने, यातायात रोकने और भूख के चलते दुकानों, रेहडिय़ों आदि पर गौमाता एवं नंदी मुंह मारते हैं, कभी किसी के खेत में घुसकर फसल खा जाते हैं। इसके चलते लोग उन पर हमला कर उन्हें घायल कर देते हैं। कई दफा किसी वाहन के टक्कर से ये गौवंश या तो घायल हो जाते हैं या तो कई दफा वह अपने प्राणों से हाथ धो बैठते हैं।

घायल गौमाताओं एवं नंदी के घाव सडऩे लगते हैं जिनसे उनको तकलीफ होती है। यह दृश्य मन को द्रवित करता है। इसलिए अब हमें अपनी गौमाता के साथ ही नंदी को फिर से सम्मान देने का संकल्प करना पड़ेगा। इसकी पहल हमें सबसे पहले अपने आसपास से ही शुरू करनी होगी। अपने गांवों के चौक-चौराहों या सड़कों-गलियों में भूखी भटकती आवारा गायों और नंदियों को अपनी सामथ्र्य के अनुसार रोटी एवं चारा-पानी की व्यवस्था करनी होगी। गर्मियों में उनके कष्टों का निवारण पानी और छाया प्रदाकर करना होगा। हमें नियम बनाना चाहिए कि हमारी पूजनीय गौमाता को सुरक्षित रखा जा सके ताकि वो मानसिक एवं शारीरिक कष्ट की भागी न बन सकें। अब समय आ गया है कि हम अपनी आमदनी का कुछ भाग गौवंश की सेवा के लिए सुरक्षित करें और उसे गौमाता एवं नंदी को समर्पित कर गौसेवा में अपनी भूमिका निभाएं।

प्रत्येक मनुष्य को गौसेवा अपना परम कर्तव्य बनाना होगा। फिर से घरों में गौमाता को परम स्थान प्रदान करना होगा और अपने-अपने घरों में उनका पालन-पोषण करना होगा। गाय पालने का अर्थ यह नहीं कि किसी भी गाय को पाला जाए, बल्कि देसी गाय पालने पर जोर देना चाहिए। देसी गाय से प्राप्त होने वाले पंचगव्य (दूध, दही, घी, गौमूत्र एवं गोबर) में औषधीय गुण होते हैं। अत: हमें देसी गौपालन के महत्व को समझकर देसी गाय ही पालनी चाहिए। आज की जीवन शैली में हालांकि ऐसे लोगों की संख्या भी काफी है जो चाहकर भी घरों में गाय नहीं पाल सकते। ऐसे गौभक्त गौशालाओं-नंदीशालाओं में अपना योगदान दे सकते हैं। इसके लिए वे गौशालाओं-नंदीशालाओं को आर्थिक सहयोग देने के साथ ही गौशालाओं की गाय-नंदी को गोद लेकर बतौर संरक्षक उनके भरण-पोषण और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी निभा सकते हैं। इससे गौशालों में गायों-नंदियों की उचित देखभाल की जा सकेगी और गौशाला-नंदीशाला को आर्थिक सहयोग मिलने से वे और अधिक गौवंशों को संरक्षण दे सकेंगे।

हमारे देश में प्राचीन परंपरा रही है कि घर में जब भोजन बनाया जाता है तो सर्वप्रथम गौग्रास निकाला जाता है। अधिकांश हिन्दुओं और जैनधर्मियों के घरों में आज भी यह परंपरा कायम है। परन्तु शहरोंं में गायों की उपलब्धता नहीं होने के कारण रोटियां सड़कों पर पड़ी रहती हैं, अमूल्य अन्न लोगों के पैरों तले कुचला जाता है जो धर्म के अनुसार तो पाप है ही, आर्थिक दृष्टि से भी सही नहीं है। अत: जिनके निकट में गाय नहीं हैं वो प्रतिदिन निकाले जाने वाले गौग्रास के अनुसार गौशालाओं-नंदीशालाओं को आर्थिक सहयोग दे सकते हैं और उनके द्वारा निकाला गया गौग्रास वास्तव में गाय के भोजन का हिस्सा बने।

सार यही है कि हमें अपने देश में गौवंश को पुन: लोगों से जोडऩा है। इसके लिए प्रत्येक मनुष्य को तय करना होगा कि वो किस तरह गौसेवा में अपना योगदान दे सकता है और तय करने के बाद उसे अपनी क्षमतानुसार भागीदारी निभानी होगी। इसलिए या तो स्वयं के स्तर पर गौवंश के संरक्षण को आगे आएं या अपने नजदीकी गौशालाओं-नंदीशालाओं को नियमित आर्थिक सहयोग कर गौवंश के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करें।

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