अपने ही अपनों के संग करते भेदभाव, हैरान हूँ देखकर इंसान का स्वभाव

जागरूक टाइम्स 243 Mar 22, 2021

हमारे समाज में पुरुष व महिलाओं के बीच भारी असमानता है। महिलाओं को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। घर से लेकर बाहर कार्यस्थल तक उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि उसे यदि उचित अवसर व सुविधाएं मुहैया कराये जाएं तो वह पुरुषों से कम नहीं हैं। लेकिन, स्वतंत्रता के दशकों बाद भी महिलाओं को जो सामाजिक सम्मान मिलना चाहिए, वह प्राप्त नहीं हो सका है। मेरा सवाल है आज समाज से व समाज में रहने वाले हर उस प्राणी से जो स्त्री और पुरुष को अलग अलग आंकता है | बरसो से ये भेद चला ही आ रहा है |

स्त्री हमेशा सीता क्यों
स्त्री से हमेशा कल्पना की जाती है की वो सीता ही बनी रहे हर स्त्री अपने आप में सीता ही होती है उसे चरित्रहीन ये समाज ही बनाता है |मै ये पूछना चाहती हु क्यों स्त्री हमेशा सीता ही हो सकती है उसे गौतम बुद्ध भी तो होना चाहिये | आधी रात में गौतम बुद्ध अपने सोते परिवार को छोड़ कर खुद की खोज में निकल गए तो उन्हें बुद्ध का दर्जा मिल गया पर यही यही कार्य कोई स्त्री करे तो वो चरित्रहीन क्यों ? कभी समाज ये जानना कहेगा की वो खुद की खोज में निकली होगी ,बुद्ध जंगल से लौटे तो महात्मा की उपाधि मिली लेकिन सीता रावन जेसे पापी की कैद से छुटी तो कलंकित कहलाई और खुद को साबित करने के लिए अग्नि परीक्षा भी दी पर फिर भी अपने ही पति द्वारा त्याग दी गयी ये इंसाफ था क्या ?

स्त्री पुरुष एक सिक्के के दो पहलु
स्त्री और पुरुष दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक दूसरे के पूरक हैं, सहयोगी हैं, विरोधी नहीं । प्रकृति ने दोनों को एक खास मकसद से सृष्टि की निरंतरता हेतु बनाया है, दोनों एक दूसरे के लिए आवश्यक हैं, अनुपयोगी नहीं । दोनो एक दूसरे के मित्र हैं, शत्रु नहीं। फिर भी दोनों में फर्क क्यों ये समाज की मानसिकता क्यों है की जो काम पुरुष कर सकता है है वो वही कर सकता है स्त्री नहीं जब की आज हर शेत्र में स्त्रिया पुरुषो से आगे है |

२१ वी सदी के बदलाव
दोहरी मानसिकता की उपज उस समय की है जब हमारी आधी आबादी अधिकांशतः महिलाएँ अशिक्षित थी। आज ज़माना बदल चुका है, हम इक्कीसवीं सदी में हैं, शिक्षित हो रहे हैं, लोकतान्त्रिक समाज में जी रहे हैं और समानता की ओर अग्रसर हैं। इन दोहरे मापदण्डों के लिए इस आधुनिक समाज में कोई स्थान नहीं है।आज हमारी आधी आबादी सड़कों पर उतर आयी है। एक दूसरे के स्वर से स्वर मिलाकर पुरुषों को तहजीब सिखाने, अपनी हदों में रहने, व लिंग भेद भाव छोड़कर महिलाओं पर ढाए जा रहे अत्याचारों से बाज़ आने की बात कह रहीं हैं।

पुरुष अपनी मर्यादा न भूले
समस्त पुरुष सदैव अपनी सीमा में रहें , बिना किसी लिंग भेद भाव के समस्त महिलाओं के साथ समानता व सज्जनता का व्यव्हार करें, इसके लिए सख्त से सख्त कानून बनाने की मांग कर रही हैं। समानता व सज्जनता का व्यव्हार न करने पर वे , नारी उत्पीड़न तथा बलात्कार जैसे अपराधों में लिप्त पुरुषों को नपुंशक बनाने अथवा दुराचरण करने वाले पुरुषों को स्वयं अपने हाथों से डंडा, पत्थर, मार मार कर अथवा उनकी आँख फोड़कर या उनके हाथों से नाखून निकालकर सजा देने तक की बात कर रही हैं।

दिन प्रतिदिन बढ़ते अपराध
यहाँ पर मैं यह स्पष्ट कर देना चाहती हूँ, कि मैं पुरुषो की विरोधी नहीं हूँ, मैं उनका सम्मान करती हूँ लेकिन में आज पुरुषो द्वारा बढ़ते अत्याचारों से आहात हु दिन प्रतिदिन बलात्कार घरेलु हिंसा दहेज़ लोभियों द्वारा किये गए अत्याचार बढ़ते हे जा रहे है एक और जहा नारियो की लिए “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते , रमन्ते तत्र देवता” की विचारधारा को मन जाता है उस देश की धरती पर ऐसी घटनाएँ अत्यंत दुखद एवं शर्मनाक हैं, हम सबको एक साथ मिलकर इसकी कड़े शब्दों में निंदा करनी चाहिए और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए, भले ही इसके लिए सख्त से सख्त कानून क्यों न बनाने पड़ें।

कठोर कानूनों का निर्वहन जरुरी
गैंग रेप जैसी ये घिनौनी वारदातें अभी भी नहीं थम रहीं हैं । हमारी माँ, बहन, बहू, बेटियों के साथ यह घोर अन्याय है और हमारे माथे पर एक कलंक है। हम सब इसे बिलकुल बर्दाश नहीं कर सकते। हम सब को जागना होगा , अपने अंदर झांकना होगा। अब समय आ गया है, जब देश की दशा और दिशा तय करने वाले हमारे राजनेता, तीव्र इच्छा शक्ति दिखाते हुए, ऐसे अपराधों को रोकने हेतु कठोर से कठोर कानून न केवल बनाएँ बल्कि पूरी मुस्तैदी से उनका क्रियान्वयन भी सुनिश्चित करें । ताकि ऐसी वारदातों पर अंकुश लगाया जा सके।

स्वयं में बदलाव आवश्यक
हमें समानता के अपने इस उद्देश्य में पूरी सफलता पाने के लिए अपने आप को भी बदलना होगा, अपने अंदर निहारना होगा । और स्त्री हो या पुरुष सब को साथ मिलकर यह निश्चय करना होगा कि हम सब अपने अपने घरों में सभी बच्चों को, चाहे लड़का हो या लड़की , एक जैसे संस्कार देंगे और इस बात का ख्याल रखेंगे कि लड़का – लड़की दोनों को एक नजर से देखें,दोनों के लिए हमारे मन मस्तिस्क में एक जैसे मापदंड हों। उन्हे अलग अलग नजरिए से न देखा जाए । हम सब स्वयं अपने बच्चों के लिए एक अच्छा उदाहरण बनकर दिखाएँ और लड़का लड़की दोनों को बिना लिंग भेदभाव के समान रूप से मानवीय गुणों व संस्कारों से सुसज्जित व पोषित करें।

बच्चो को संस्कार दे
आज माता पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं है, वे संस्कार जो हमें अपने पूर्वजों से मिले हैं, हम अपने बच्चों तक पहुंचाने में असफल हैं, क्योंकि हम अपनी जिंदगी की भागमभाग में ब्यस्त हैं। हमारे बच्चे मोबाइल, टीवी, इंटरनेट, फेस बुक इत्यादि से एवं अन्य तमाम वांछित एवं अवांछित इंटरनेट साइट्स से गुण अवगुण सीख रहे हैं। कहते हैं बच्चे का सबसे पहला शिक्षक उसकी माँ होती है । इन सभी बच्चों को भी किसी महिला ने ही जन्म दिया होगा, महिला और पुरुष दोनों ने मिलकर ही परिवार में इनका पालन पोषण किया होगा। नन्हें बच्चे से नौयुवक बनने की इस प्रक्रिया में आखिर हमने इन्हे मानवीय गुणों एवं संस्कारों से क्यों नहीं परि- पोषित किया …? या इस राश्ते से हटने पर हमने प्रारम्भ से ही इनके कान क्यों नहीं मरोड़े….? जिस तरह की परवरिश घर परिवार में मिलती है एवं जैसा माहौल स्कूल कालेज व समाज में मिलता है वैसा ही इंसान समाज को मिलता है और अब वह इंसान अपने द्वारा अर्जित गुण संस्कारों के अनुसार ही सुकर्म या कुकर्म करेगा।

आज विद्यालयों में नैतिक मूल्यों की कमी
आज हमारे स्कूल, कालेज अच्छे डाक्टर, इंजीनियर, अभिनेता, सिंगर व डांसर तो बना रहे हैं पर अच्छे इंसान बनाने में असफल हैं। भौतिकता में हमारा उत्थान परंतु नैतिकता में पतन हो रहा है । भौतिक विकास के साथ साथ इंसान में नैतिक मूल्यों का होना भी अत्यंत आवश्यक है । आज हमारी पाठ्य पुस्तकों से , हमारे पूर्वज , नैतिक शिक्षा जैसी मानव मूल्य सिखाने तथा चरित्र निर्माण करने वाली किताबें कहाँ गायब हो गईं…? शिक्षक का उदेश्य केवल धनोपार्जन रह गया है बच्चो को अब जरुरत है किताबी ज्ञान से बाहर उचित संस्कारो का पाठ भी पढाया जाये |

बचपन से सही परवरिश व स्त्री पुरुष का भेद मिटाए
बनाइये सख्त से सख्त कानून और चढ़ा दीजिए ऐसे कुकर्मिओं को फांसी में। गंदगी जरूर कम होगी, औरों को सबक भी अच्छा मिलेगा। परंतु यह तो वही बात हुई कि हमने सुंदर सी बगिया लगाई और उसमें कांटे बोते रहे, खाद पानी देते रहे। जब वही कांटे बड़े होकर हमें चुभने लगे तो उन्हे नष्ट करने के उपाय तलाशें। क्यों न हम बगिया लगाते समय इस बात का ख्याल रखें कि हमारी बगिया में कांटो को नहीं , सुंदर रंग विरंगे सुगंधित पुष्पों वाले पौधों को स्थान मिले। अच्छी शिक्षा के माध्यम से ज्ञान, प्रेम , सौहार्द , भाईचारा, देशप्रेम, दया, ममता, करुणा, सच्चाई, ईमानदारी, छोटों को प्यार , बड़े बुजुर्गों एवं महिलाओं को सम्मान जैसे अन्य तमाम मानवीय गुणों की खाद-पानी देकर उन पौधों को बड़ा किया जाए। इस दौरान यदि हमारी बगिया में खर पतवार जैसे दुर्गुण आ भी जाएँ, तो समय से उनकी निराई कर निकाल फेंका जाए। परिपक्व होकर यही पौधे अपने गुण संस्कारों स्वरूप सुंदर सुगंधित पुष्पों से, न केवल हिंदुस्तान को, बल्कि पूरे संसार को मंहकाएंगे। मेरी समझ में न केवल बलात्कार बल्कि आज हमारे समाज में व्याप्त अन्य कई प्रकार की सामाजिक बुराइयों को दूर करने का यह एक बेहतर और स्थायी तरीका है।
अंत में निम्न लिखित पंक्तियों से मैं अपनी बात को विश्राम देती हूँ-

बतला दे माँ किन राहों पर पहला कदम बढ़ाऊँ मैं,
पहली शिक्षक है मेरी माँ, गर्व सहित बतलाऊँ मैं।
किन बातों से दूर रहूँ , या किनको हृदय लगाऊँ मैं,
बेईमानी, अन्याय, झूठ, किस तरह पाप से बच पाऊँ,
सिखला दे माँ किन के सम्मुख श्रद्धा शीश झुकाऊँ मैं।
बतला दे माँ…..
नेक चाल हो कोई न रोके, ऐसे बोल कोई ना टोंके,
नर- नारी सब जाति धर्म के, सब मेरे, मैं सबका होके,
अपने सत्कर्मों से हरदम, आगे बढ़ता जाऊँ मैं।
बतला दे माँ…..

Leave a comment