राजस्थान के इस शापित किले की ​नींव में गाड़ दिया था जिंदा व्यक्ति, परिवार को मिली जागीर

जागरूक टाइम्स 549 Jun 14, 2021


जयपुर/जोधपुर. देश के प्रमुख पर्वतीय दुर्गों में मरुधरा का मेहरानगढ़ किला भी शामिल है. सूर्यनगरी जोधपुर के यशस्वी संस्थापक राव जोधा ने पांच सदी पहले इस दुर्ग की नींव रखी. जोधपुर के मुकुट समान शोभायमान किला भूतल से करीब 400 फीट उंचा है और इसकी दीवारें की परिधि 10 किमी तक है. लोकविश्वास है कि इस शापित किले की नींव में एक जिंदा व्यक्ति को स्वेच्छा से गाड़ा गया था, ताकि किला अपने निर्माता के वंशजों के हाथ से कभी न निकले.

मेहरानगढ़ दुर्ग बनने का इतिहास: जोधपुर में मेहरानगढ़ दुर्ग बनने से पहले मारवाड़ की राजधानी मंडोर थी. नया दुर्ग मंडोर से 6-7 किमी दक्षिण में एक विशाल पहाड़ी पर संवत 1515 में बनना शुरू हुआ. किले वाली पहाड़ी प्रसिद्ध योगी चिड़ियानाथ के नाम पर चिड़िया टूंक कहलाती थी. उनका स्थान किले के पीछे आज भी विद्यमान है. किले के निर्माण से पहले यहां एक और साधु पानी के सोते के पास रहते थे. जब राजा ने उन्हें जाने के लिए कहा, तब शाप देते हुए साधु कहा कि जिस पानी के लिए तुम मुझे हटा रहे हो वह सूख जाएगा. संन्यासी के समाधान के लिए राजा ने किले में गुफा के पास मंदिर भी बनवाए, जिसका उपयोग संन्यासी ध्यान लगाने के लिये करते थे, लेकिन फिर भी उनके शाप का असर उस क्षेत्र में दिखाई देता है. हर 3 से 4 साल में कभी ना कभी वहां पानी की कमी जरूर होती है.मेहरानगढ़ दुर्ग बनने का इतिहास: जोधपुर में मेहरानगढ़ दुर्ग बनने से पहले मारवाड़ की राजधानी मंडोर थी. नया दुर्ग मंडोर से 6-7 किमी दक्षिण में एक विशाल पहाड़ी पर संवत 1515 में बनना शुरू हुआ. किले वाली पहाड़ी प्रसिद्ध योगी चिड़ियानाथ के नाम पर चिड़िया टूंक कहलाती थी. उनका स्थान किले के पीछे आज भी विद्यमान है. किले के निर्माण से पहले यहां एक और साधु पानी के सोते के पास रहते थे. जब राजा ने उन्हें जाने के लिए कहा, तब शाप देते हुए साधु कहा कि जिस पानी के लिए तुम मुझे हटा रहे हो वह सूख जाएगा. संन्यासी के समाधान के लिए राजा ने किले में गुफा के पास मंदिर भी बनवाए, जिसका उपयोग संन्यासी ध्यान लगाने के लिये करते थे, लेकिन फिर भी उनके शाप का असर उस क्षेत्र में दिखाई देता है. हर 3 से 4 साल में कभी ना कभी वहां पानी की कमी जरूर होती है.

कुतुब मीनार से भी ऊंचा है सूर्य नगरी का दुर्ग: मेहरानगढ़ किला 120 मीटर ऊंची एक पहाड़ी पर बना हुआ है. इस तरह से यह किला दिल्ली के कुतुब मीनार की ऊंचाई (73 मीटर) से भी ऊंचा है. किले के परिसर में सती माता का मंदिर भी है. इस किले के दीवारों की परिधि 10 किलोमीटर तक फैली हैं. इनकी ऊंचाई 20 फुट से 120 फुट तथा चौड़ाई 12 फुट से 70 फुट तक है. इसके परकोटे में दुर्गम रास्तों वाले सात आरक्षित दुर्ग बने हुए थे।. किले के प्रवेश द्वारों में ध्रुवपोल, सूरजपोल, इमरतपोल और भैंरोंपोल प्रमुख हैं.कुतुब मीनार से भी ऊंचा है सूर्य नगरी का दुर्ग: मेहरानगढ़ किला 120 मीटर ऊंची एक पहाड़ी पर बना हुआ है. इस तरह से यह किला दिल्ली के कुतुब मीनार की ऊंचाई (73 मीटर) से भी ऊंचा है. किले के परिसर में सती माता का मंदिर भी है. इस किले के दीवारों की परिधि 10 किलोमीटर तक फैली हैं. इनकी ऊंचाई 20 फुट से 120 फुट तथा चौड़ाई 12 फुट से 70 फुट तक है. इसके परकोटे में दुर्गम रास्तों वाले सात आरक्षित दुर्ग बने हुए थे।. किले के प्रवेश द्वारों में ध्रुवपोल, सूरजपोल, इमरतपोल और भैंरोंपोल प्रमुख हैं.

...तो किला निर्माता के वंशजों के हाथ से कभी नहीं निकलता: इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने जोधपुर राज्य के इतिहास में उल्लेख किया है कि मेहरानगढ़ के निर्माण के समय यह लोकविश्वास और साधु-संतों का मत था कि यदि किले की नींव में किसी जीवित व्यक्ति की स्वेच्छा से बलि दे दी जाए तो किला अपने निर्माता के वंशजों के हाथ से कभी नहीं निकलता. इसी के तहत तब राजिया नामक व्यक्ति को जिंदा गाड़ दिया गया था. उसके परिवार को इस त्याग के लिए राजा की ओर से जागीर दी गई. जिस स्थान पर वह गाड़ा गया, उसके ऊपर खजाना और नक्कारखाने के भवन बने हैं....तो किला निर्माता के वंशजों के हाथ से कभी नहीं निकलता: इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने जोधपुर राज्य के इतिहास में उल्लेख किया है कि मेहरानगढ़ के निर्माण के समय यह लोकविश्वास और साधु-संतों का मत था कि यदि किले की नींव में किसी जीवित व्यक्ति की स्वेच्छा से बलि दे दी जाए तो किला अपने निर्माता के वंशजों के हाथ से कभी नहीं निकलता. इसी के तहत तब राजिया नामक व्यक्ति को जिंदा गाड़ दिया गया था. उसके परिवार को इस त्याग के लिए राजा की ओर से जागीर दी गई. जिस स्थान पर वह गाड़ा गया, उसके ऊपर खजाना और नक्कारखाने के भवन बने हैं.

प्रचण्ड प्रताप और पराभव दोनों का साक्षी: जोधपुर दुर्ग ने जमाने के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. किले एक ओर राव मालदेव के प्रचण्ड प्रताप का साक्षी बना, तो इसने शेरशाह के शासनकाल में राठौड़ राज्यलक्ष्मी का अल्पकालिक पराभव भी देखा. इसके साथ ही राव चंद्रसेन का स्वतंत्रता के निमित्त अनवरत संघर्ष और पराक्रम भी देखा.प्रचण्ड प्रताप और पराभव दोनों का साक्षी: जोधपुर दुर्ग ने जमाने के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. किले एक ओर राव मालदेव के प्रचण्ड प्रताप का साक्षी बना, तो इसने शेरशाह के शासनकाल में राठौड़ राज्यलक्ष्मी का अल्पकालिक पराभव भी देखा. इसके साथ ही राव चंद्रसेन का स्वतंत्रता के निमित्त अनवरत संघर्ष और पराक्रम भी देखा.

अनूठे राजपूत स्थापत्य कला और विशिष्ट संरचना से सुशोभित: लाल पत्थरों से निर्मित मेहरानगढ़ अलंकृत जालियों, झरोखों से सुशोभित है. यह अनूठे राजपूत स्थापत्य कला और विशिष्ट संरचना के कारण विशेष पहचान रखता है. इसमें महाराजा सूरसिंह द्वारा निर्मित मोतीमहल सुनहरे अलंकरण व सजीव चित्रांकन के लिए प्रख्यात है. इसकी छत व दीवारों पर सोने की पॉलिश का बारीक काम महाराजा तखतसिंह द्वारा करवाया गया. महाराजा अभय सिंह द्वारा निर्मित फूलमहल पत्थर पर बारीक खुदाई और कोराई कला के लिए प्रसिद्ध है. फतेह महल भी बहुत सुंदर और आकर्षक है. जबकि किले के अंदर कई भव्य महल, अद्भुत नक्काशीदार दरवाजे, जालीदार खिड़कियां हैं.अनूठे राजपूत स्थापत्य कला और विशिष्ट संरचना से सुशोभित: लाल पत्थरों से निर्मित मेहरानगढ़ अलंकृत जालियों, झरोखों से सुशोभित है. यह अनूठे राजपूत स्थापत्य कला और विशिष्ट संरचना के कारण विशेष पहचान रखता है. इसमें महाराजा सूरसिंह द्वारा निर्मित मोतीमहल सुनहरे अलंकरण व सजीव चित्रांकन के लिए प्रख्यात है. इसकी छत व दीवारों पर सोने की पॉलिश का बारीक काम महाराजा तखतसिंह द्वारा करवाया गया. महाराजा अभय सिंह द्वारा निर्मित फूलमहल पत्थर पर बारीक खुदाई और कोराई कला के लिए प्रसिद्ध है. फतेह महल भी बहुत सुंदर और आकर्षक है. जबकि किले के अंदर कई भव्य महल, अद्भुत नक्काशीदार दरवाजे, जालीदार खिड़कियां हैं.

अद्भुत इतिहास समेटे है किले का संग्रहालय: किले के म्यूजियम में पालकियों, पोशाकों, संगीत वाद्य, शाही पालनों और फर्नीचर को जमा किया हुआ है. इसके अलावा इसमें मध्यकाल में लड़े गए भीषण युद्धों के स्मृति चिन्ह, विभिन्न प्रकार के आयुध, जिनमें अकबर और और तैमूर की तलवार भी रखी है. संग्रहालय में जिरह-बख्तर, राजसी और सैनिक परिधान, विभिन्न धार्मिक और लौकिक विषयों पर आधारित सजीव चित्र, भव्य और आकर्षक गलीचे संजोए हुए हैं. वहीं, किले की दीवारों पर तोपें भी रखी गयी हैं, जिससे इसकी सुन्दरता को चार चांद भी लग जाते हैं. संग्रहालय की पगड़ी गैलरी में रक्षा, दस्तावेज और राजस्थान में प्रचलित पगड़ियों के कई अलग अलग प्रकार को दर्शाया गया है.अद्भुत इतिहास समेटे है किले का संग्रहालय: किले के म्यूजियम में पालकियों, पोशाकों, संगीत वाद्य, शाही पालनों और फर्नीचर को जमा किया हुआ है. इसके अलावा इसमें मध्यकाल में लड़े गए भीषण युद्धों के स्मृति चिन्ह, विभिन्न प्रकार के आयुध, जिनमें अकबर और और तैमूर की तलवार भी रखी है. संग्रहालय में जिरह-बख्तर, राजसी और सैनिक परिधान, विभिन्न धार्मिक और लौकिक विषयों पर आधारित सजीव चित्र, भव्य और आकर्षक गलीचे संजोए हुए हैं. वहीं, किले की दीवारों पर तोपें भी रखी गयी हैं, जिससे इसकी सुन्दरता को चार चांद भी लग जाते हैं. संग्रहालय की पगड़ी गैलरी में रक्षा, दस्तावेज और राजस्थान में प्रचलित पगड़ियों के कई अलग अलग प्रकार को दर्शाया गया है.

किले से दिखता है पाकिस्तान: 1965 में भारत-पाक के युद्ध में सबसे पहले मेहरानगढ़ के किले को टारगेट किया गया था, लेकिन माना जाता है कि माता की कृपा से यहां किसी का बाल भी बांका नहीं हुआ. किले की दीवारें 10 किलोमीटर तक फैली हैं. इनकी ऊंचाई 20 फीट से 120 फीट तक है, यहां से जोधपुर के साथ ही पाकिस्तान भी नजर आता है.किले से दिखता है पाकिस्तान: 1965 में भारत-पाक के युद्ध में सबसे पहले मेहरानगढ़ के किले को टारगेट किया गया था, लेकिन माना जाता है कि माता की कृपा से यहां किसी का बाल भी बांका नहीं हुआ. किले की दीवारें 10 किलोमीटर तक फैली हैं. इनकी ऊंचाई 20 फीट से 120 फीट तक है, यहां से जोधपुर के साथ ही पाकिस्तान भी नजर आता है.

मौजूद हैं रानियों जौहर के निशान: किले का अंतिम द्वार लोह पोल के बाईं ओर जौहर करने वाली रानियों के हाथों के निशान हैं, यहां 15 से ज्यादा रानियों की हाथों के निशान हैं, जिन्होंने 1843 में अपने पति महाराजा मान सिंह की मौत के बाद जौहर ले लिया था. किंवदंतियों की मानें तो इस घटना से पहले भी 1731 में महाराजा अजीत सिंह की छह रानियों और 58 पटरानियों ने राजा के निधन के बाद जौहर कर लिया था.मौजूद हैं रानियों जौहर के निशान: किले का अंतिम द्वार लोह पोल के बाईं ओर जौहर करने वाली रानियों के हाथों के निशान हैं, यहां 15 से ज्यादा रानियों की हाथों के निशान हैं, जिन्होंने 1843 में अपने पति महाराजा मान सिंह की मौत के बाद जौहर ले लिया था. किंवदंतियों की मानें तो इस घटना से पहले भी 1731 में महाराजा अजीत सिंह की छह रानियों और 58 पटरानियों ने राजा के निधन के बाद जौहर कर लिया था.

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