नेहड़ का हलक तर करने की जुगत में अधिकारियों ने लगाया छह करोड़ का चूना!

जागरूक टाइम्स 1755 Jul 18, 2018

- बाढ़ के बाद 45 दिनों में मीठे पानी की जांच कर देनी थी एनओसी

-कई गांवों में आज भी नकारा साबित हो रहे ट्यूबवैल

श्रवण बिश्नोई @ जागरूक टाइम्स

हाड़ेचा. बाढ़ प्रभावित नेहड़ के गांवों सहित सांचौर व चितलवाना उपखण्ड क्षेत्र में आपदा प्रबंधन के तहत करीब छह करोड़ की लागत से मीठे पानी के लिए खुदवाए गए ट्यूबवेल नकारा साबित होने लगे हैं। इसे जलदाय विभाग के अधिकारियों की सांठ-गांठ कहे या फिर लापरवाही, लेकिन हकीकत यह है कि करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद नेहड़ के बाढ़ प्रभावित गांवों के लोगों हलक अब भी प्यासे हैं।

गौरतलब है कि गत साल बाढ़ प्रभावित गांवों में जलदाय विभाग की ओर से पेयजल समस्या से निजात दिलाने के लिए करीब छह करोड़ की लागत से ट्यूबवेल खुदवाए गए थे। इन गांवों में खोदे गए ट्यूबवेल के लिए 45 दिनों में मीठे पानी का सर्टिफिकेट देकर एजेसी को एनओसी के बाद भुगतान करना था, लेकिन जलदाय विभाग के अधिकारियों व ठेकेदारों की सांठ-गांठ के चलते पानी खारा निकलने के बावजूद अधिकांश ट्यूबवेल का भुगतान ही उठा लिया गया। ऐसे में सरकारी अफसरों की ओर से करोड़ों रुपए के सरकारी धन को चूना लगवाने के बावजूद ग्रामीणों के हलक तर नहीं हो पा रहे हैं।

नर्मदा नहर के पास खुदवाए कई ट्यूबवेल, नहीं लगवाई पाइपलाइन

नेहड़ के सांचौर व चितलवाना उपखण्ड के कई गांवों में नर्मदा की वितरिकाओं के पास मीठे पानी के लिए ट्यूबवेल तो खुदवाए गए, लेकिन पानी की पाइपलाइन नहीं होने से कई गांवों में ये ट्यूबवेल नकारा साबित हो रहे हैं। हालांकि ग्रामीणों की ओर से कई बार पंचायत समितियों की बैठकों के अलावा जिला परिषद की बैंठकों में भी मामले को उठाया गया, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। 

इन गांवों में ट्यूबवेल का पानी खारा, फिर हो गया भुगतान

क्षेत्र के टैंबी, मरटवा, प्रतापुरा, बिछावाड़ी, वांक, सूंथड़ी, खासरवी, सुराचंद, जानवी, केसूरी सहित दो दर्जन से अधिक ग्राम पंचायतों में खुदवाए गए ट्यूबवेल का पानी खारा है। ऐसे में यहां के ग्रामीणों को पेयजल समस्या से निजात नहीं मिल पाई, लेकिन इन ट्यूबवेल के लिए एजेंसी को भुगतान कर दिया गया।

संदेह में भुगतान प्रक्रिया

आपदा प्रबंधन के तहत नेहड़ सहित बाढ़ प्रभावित गांवों में ग्रामीणों के हलकतर करने के लिए खुदवाए गए ट्यूबवेल के पानी की 45 दिन में जांच करवानी थी। इसके लिए ठेकेदारों को ट्यूबवेल से मीठा पानी निकलने का सर्टिफिकेट जारी किया जाना था। इसके बाद ही भुगतान करने का प्रावधान था, लेकिन जलदाय विभाग की ओर से बिना जांच के ही सरकारी खजाने को चूना लगाकर कई ठेकेदारों को खारा पानी होने के बावजूद करोड़ों का भुगतान किया गया। ऐसे में इस पूरे मामले में भ्रष्टाचार की बू आने लगी है।

ग्रामीणों के लिए अनुपयोगी

जलदाय विभाग की ओर से गांवों में लाखों रुपए की लागत से ट्यूबवेल खुदवाकर सरकार धन को चूना लगाया है। गांवों में खोदे गए ट्यूबवेल का पानी खारा होने से ग्रामीणों के लिए यह अनुपयोगी है। ऐसे में पेयजल के लिए परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
- मंगलसिंह राजपूत, ग्रामीण, मरटवा

नहीं निकल रहा समस्या का हल

ट्यूबवेल से माह में केवल एक-दो दिन पानी की आपूर्ति हो रही है। वह भी खारा पानी है। मीठे पानी की आपूर्ति के लिए कई बार जलदाय विभाग के अधिकारियों को अवगत करवाया, लेकिन कोई हल नहीं निकला।
- विराराम मोदी, ग्रामीण, प्रतापनगर खासरवी

पानी ही खारा है तो क्या करे

बाढ़़ के दौरान आपदा प्रबंधन के तहत नेहड़ के गांवों में पानी के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की थी, लेकिन अधिकांश ट्यूबवेल में पानी खारा निकला। ऐसे में समस्या का समाधान संभव नहीं है। हालांकि 80 गांवों में तो खारे पानी के चलते ट्यूबवेल खुदवाए ही नहीं गए। अगर पानी ही खारा है तो क्या कर सकते हैं।
- जयंत कानखेडिय़ा, अधिशासी अभियंता, जलदाय विभाग, सांचौर


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