मां चाहे तो अपने बच्चे को ज्ञानी व सतपुरूष बना सकती है - संत कृपाराम

जागरूक टाइम्स 352 Feb 25, 2021

रानीवाड़ा। निकटवर्ती गुजरात के धरणोधर गांव में स्थित श्री बाण माताजी एवं धोणारी वीर मोमाजी मंदिर परिसर में सवाजी पीराजी देवासी परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा महोत्सव के चौथे दिन गुरूवार को प्रवचन करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय संत कृपारामजी महाराज ने मां की महिमा बताते हुये कहा कि मां शब्द हमारी भारतीय संस्कृति का शब्द है और सार्थक शब्द है। मां चाहे तो अपने पुत्र को ज्ञानी व सतपुरूष बना सकती है लेकिन मां के लाड़ प्यार में बच्चा बिगड़ कर जेब कतरा, चोर डाकू भी बन सकता है। इसलिये इस युग में बच्चों को अच्छी शिक्षा व अच्छे संस्कार देने का सबसे पहला अधिकार मां का है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि बच्चे की पहली गुरू मां है।

मां को चाहिये कि जब सत्संग में आये तो अपने बच्चे को साथ में लेकर आये ताकि सत्संग मे बैठेगे तो सत्संग का असर तो उन पर जरूर पड़ेगा। कहते है कि संगत और पंगत दोनों एक साथ होने चाहिये, मतलब आप जब घर में पूजा पाठ करे तो घर के सभी सदस्य एक साथ बैठ कर करें और पंगत अर्थात जब भोजन करें तो एक पंक्ति बनाकर भोजन करें। इससे आने वाली नवयुवक पीढी में अच्छे संस्कार आयेगे और देशभक्ति की भावना भी उनमें जागृत रहेगी। अभी इस समय में हमारी नवयुवक पीढी थोड़ा रास्ता भटक रही है। वह अपने घरों में हीरो-हीरोईनों के फोटो लगाते है पर प्रभू के फोटो उन्हे पसंद नहीं है। आजकल यह कोई नहीं चाहता है कि हमारे घर में स्वामी विवेकानद, भगतसिंह, महाराणा प्रताप पैदा हो जाये। पाश्चात्य सभ्यता के कारण भारतीय संस्कृति पर कुठारघात हो रहा है।

हमें हमारी आन-शान को बचाये रखना चाहिये। महाराज ने अपने कथा प्रवचन में कहा कि जड़ भरत ने राजा रहुगण को आत्मज्ञान देते हुये कहा कि आत्मा अजर अमर है। वह न तो पानी में घुलती है और न ही अग्नि में जलती है तथा न ही वह मरती है। आत्मा इतनी सूक्ष्म होती है कि महंगी से महंगी दूरबीन से भी देखोगे तो भी आत्मा को नहीं देख सकते। क्योंकि आत्मा देखने का विषय नहीं है वह तो चिन्तन का विषय है। अजामिल प्रसंग को सुनाते हुये कहा कि अजामिल ब्राह्मण होते हुये भी वह कुसंग के कारण ब्राह्मण के कर्मों को छोड़ देता है। संग हमेशा अच्छा करे। सुसंग से हमारा जीवन आबाद जबकि कुसंग से हमारा जीवन बर्बाद होगा।

अजामिल ने फिर नारायण का एक ही नाम लिया ओर मोक्ष को प्राप्त हो गया। क्योंकि कहते है राम से बड़ा राम का नाम है परमात्मा का सच्चे मन से कोई एक भी नाम ले लेता है तो उसके सारे पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते है वह प्रभू के धाम तक पहुंच जाता है। महाराज ने भागवत कथा का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि राजऋषि भरत का मन अंत समय में हिरणी के बच्चे में रहने के कारण उनको अगले जन्म में हिरण बनना पड़ा था। नर से नारायण बनने की बजाय वे उल्टे नर से पशु बन गये। बालसंत ने कहा कि भारतीय संस्कृति भाईचारा एवं कौमी एकता की मिसाल कायम करती हैं। अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए क्योंकि हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि हम राम एवं कृष्ण की संताने हैं, यह अनुभुति हमेशा होनी चाहिए। संत के गुरू राजाराम महाराज के द्वारा आओं गोपाल तरस रहे नैना की प्रस्तुति पर श्रोता झूम उठे तथा बच्चे व महिलाएं अपनी स्थान पर खड़ी होकर नाचने लगी। इस दौरान बड़ी संख्या में आसपास के गांवों से भी श्रद्धालु कथा सुनने को पहुंच रहे है।


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