जोधपुर। चीनी जादू के सामने बुझ गई दीपों की ज्योति

IANS | Nov 7, 2018

आधुनिकता के दौर में दिवाली का त्यौहार भी अब रिवायत से दूर हो रहा है क्योंकि मिट्टी के दीपों की जगमग कहीं खो गई है और उसकी जगह बिजली के बल्ब और मोमबत्तियों ने ले ली है। दीयों को रंगों से चमकाने वाले कुम्हारों की जिंदगी बेरंग होती जा रही है क्योंकि कभी ये ही उनकी आय का साधन था। समय के साथ लोगों ने दीयों की बजाय मोमबत्तियों को महत्व देना शुरू कर दिया और रंबबिरंगी रोशनी से सजावट का चलन चल पड़ा जिससे दीये घरों से गायब होने शुरू हो गए।

लोगों ने यह समझना जरूरी नहीं समझा कि पर्यावरण को शुद्ध बनाने में घी अथवा तेल के दीयों की भूिमका कितनी महत्वपूर्ण होती है। अब लोग दीयों की अहमियत तथा रिवायत भूलकर बिजली की रंगबिरंगी लडियों पर जोर देते है। बाजार चीनी माल से अटे पड़े है जो पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है। दीवाली पर दीयों से दूर हो रहे लोग इन्हें मुंडेर काली करने वाले कहकर दुत्कार रहे है जिसका असर दीयों या अन्य मिट्टी के बर्तन बनाने वालों की जिंदगी पर सीधा पड़ रहा है। हमारे समाज का अटूट अंग प्रजापत भाईचारा जो दशकों से मिट्टी के बर्तन बनाने कारण मशहूर है लेकिन आज यह अपना पुश्तैनी काम त्याग कर अन्य धंधों की ओर चल पड़े है।