विश्व हिंदी सम्मेलन की खुमारी, क्या हिंदी भाषी होना गर्व का विषय!

जागरूक टाइम्स 126 Aug 25, 2018

हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए वर्षों से सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं-संगठन सक्रिय हैं। यह सच है कि पिछले कुछ सालों में हिंदी का झंडा पूरी दुनिया में बुलंद हुआ है। हाल ही में, विश्व हिंदी सम्मेलन भी मारीशस में अपनी 43वर्षों की यात्रा पूरी कर चुका है। मारीशस में संपन्न 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और हिंदी दोनों के खूब चर्चे रहे। हर बार की तरह इस बार भी यह मुद्दा गर्म रहा कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाना है। जाहिर है यह सब गौरव करने लायक बातें हैं। गौरव इस बात पर भी होना ही चाहिए कि आज पूरी दुनिया में हिंदी बोलने वालों की संख्या उतनी हो गई है, जितनी इस देश की आबादी है। इस लिहाज से वह दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बन गई है। कौन होगा जो इस पर गौरवान्वित नहीं होना चाहेगा। गौरव की बात यह भी है कि 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की कुल आबादी में से 41.03 फीसदी लोगों की मातृभाषा हिंदी है। अगर हिंदी को दूसरी भाषा के तौरपर प्रयोग करने वाले अन्य भारतीयों को इसमें शामिल कर लिया जाए तो देश के लगभग 75फीसदी लोग हिंदी बोल सकते हैं। आप कह सकते हैं कि इतने फीसदी भाषा के लोगों को समृद्ध और सशक्त होना चाहिए। अगर दुनिया की बात करें तो 80 करोड़ लोग हिंदी बोल या समझ सकते हैं। भारत के अलावा नेपाल, मारीशस, फिजी, सूरीनाम, युगांडा, दक्षिण अफ्रीका, ट्रिनिडाड एवं टैबेगो और कनाडा में भी बड़ी संख्या में हिंदी बोली और समझी जाती है।

इसके अलावा इंग्लैंड, अमेरिका, मध्य एशिया में इस गौरवमयी भाषा को बोलने और समझने वालों की कोई कमी नहीं है। हिंदी भाषा के साथ गौरव के पल उस समय और जुड़ जाते हैं जब हमें पता चलता है कि दुनिया के लगभग डेढ़ सौ विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ी और पढ़ाई जा रही है। इतना ही नहीं विभिन्न देशों के 91 विश्वविद्यालयों में 'हिंदी चेयर' है। लेकिन क्या इतना सब कुछ होने के बाद भी सचमुच हिंदी में रोजी रोटी कमाने वाले, हिंदी के पत्रकार, लेखक गर्व से यह कह सकते हैं कि उन्हें हिंदी भाषी होने पर गर्व है? दुनिया की बात अगर छोड़ भी दें तो क्या भारत में ही रहने वाले और हिंदी बोलने वाले हिंदी के जानकार होने पर गर्व का अनुभव करते हैं या कर सकते हैं? जब आप यह कहते हैं गर्व से यह कहते हैं कि मैं हिंदुस्तानी हूं या हिंदू हूं क्या इसी जज्बे के साथ आप हिंदी भाषी होने को स्वीकार कर सकते हैं। शायद नहीं। इसकी अपनी वजहें हैं। हमने आजादी के सत्तर सालों में हिंदी को लगातार हाशिये पर जाते देखा है। एक तरफ हिंदी का प्रचार प्रसार बढ़ता रहा तो दूसरी तरफ हिंदी की अहमियत कम होती चली गई। हम लगातार हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी को तरजीह देते रहे।

हमने देखा है कि किस तरह सिर्फ अंग्रेजीदां होने पर ही आपके सम्मान में बढ़ोत्तरी हो जाती है। अंग्रेजी बोलते ही आप विशिष्ट हो जाते हैं। छोटी-छोटी घटनाओं से ही आप रोज यह बात देखते और समझते होंगे। आप कहीं भी जाते हैं, रेस्तरां में, अच्छे होटलों में, माल में, सिनेमाघरों में...आप पाते हैं कि अंग्रेजी न आने पर आप खुद को कितना छोटा महसूस करते हैं। वेटर से लेकर टिकट काउंटर पर बैठा व्यक्ति भी आपके सामने अंग्रेजी बोलता है और आपको यह अहसास कराता है कि अंग्रेजी न सीखकर आपने कोई अपराध किया है। बावजूद इसके यह भी सच है कि हिंदी का जितना बड़ा बाजार आज है शायद उतना बड़ा कभी नहीं रहा। अखबार, चैनल, प्रकाशन, हिंदी की सरकारी पत्रिकाएं, बॉलीवुड क्या नहीं है, हिंदी में। लेकिन वस्तुस्थित इस बड़े बाजार के बावजूद एकदम उलट है। आप हिंदी की पत्रकारिता करना चाहते हैं, तो उसके लिए भी आपको अंग्रेजी आना जरूरी है। क्योंकि हिंदी अखबारों में काफी सामग्री अंग्रेजी से ही अनूदित होकर छपती है। आप बॉलीवुड में काम करना चाहते हैं तब तो अंग्रेजी का आना और भी जरूरी है।

बॉलीवुड में हिंदी की पटकथाएं रोमन में लिखी जाती हैं और हिंदी फिल्मों में काम करने वाला बहुत सी अभिनेत्रियां ऐसी हैं जिन्हें हिंदी नहीं अंग्रेजी आती है। इन तमाम जगहों पर अंग्रेजी भाषा का जानकार ही डोमिनेट करता है। कहते भी हैं कि अंग्रेजी सत्ता की भाषा है और हिंदी मेहनतकश लोगों की। इसलिए इन सभी जगहों पर केवल हिंदी दां होने की वजह से आप पिछड़ जाते हैं। फिर क्यों आप अपने बच्चों को हिंदी पढ़ानी चाहिए इसे हिंदी वालों का पाखंड ही कहा जा सकता है लेकिन यह सच है कि हिंदी के अधिकांश साहित्यकार अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाते हैं। वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे हिंदी में काम करके वही तकलीफें झेलें जो उन्होंने स्वयं झेली हैं। अगर आप हिंदी के 'औरा' से बाहर निकलकर देखेंगे तो पाएंगे कि हिंदी की ताउम्र वकालत करने वालों के बच्चे भी हिंदी ठीक से नहीं बोल पाते या बोलना नहीं चाहते। यही वजह है कि ये सब लोग सत्ता के अधिक निकट होते हैं। सत्ता से यहां अर्थ केवल सरकार ही नहीं बल्कि हर तरह की सत्ता से है।

आखिर क्यों हिंदी के प्रतिष्ठित लेखकों को यह तक कहना पड़ता है कि वे हिंदी में लिखकर शर्मिंदा हैं? क्या वजह है कि करोड़ों लोगों की इस हिंदी भाषा के प्रकाशक सालों में एक हजार किताबें नहीं बेच पाते? क्यों दिन रात प्रकाशकों की ओर से यह प्रलाप चलता रहता है कि हिंदी की किताबें बिकती नहीं हैं? क्यों हिंदी का लेखक दूसरी तमाम भाषाओं के लेखकों के मुकाबले सबसे गरीब पाया जाता है। जो भाषा आपको रोटी नहीं दे सकती, जीने की कम से कम सुविधाएं नहीं दे सकती, जिसके बोले जाने पर आप समाज में खुद को छोटा या अपमानित महसूस करते हैं, क्या उस भाषा पर गर्व किया जाना चाहिए? दिन रात हिंदी के प्रचार प्रसार का ढोल पीटने वाले भी इस तथ्य से वाकिफ हैं, इसलिए वे अंग्रेजी सीखकर हिंदी के प्रचार प्रसार में लगे हैं। वे इज्जत और शोहरत दोनों कमा रहे हैं। एक और विडंबना यह भी कि हिंदी सेवी के बच्चे जब अंग्रेजी सीखकर अच्छे पदों पर पहुंच जाते हैं तो वही कहते हैं कि आपको अंग्रेजी में काम करना चाहिए। तब आपको भी अपने हिंदी दां होने पर शर्म सी महसूस होती है। ऐसे में भी क्या आप अपने हिंदीभाषी होने पर गर्व कर सकेंगे?


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