खेती में पानी की कमी ... भविष्यवाणी, बचाव और रोकथाम

जागरूक टाइम्स 161 Oct 16, 2018

2016-17 में भारत में खाद्यान्न उत्पादन 271.988 मिलियन टन था। हालांकि, 2020 तक खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए देश के किसानों को 300 मिलियन टन उत्पादन करने की जरूरत है। भारतीय कृषि बड़े पैमाने पर मानसून पर निर्भर करती है और अब तक बारिश में 10 प्रतिशत की कमी आई है। वैसे, आईएमडी ने अगस्त और सितंबर में सामान्य बारिश की भविष्यवाणी की थी।

स्कायमेट ने भविष्यवाणी की थी कि मानसून आगे जाकर कमजोर पड़ जाएगा और अनाज, दालों, तिलहन, इत्यादि की फसलों के पैदावार पर प्रभाव पड़ेगा। फसलों, जमीन के इस्तेमाल के तरीकों के बदलाव, भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन, सिंचाई और जलनिकासी ने भारत के कई मौसमी क्षेत्रों और नदी घाटियों के जलीय चक्र को बदल दिया है।

बारिश अनियमित है और संपूर्ण बारिश 'सामान्य' होने के बावजूद, बारिश का वितरण समय, भौगोलिक पहुंच और क्षेत्रीय वितरण के अनुसार असामान्य हो सकता है। इस तरह की प्राकृतिक असंगतता हमारे कृषि उत्पादन को प्रभावित करती है और फिर उसका प्रभाव जीडीपी और महंगाई दर पर पड़ता है। हाल ही में सरकार ने घोषणा की है कि सूखे की वजह से होने वाली क्षति, भूमि क्षरण और मरूस्थलीकरण, जीडीपी (92.7 लाख करोड़ रुपए) का 2.54 प्रतिशत है। इस बेहद गतिशील मानसून के प्रभाव को कम करने के लिए कुछ उपाय दिए गए हैं:

(1) पानी का प्रभावी प्रबंधन : हमें सरफेस और बाढ़ सिंचाई की जगह माइक्रो, सब-सरफेस या स्प्रिंकलर सिंचाई अपनाकर मानसून पर निर्भरता को कम करने की जरूरत है। वाष्पीकरण की वजह से होने वाली क्षति को कम करने के लिए पलवार करने को बढ़ावा देना चाहिए। जब किसानों के पास ज्यादा पानी होता है तो उन्हें अधिक सिंचाई करने की आदत होती है, कई बार यह दूसरे किसानों की कीमत पर होता है, जैसे जो लोग नहर के आखिरी छोर पर रहते हैं।

किसानों को अत्यधिक सिंचाई के नुकसान के बारे में जानकारी देना जरूरी है। खेतों पर नहर बनाना आवश्यक कर देना चाहिए, खासतौर से सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में। सीपेज के नुकसान से बचने के लिए नहर के किनारे (कैनाल लाइनिंग) बनाना आवश्यक कर देना चाहिए। सरकारी जमीनों पर छोटे-छोटे बांध और जल प्रतिधारण तालाब स्थलीय सर्वेक्षण पर आधारित होना चाहिए। इनका निर्माण पूरे भारत में होना चाहिए। यदि अच्छी सड़कें देश की तरक्की का प्रतिबिंब हैं तो बेहतर नहरें सुदृढ़ कृषि अर्थव्यवस्था का प्रतिबिंब है। यदि हर एक किमी. सड़क के साथ बेहतर किनारों वाली नहरों का निर्माण किया जाए तो यह बहुत अच्छी बात होगी।

(2) मौसम की भविष्यवाणी की व्यवस्था : भारत में मौसम की कई और बेहतर भविष्यवाणी करने वाली वेधशालाओं की जरूरत है। मौसम उपग्रहों तथा और भी ज्यादा ग्राउंड स्टेशनों का प्रयोग करने और ब्लॉक स्तर पर अपने मॉडलिंग में सुधार व मौसम की भविष्यवाणी का प्रसार करने से किसानों को अधिक मदद मिलेगी। इससे शायद आईएमडी और स्कायमेट की भविष्यवाणी के बीच का अंतर मिटेगा। आईएमडी ने, 2021 तक अपने एडब्ल्यूएस और एआरएस को 5-8 गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा है।

(3) जलवायु अनुकूलित किस्में : अच्छे किसान हमेशा ही कृषि अनुकूलन के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे। उदाहरण के लिए, अब भारत में स्ट्रेस टॉलरेंट राइस फॉर अफ्रीका एंड साउथ एशिया (एसटीआरएएसए) प्रोजेक्ट द्वारा जलवायु अनुकूलित चावल की किस्मों को प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा है। सीडनेट के अनुसार, एसटीआरएएसए द्वारा जारी किए जाने वाली चावल की किस्मों ने 2017 में खरीफ के मौसम में कुल मांग के 27 प्रतिशत को पूरा किया था। बाढ़ और सूखा दोनों को झेल सकने वाली चावल की किस्में जैसे स्वर्ण-सब1, सांबा- सब1, सहभागी धान और डीआरआर42 सर्वश्रेष्ठ 10 किस्मों में हैं। किसानक्राफ्ट एरोबिक चावल को विकसित और प्रचारित कर रहा है, जोकि पानी की खपत को 50 प्रतिशत कम करता है, जीएचजी उत्सर्जन को कम करता है और पैदावार उतनी ही होती है।

(4) पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेस : किसानों को बताए गए पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेस को अपनाने के बारे में जानकारी देनेभर से ही फसलों की पैदावार और आय में वृद्धि होगी। गर्मियों में जुताई, फसलों का रोटेशन, हरी खाद, बेहतर जुताई, उचित अंतराल, समय पर अंतर-खेती, खरपतवार की सफाई, खाद, कीटनाशकों का छिड़काव और फसलों की कटाई जैसे अभ्यास मौजूदा वैज्ञानिक तकनीकों द्वारा करने चाहिए। जैसे, भारत प्रति हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में 170 किलोग्राम उर्वरक का प्रयोग करता है, वहीं यूएसए केवल 130 किलोग्रा. प्रति हेक्टेयर का इस्तेमाल करता है, लेकिन पैदावार ज्यादा अच्छी होती है।

उर्वरकों या कीटनाशकों का प्रयोग करने के दौरान, 'कौन-सा प्रकार, कब और किस तरह', 'कितनी मात्रा' जितना ही महत्वपूर्ण है। खाद की बताई गई मात्रा का प्रयोग एक ऐसी प्रैक्टिस है, जिसे किसानों को पुन: अपनाने की जरूरत है। चावल के मामले में, यह एक ऐसी फसल है जोकि सिंचित क्षेत्र के 28 प्रतिशत को ढक लेता है, ऐसे में पानी को बचाने और पैदावार को बढ़ाने के लिए कुछ खास तरह की प्रणालियां जैसे एडब्ल्यूडी और एसआरआई को अपनाने की जरूरत है।

(5) व्यवसाय द्वारा खेती करना : वर्तमान में भारत में गैर-रोपण फसलों की व्यवसायिक खेती करने की अनुमति नहीं है। किसानों के पास जोखिम लेने की सबसे कम क्षमता होती है और उनमें अपने आस-पास के इलाकों की अन्य सफल व्यवस्था को देखकर अपने प्रैक्टिस को बदलने की ज्यादा आदत होगी। सरकार के पास पर्याप्त मॉडल खेत नहीं हैं। व्यवसाय को कृषि में लाने की अनुमति से गांवों में उन्नत वैज्ञानिक प्रणालियां आएंगी। कई सारे आइडियाज को आजमाना जरूरी है; लेकिन हमें देश में कृषि संकट से निपटने के लिए सब्सिडी और आर्थिक मदद से आगे जाना होगा।


Leave a comment