न्याय की पारदर्शी उम्मीदों के प्रतीक, भारत के नए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई

जागरूक टाइम्स 163 Oct 4, 2018

सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से यह सिलसिला रहा है कि वकील अपने मुकदमों को अंकित कराने व ताजी दाखिल की गईं याचिकाओं की जल्द सुनवाई का आग्रह करने के लिए रोजाना लंबी कतार लगा लेते थे, लेकिन 410 दिन के लिए भारत के 46 वें मुख्य न्यायाधीश बनते ही जस्टिस रंजन गोगोई ने मुकदमा प्रबंधन के संदर्भ में जबरदस्त परिवर्तनों के संकेत देते हुए पहला ही आदेश यह दिया कि आज (3 अक्टूबर 2018) से हर मुकदमे की अपने क्रमानुसार सुनवाई होगी यानी वरीयता प्रदान करके कोई मुकदमा जल्द (अपने क्रम से पहले) नहीं सुना जाएगा, केवल इस अपवाद के कि मामला किसी को फांसी दिए जाने का हो या किसी को उसके घर से निकाला जा रहा हो। गौरतलब है कि जस्टिस गोगोई उन चार न्यायाधीशों में शामिल थे, जिन्होंने कुछ माह पहले तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरुद्ध 'विद्रोह' किया था, यह आरोप लगाते हुए कि कुछ याचिकाओं को जानबूझकर समय पूर्व वरीयता दी जाती है और उन्हें अपनी पसंद के न्यायाधीशों की खंडपीठ को सौंपा जाता है। इसलिए उनसे यह अपेक्षा तो थी ही कि वह उन बातों पर तो अमल करेंगे जिनको लेकर उन्होंने 'विद्रोह' किया था; जिसकी एक बानगी उन्होंने मुख्य न्यायाधीश बनते ही अपने पहले आदेश में दे दी है। आगे भी यही कुछ देखे जाने की संभावना है; क्योंकि जस्टिस गोगोई मुकदमों व न्यायिक प्रशासन के मामलों में 'सख्त व पूर्णतावादी' हैं।

इस बारे में उनका कहना है, 'मैं जो हूं वह हूं और मैं अपने आपको बदल नहीं सकता।' बावजूद इसके जस्टिस गोगोई के समक्ष बड़ी चुनौतियां हैं, जबकि उनकी कार्यावधि काफी कम है। वह लगभग 13 माह बाद रिटायर हो जाएंगे। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लंबित पड़े मुकदमों की संख्या लाखों में नहीं करोड़ों में है (निचली अदालतों में 2.78 करोड़, 24 हाईकोट्र्स में 32.4 लाख व सुप्रीम कोर्ट में लगभग 55 हजार से ज्यादा मामले फिलहाल लंबित हैं) और इनमें निरंतर वृद्धि हो रही है। जस्टिस गोगोई का कहना है कि उनके पास लंबित पड़े मुकदमों से निपटने की एक योजना है, जिसका अभी उन्होंने खुलासा नहीं किया है। दरअसल, त्वरित न्याय व मुकदमों के तेजी से निपटारे में सबसे बड़ी अड़चन, जिसे जस्टिस गोगोई भी स्वीकार करते हैं, यह है कि निचली अदालतों व हाईकोट्र्स में रिक्त स्थान बहुत हैं। जिला व निचली अदालतों में इस समय 5925 न्यायिक अधिकारियों की कमी है और 31 अगस्त तक हाईकोट्र्स में रिक्त स्थान 40 प्रतिशत हो गए यानी स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या 1079 है और काम सिर्फ 652 न्यायाधीश कर रहे हैं।

फिर हर साल औसतन 75-85 न्यायाधीश रिटायर हो जाते हैं। इस पृष्ठभूमि में जस्टिस गोगोई समाज के गरीब व कमजोर वर्गों को न्याय उपलब्ध कराना अपनी वरीयता बनाना चाहते हैं। वह कहते हैं, 'दो चीजें मुझे परेशान कर रही हैं, एक है लंबित पड़े मुकदमों की संख्या, जिससे न्यायिक व्यवस्था को काफी बदनामी उठानी पड़ती है। यह समस्या व्यवस्था को ही अर्थहीन बनाने की क्षमता रखती है। दूसरी समस्या यह है कि अपराधिक मामलों में आरोपियों को सुनवाई का अवसर तब मिलता है, जब वह अपनी सजा का समय ही पूरा कर लेते हैं, जबकि दीवानी मामलों में पार्टियों को निर्णय 2-3 पीढिय़ों के बाद मिलता है। यह गंभीर समस्या है। लेकिन यह अधिक कठिन समस्या नहीं है और इसका समाधान हो सकता है। मेरे पास इसके लिए एक योजना है, जिसका मैं जल्द खुलासा करूंगा।' गरीबों व हाशिये पर पड़े लोगों के समक्ष कठिनाइयां अवश्य हैं और यह बात भी किसी से छुपी हुई नहीं है कि राजनीतिक व्यवस्था अक्सर उनको सहारा देने की बजाये उनसे मुंह मोड़ लेती है। ऐसी स्थिति में जनहित याचिकाओं व न्यायिक सक्रियता से आम जनता को बहुत राहत मिली है।

लेकिन जस्टिस गोगोई जनहित याचिकाओं को प्राथमिकता देने और कार्यकारिणी व विधायिका के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करने के पक्षधर नहीं हैं। इसलिए मुख्य न्यायाधीश बनने के पहले ही दिन उन्होंने वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा, 'हम यहां इसलिए नहीं बैठे हैं कि देश के समक्ष जो समस्याएं हैं उन सबको सुधारें व उनकी निगरानी करें। क्या अदालत यह सब कर सकती है? पीडि़त पार्टियां अपनी परेशानियां सरकार के सामने रखें और वही फॉलो अप करें।' दरअसल, जस्टिस गोगोई का बल 'संविधानिक प्रेम' (कांस्टीटियूशनल पेट्रियटिज्म) पर है और वह इसे ही जनता में जागृत करने के इच्छुक हैं। वह कहते हैं, 'हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब संसार में जबरदस्त राजनीतिक मंथन हो रहा है। हम पहले से कहीं अधिक वर्ग, जाति, धर्म व अन्य पहचानों से विभाजित हैं...यह मुद्दे हमें आपस में बांटते हैं और जो भिन्न हैं, उनका तिरस्कार किया जाता है। हमारा साझा विजन संविधान में है। हमारे पास संविधान पहचान के लिए विजन होना चाहिए। जब भी कोई शक होगा तो संवैधानिक नैतिकता ही हावी रहेगी। यही सच्चा संवैधानिक प्रेम है।'

उत्तर पूर्व से देश के पहले मुख्य न्यायाधीश बनने वाले जस्टिस गोगोई 28 फरवरी 2001 को गुवाहाटी हाईकोर्ट के स्थाई न्यायाधीश बने थे और 23 अप्रेल 2012 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने थे। 17 वर्ष बतौर न्यायाधीश रहने के बावजूद उनके कुल एसेट्स सुप्रीम कोर्ट के एक सफल वरिष्ठ वकील की दैनिक आय (लगभग 50 लाख रुपए) से भी कम है। जस्टिस गोगोई के पास कोई सोने का आभूष्ण नहीं है, उनकी पत्नी के पास केवल वही जेवर हैं जो उन्हें अपने विवाह के समय अपने पेरेंट्स से मिले थे। उनके पास अपना कोई व्यक्तिगत वाहन नहीं है और न ही वह स्टॉक मार्किट में कोई लेन देन करते हैं। उनपर कोई ऋण नहीं है और न ही कोई ऐसा बिल है जो अदा न किया गया हो। जस्टिस गोगोई व उनकी पत्नी का कुल बैंक बैलेंस, एलआईसी पालिसी सहित, मात्र 30 लाख रुपए है। एक प्लाट उन्होंने 1999 में खरीदा था, जिसे उन्होंने इस साल जून में 65 लाख रुपए का बेचा और खरीदार का नाम भी घोषित किया। उनके पास एक और प्लाट है जिसे उनकी मां ने उनके व उनकी पत्नी के नाम जून 2015 में ट्रान्सफर किया था। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि जस्टिस गोगोई बहुत ईमानदार हैं और न्यायिक व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए भी उनके विचार एकदम स्पष्ट हैं, लेकिन इस काम के लिए उन्हें दुर्भाग्य से बहुत कम समय मिला है।  

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