विकास की नंगी और निर्लज्ज हकीकत के बीच, गांधी भक्ति का बढ़ता उन्माद

जागरूक टाइम्स 207 Oct 1, 2018

गांधीजी आज अगर कहीं चुपके से आ जाएं और अपने जन्मदिन के नाम पर पूरे देश में होने वाले तमाशे को देखें, तो बहुत संभव है वे डर जाएं। क्योंकि 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती का दिन आज एक मेगा इवेंट में तब्दील हो चुका है। क्या केंद्र सरकार, क्या राज्य सरकारें, क्या कारपोरेट सेक्टर और क्या एनजीओ। सबमें इस दिन गांधी के प्रति सम्मान दिखाने, उनके प्रति भक्ति दिखाने की होड़ लग जाती है। वास्तव में समाज के सत्ताधारी तबकों ने गांधी को एक ऐसी आदर प्रतिमा में बदल दिया है, जिसकि अनदेखी तो नहीं की जाती, लेकिन उसकी सुनी बिलकुल भी नहीं जाती। चूंकि इस 2 अक्टूबर को उनके 150 वें जन्म वर्ष शुरुआत हो रही है इसलिए इस बार तो उनकी प्रतिमा पूजा के लिए और ही ज्यादा होड़ है। सुनने में आ रहा है कि इस साल अकेले केंद्र सरकार और उसके विभिन्न अंग ही 500 से ज्यादा कार्यक्रम 2 अक्टूबर के दिन कर रहे हैं। राज्य सरकारों और उनके विभिन्न अंगों के कार्यक्रमों की संख्या भी हजारों में होगी।

पिछले कुछ सालों से कारपोरेट सेक्टर भी बड़े जोर-शोर से गांधी जयंती मनाने लगा है और एनजीओ तो सबसे ज्यादा नाम ही गांधी का रटता है। हैरानी सिर्फ गांधी जयंती के मौके पर थोक के भाव होने वाले ये कार्यक्रम ही नहीं हैं, बल्कि बेशर्मी यह भी है कि इन सभी कार्यक्रमों में गांधीजी की इच्छा का स्मरण करते हुए सभी जगह गांधीजी की भावनाओं का सम्मान करने का भी खूब दिखावा किया जाता है। हर ऐसे कार्यक्रम में गांधीजी के शब्दों को दुहराते हुए कतार में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन लाने की बात कही जाती है। जबकि हकीकत यह है कि हर गुजरते साल के बीच ही नहीं बल्कि अब तो हर गुजरते दिन के बीच भी आम आदमी पहले से और ज्यादा दयनीय और निरीह होता जा रहा है। दो साल पहले 14 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए नोटबंदी पर कहा था, 'आपने मुझे भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए पीएम बनाया था। भ्रष्टाचार बंद करने के लिए हमने 500 और1000 के नोट बंद किए।

नतीजा यह है कि आज गरीब चैन की नींद सो रहा, अमीर नींद की गोली खरीद रहा है।' भाषण स्तर पर तो यह जुमला खूब जमा। मगर जरा सोचकर देखिये क्या वाकई नोटबंदी से गरीब चैन की नींद सोया है और अमीर की नींद उड़ी है? शायद ही इस हकीकत से किसी का पाला पड़ा हो। मगर यह झूठ है यह कौन सुनेगा? कहते रहिए, सोचते रहिए, टोकते रहिए कि यह गांधी के प्रति सच्ची आस्था और श्रद्धांजली नहीं है। लेकिन न तो गांधी को भुनाने वाले लोग मान जाएंगे और न ही उन्हें मेगा इवेंट में तब्दील करने वाली ताकतें पीछे हटेंगी। भारत को दुनिया के विकास का इंजन बताया जा रहा है। एक तबके के हिसाब से यह झूठ भी नहीं है क्योंकि हिन्दुस्तान में एक सीमित तबके के पास धन का अंबार बढ़ता जा रहा है लेकिन युवाओं का बहुमत कुंठा में जीवन गुजार रहा है।

एक तरफ हम गांधी को रटना तेज कर रहे हैं, कतार में सबसे पीछे खड़े आदमी पर मुन्ह्जुबानी सहानुभूति की बारिश कर रहे हैं और दूसरी तरफ ऑक्सफेम की रिपोर्ट बताती है कि भारत में साल 2017 में कुल संपत्ति के सृजन का 73 प्रतिशत हिस्सा केवल एक प्रतिशत अमीर लोगों के हाथों में था। वैसे यह किसी एक रिपोर्ट या सर्वे की बात भी नहीं है गांधीजी के नाम पर असंख्य कार्यक्रम करने वाले इस देश में तमाम रिपोर्टें और सर्वे यही सच बता रहे हैं कि आर्थिक नीतियों और उदारीकरण के कारण देश के 17 फीसदी लोग करोड़ों-करोड़ों रुपए और अपार संपत्ति के मालिक हो गए हैं जबकि 83 फीसदी आम लोग गरीबी में जीवन बसर कर रहे हैं। गांधीजी कहते थे आजादी के बाद हिंदुस्तान को गांवों का गणतंत्र बनना है। अमीरी-गरीबी का दुश्चक्र खत्म करना है। मजे की बात यह है कि आजादी के बाद से आज तक केंद्र में एक भी ऐसी सरकार नहीं आई जो गांधीजी को सार्वजनिक तौरपर अपना आदर्श न बताती रही हो। इसके बावजूद आम आदमी दिन पर दिन और दरिद्र होता जा रहा है, जबकि पहले से सम्पन्न लोग और ज्यादा संपन्न होते जा रहे हैं।

सिर्फ हिन्दुस्तान के स्तर पर ही यह नहीं हो रहा, बल्कि यूएन के स्तर पर भी यही सब हो रहा है। बट्रांस्फॉर्मिंग अवर वल्र्ड : द 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट के नाम से एक वैश्विक संकल्प व्यक्त किया गया है, जिसे सतत विकास लक्ष्यों के नाम से भी जाना जाता है। इस संकल्प में भारत सहित 193 देशों ने सितंबर, 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक उच्च स्तरीय पूर्ण बैठक में स्वीकार किया था कि एक जनवरी, 2016 से लागू होने वाले सतत विकास लक्ष्यों से आम गरीब लोगों की स्थिति बेहतर होगी। वास्तव में इस संकल्प का उद्देश्य भी वही हैं जो विकास के लक्ष्य पर गांधीजी के भी उद्देश्य थे। सबके लिए समान, न्यायसंगत, सुरक्षित, शांतिपूर्ण, समृद्ध और रहने योग्य विश्व का निर्माण करना। इससे विकास के तीनों पहलुओं, अर्थात सामाजिक समावेश, आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को व्यापक रूप से बल मिलता है।

लेकिन क्या हकीकत के धरातल में यह कहीं दीखता है? ह्युमन डेवलपमेंट रिपोर्ट 2002 में कहा गया था कि हालात में सुधार लाने की बहुत-सी नेक कोशिशों के बावजूद 'कई देशों में, 10,20 और कुछ मामलों में 30 साल पहले के मुकाबले आज और भी ज्यादा गरीबी है।' तब कुछ लोगों ने इस रिपोर्ट का यह कहकर विरोध किया था कि यह भड़काने वाली है। लेकिन जो सवाल इस रिपोर्ट से तब खड़े हुए थे, अब भी वही सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या सचमुच इस देश में या दुनिया में कभी गांधीजी के सपनों के मुताबिक विकास होगा? क्या सचमुच कतार में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति की ईमानदारी से कभी कोई मदद होगी? क्या उसे आत्मनिर्भर बनाने, अपने पैरों पर गर्व से खड़ा करने की वास्तव में कोशिशें होंगी या अब उनके जन्म दिन के नाम पर भी साल दर साल सिर्फ मेगा इवेंट का तमाशा ही होगा?


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