केरल की महात्रासदी : आपदा प्रबंधन के कई बड़े सबक

जागरूक टाइम्स 273 Aug 21, 2018


केरल में हुई पिछले सौ साल की रिकॉर्ड तोड़ बारिश और उससे पूरे प्रदेश के जलमग्न होने की विभीषिका हमारे देश में समय-समय पर आने वाली महाआपदाओं के श्रेणी की नवीनतम कड़ी है। लेकिन इस पर हम कोई विशेषज्ञीय टिप्पणी करें इससे पहले हमें इस तथ्य से अवगत होना होगा कि भारत प्राकृतिक विविधताओं से परिपूर्ण देश है, जहां भिन्न-भिन्न भौगोलिक संरचना के साथ-साथ जलवायवीय परिस्थितियां भी भिन्न-भिन्न हैं। ऐसे में देश के विभिन्न स्थानों में प्राकृतिक आपदाओं का आगमन अवश्यंभावी है। देश में ऐसे कई इलाके हैं जहां अतिवृष्टि तथा नदियों की संख्या ज्यादा होने से हर साल बाढ़ की विनाश लीला झेलनी ही पड़ती है। भारत का समुद्र तट काफी लंबा है, जहां कभी भी चक्रवाती तूफान और सूनामी जैसे आपदाओं के लिए तैयार रहना पड़ता है। दूसरी तरफ देश के कई हिस्से ऐसे हैं, जहां बारिश कम होने तथा नदियों की संख्या कम होने से सूखे का सामना करना पड़ता है। भारत से हिमालय पर्वत श्रृंखला का बहुत बड़ा हिस्सा जुड़ा रहने से इसके निकटवर्ती इलाकों में जमीनें दरकने, बादल फटने और भूकंप की घटनाएं आम बातें हैं। भारत का बहुत बड़ा हिस्सा भूगर्भ वैज्ञानिकों के मुताबिक अति तीव्रता और सामान्य तीव्रता वाले भूकंप की श्रेणी में आता है।

जहां तक केरल की बात है तो वह भारत में हर साल आने वाले द.प.मानसून का भौगोलिक प्रवेशद्वार है। पिछले कुछ दशकों में देखें तो देश में प्राकृतिक आपदा की एक नहीं दर्जनों घटनाएं हुई हैं। इनमें वर्ष 1999 में आया ओडि़सा में चक्रवाती तूफान, लातूर-कच्छ-गढ़वाल में आए विनाशकारी भूकंप, बिहार में कोशी व असम में ब्रह्मपुत्र नदियों की बाढ़ से हुई विनाशलीला, विदर्भ-राजस्थान-गुजरात जैसे इलाकों में सूखा, दक्षिण भारत में 2004 में आई सूनामी, वर्ष 2013 में उत्तराखंड तथा 2014 में कश्मीर में आए सैलाब से देश के हजारों लोगों को मौत की मौत हो चुकी है। आपदा पूर्व की तैयारियों की बात करें तो हमारे मौसम विभाग का कार्य बेहद अहम है। यदि इनके पास सारी तकनीकी सुविधाएं मौजूद हों और इनके विशेषज्ञ हमेशा चौकस हों तो आपदा आगमन के ठीक पहले आने वाली तबाही और त्रासदी को लेकर लोगों को आगाह किया जा सकता है। देश में आपदा प्रबंधन की समूची कार्य प्रणाली चाहे वो सरकारी स्तर पर हो या निजी और गैर सरकारी सगठनों के जरिये कार्यरत हो, उनके बीच आपस मे एक व्यापक समन्वय बनाकर इसे वैज्ञानिक और सुनियोजित तरीके से स्थापित किया जाए और फिर इसका संचालन किया जाए तो आपदाओं की मार को कम किया जा सकता है।

आमतौर पर हमें सभी तरह के आपदा प्रबंधन पेशेवरों मसलन मौसम वैज्ञानिकों, आपदा विशेषज्ञों, तैराकों, फौज, पुलिस, डाक्टर तथा पैरामैडिकल कार्यकर्ताओं इत्यादि का एक ऐसा नेटवर्क चाहिए होता है जो देश में आपदा पूर्व व उसके बाद की तैयारी के लिए हर तरह से चाक चौकस और हर तरह के बचाव अभियान में फुल प्रूफ हो। दूसरा हर तरह की आपदा के पूर्व व बाद के लिए जरूरी सामग्रियों मसलन बाढ़ व तूफान के समय हेलीकाप्टर, बोट, पंप सेट, जनरेटर तथा आपातकालीन पुल व बांध बनाने की सामग्री, सूखे के समय कृत्रिम बारिश, वाटर टैंक, अनाज स्टाक तथा सप्लाई लाइन वगैरह, जबकि इसी तरह भूकंप व भूस्खलन के समय कैंप होम इत्यादि की सुविधा। हर तरह की आपदा में त्वरित तरीके से पैकेज्ड खाने की पर्याप्त उपलब्धता की तो हमेशा दरकार होती है। केरल में अभी स्वयंसेवी संगठनों के जरिये खाना सुलभ है पर उन्हें आपदा प्रभावित लोगों तक पहुंचाना सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। यह सही है कि आपदा प्रबंधन की पूर्व व बाद की तैयारियों के लिए विशाल संसाधन की आवश्यकता पड़ती है, जिसमें आपदा चेतावनी यंत्रों की उपलब्धता के साथ-साथ तकनीकी पेशेवरों की उपस्थिति भी शामिल है।

एक गरीब अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए इन कार्यों के लिए संसाधन जुटाना मुश्किल होता है। आम तौरपर जब भी कहीं आपदा आती है तो उस देश के अन्य हिस्से के लोगों के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी उदारता से दान दिए जाने की परंपरा निभाई जाती है। अत: इन परिस्थितियों में गरीब देशों में भी आपदा फंड की किल्लत नहीं होती है। परंतु आपदा काल में किए जाने वाले धन व संसाधन के व्यय में बंदरबांट व भ्रष्टाचार की संभावनाएं भी उतनी ज्यादा होती हैं। कई बार आपदा व्यय के सार्वजनिक ऑडिट नहीं होने की वजह से भ्रष्टाचारियों की बल्ले-बल्ले हो जाती है। जरूरत इस बात की होती है कि आपदा प्रभावित राज्य और देश की सरकारें और उनकी संबंधित प्रशासनिक इकाईयां कितने बेहतर तरीके से आपदा पूर्व और आपदा बाद प्रबंधन के बेहतर समन्वय और नवीन प्रौद्योगिकी के जरिये इसकी स्मार्ट तैयारियां करती हैं। आपदा प्रबंधन की तैयारियों की शुरूआत सबसे पहले विभिन्न तरह की आपदा परिस्थितियों में आम लोगों को बचने, संभलने-संभालने, हिदायतें बरतने और सभी तरह के निर्माण संबंधी निर्देशों का प्रभावी तरीके से पालन करने हेतु एक व्यापक जनजागरण अभियान चलाने से होनी चाहिए।

इसे देशव्यापी अभियान का एक हिस्सा बनाना चाहिए। इसके लिए स्कूलों, ऑफिसों, गांव-देहातों, सार्वजनिक स्थलों में आपदा नियंत्रक प्रशिक्षकों द्वारा लगातार प्रशिक्षण और चेतना जगाने वाला कार्यक्रम होते रहना चाहिए। वर्ष 2004 में इंडोनेशिया में जहां सूनामी का केंद्र था, वहां से सूनामी लहरों को दक्षिण भारत के समुद्र तटों तक आने में 45 मिनट का समय लगा। तभी यह महसूस किया गया कि उस समय यदि सूनामी की पूर्व चेतावनी देने वाले उपकरण भारत में मौजूद होते तो उस समय देश की हजारों जानें तथा उनकी संपत्ति को बचाया जा सकता था। इसी तरह से 1999 में ओडि़सा में भी भयानक चक्रवात तूफान की पूर्व सूचना संभव नहीं हो पाई और पचास हजार से ज्यादा जानें तबाह हो गई। शुक्र इस बात का है यही चक्रवात जब 2013 में ओडि़सा में आया तो इसकी पूर्व सूचना मिल जाने पर राज्य सरकार ने बेहतरीन तरीके से उसकी सारी तैयारी कर ली और इसके नतीजतन वहां जानमाल की न के बराबर क्षति हुई। शुक्र है कि आज की तारीख में हमारे पास सूनामी व चक्रवात की पूर्व चेतावनी देने वाली सुविधाएं भी मौजूद हैं। बावजूद इसके अतिवृष्टि, बाढ़, भूकंप, सूखे, महामारी, आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी परिस्थितियों के लिये हमारे आपदा पूर्व तंत्र को अभी काफी ज्यादा काम करने की जरूरत है।

हमे इस बात को समझ लेना चाहिए कि विज्ञान व तकनीक का मानवता और उसके समुचित विकास में सदुपयोग होना चाहिए न कि कुछ लोगों के व्यावसायिक हितों की रक्षा में इसका दुरूपयोग । विकास की नवीनतम अवधारणा ने तो विज्ञान तकनीक को अपने चंगुल में ले लिया है और इसी की परिणति है उत्तराखंड, कश्मीर और अब केरल का यह विनाशकारी अंजाम। उत्तराखंड व कश्मीर में नदी तटों पर बेतरतीब निर्माण तो दूसरी तरफ पनबिजली पैदा करने के लिये केरल में पिछले सालों में डेढ दर्जन से ज्यादा डैम बनाये गए जिससे राज्य में पानी के निस्कासन को प्राकृतिक अनुकूलता नहीं प्राप्त हो पायी। समय आ गया है कि हम विभिन्न आपदा घटनाओं की एक संपूर्ण योजना का निरूपण करते हुए चार सूत्री योजना पर अमल करें जिसमे पहला देश भर में सभी तरह की मानव जनित व प्राकृतिक आपदा की पूर्व व उपरांत तैयारियों और उसकी जिम्मेवारियों के लिये सभी तरह के कानूनों, विधानों, संस्थाओं को नये सिरे से परिभाषित कर उनमे आपसी समन्वय की एक स्थायी व्यवस्था मौजूद हो ।

दूसरा देश भर में आपदा रोकथाम पेशेवरों मसलन मौसम विज्ञानी,आपदा विशेषज्ञ, आपदा रोकथाम प्रशिक्षकों,सेना,पुलिस,अग्रिशमन दस्तों, सुरक्षा विशेषज्ञों, चिकित्सक, पारा मैडिकल कर्मचारियों का एक राष्ट्रीय कार्यदल का गठन हो । तीसरा विभिन्न आपदा रोकथाम निर्देशों के सख्ती से पालन के लिये एक राष्ट्रीय योजना का निर्धारण हो औैर चौथा आपदा से जुड़े हर तरह की विकास व निर्माण की गतिविधियों को लेकर देश के हर स्थान के मुताबिक भोगोलिक आर्थिक विकास की नीति का निर्माण हो। अंत में उपरोक्त चारों महती उद्येश्यों की पूर्ति के लिये केन्द्र व राज्य स्तर पर आपदा प्रबंधन के लिये एक अलग से विभाग या मंत्रालय का गठन होना चाहिए,क्योंकि देखा यह जाता है कि किसी भी आपदा के वक्त कृषि मंत्रालय द्वारा नियंत्रित प्राकृतिक आपदा कोष यानी सीआरएफ और गृह मंत्रालय द्वारा नियंत्रित राष्ट्रीय आपदा राहत कोष यानी एनसीआरएफ के जरिये मदद राशि का एलान केन्द्रीय दल द्वारा सर्वेक्षण के बाद तय होता है जिस पर राज्यों द्वारा मदद राशि पर्याप्त नहीं दिये जाने पर शिकवा शिकायत किया जाता है। जैसा कि अभी केरल ने बीस हजार करोड़ के नुकसान की बात बतायी परंतु प्रधानमंत्री द्वारा अभी सिर्फ 500 करोड़ की मदद का ऐलान किया गया।

यदि देश में कुछ चीजें बिल्कुल असह्य यानी नो टोलरेंस की स्थिति में ढ़ालनी है,जिसमें नो टोलरेंस टू करप्शन, नो टोलरेंस टू क्राइम, नो टोलरेंस टू एक्सीडेंट और नो टोलरेंस टू डिले स्लीपेज एंड लीकेज इन क्लामेटीज रिलीफ तो इनमे चौथे को सबसे अव्वल रखना होगा। भारत में पिछले एक दशक के दौरान आपदा प्रबंधन के फील्ड में जो सबसे बड़ा काम हुआ वह है एनडीआरएफ यानी राष्ट्रीय आपदा राहत कार्यबल का गठन जिसमे सेना व पुलिस के चुने हुए आपदा राहत की विशेषज्ञता हासिल जवान शामिल होते हैं जिनका अब हर आपदा की राहत गतिविधि में इस्तेमाल होता है तथा एनडीआरएम यानी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान जहां आपदा नियंत्रण को लेकर देश हर स्तर के शोढ व विकास के काम हो रहे हैं । अंतत: हम यही कह सकते हैं कि अगर इस समय हमने अपने व्यापक संकल्प से आपदा प्रबंधन को लेकर उपरोक्त सभी बातों को अंजाम नहीं दिया तो हमारी मानवता इन अवश्यम्भावी महाविनाशों की हमेशा मोहताज बन कर अपना जीवन गुजारेगी।




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