बदल गया रेन पैटर्न, बदल लीजिए बारिश के महीनों के नाम

जागरूक टाइम्स 188 Jul 11, 2018

हालांकि यह कहना एक किस्म की अतिश्योक्ति होगी कि हिन्दी महीने फागुन का नाम बदलकर आसाढ़ कर दिया जाए; लेकिन पिछले तीन सालों से हो यही रहा है कि फागुन और चैत माह के दरमियान खूब झमाझम बारिश होती है और आसाढ़ आते आते बादल गावों व खेतों का रास्ता ही भूल जाते हैं। इससे भी ज्यादा चिंतित करने वाला बारिश का तेजी से बन रहा गुरिल्ला स्वभाव है। यह लगातार तीसरा साल है, जब बारिश अचानक किसी भगोड़े अपराधी की तरह आती है और आधा पौना घंटे मूसलाधार बरसकर निकल जाती है।

यह देश के किसी एक या खास इलाके में नहीं हो रहा बल्कि मानसून के लिहाज से देश के दोनों मुख्य इलाकों उत्तर और दक्षिणी भारत में इसे देखा व महसूस किया जा रहा है। गोवा, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक सहित उत्तर भारत में उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, यूपी, बिहार और बंगाल में वर्षा का यही आक्रामक तेवर रह-रहकर देखने को मिल रहा है। हद तो यह है कि एक ही समय में देश के किसी प्रदेश के एक हिस्से में तो अतिवृष्टि से बाढ़ का खतरा पैदा हो जाता है और उसी प्रदेश के दूसरे इलाके में सूखे की नौबत दिख रही होती है।

मुंबई में इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय पिछले पांच दिनों से लगातार बारिश हो रही है लेकिन मीडिया की मानें तो मुंबई को पानी सप्लाई करने वाली सात झीलों में से पांच का जलस्तर अभी तक [9 जुलाई 2018 की शाम तक] बहुत नीचे है। अभी ये झीलें करीब 50 प्रतिशत खाली बताई जा रही हैं क्योंकि मौसम विभाग के मुताबिक ये झीलें जिन इलाकों में हैं, वहां बारिश नहीं हो रही या बहुत कमजोर हो रही है लेकिन मुंबई के मुख्य शहरी इलाकों में तो आफत बनकर टूट पड़ी है। एक बात पिछले कई सालों से बड़ी शिद्दत से देखी जा रही है कि मानसून के आते ही मौसम विभाग सहित देश की तमाम प्राइवेट एजेंसियां जो मानसून की भविष्यवाणी करती हैं, इसके मानसून सामान्य रहने की बात कहने लगती हैं।

लेकिन देखने वाली बात यह है कि मानसून सामान्य रहने के बाद भी देश के तमाम हिस्से सूखे से जूझ रहे होते हैं। मात्रा के हिसाब से देखें तो बारिश कोई कम नहीं हो रही, उल्टे कुछ बढ़ी ही है। मगर सवाल है कि मानसून में ज्यादा बारिश होने बाद भी कई इलाकों और प्रदेशों को सूखे की मार क्यों झेलनी पड़ रही है? इसके पीछे वही बारिश का बदलता मिजाज है। नार्थ ईस्ट के जिन इलाकों में अच्छी खासी बारिश होती है, वहां भी ऐन बारिश के समय भी पीने के पानी की भारी किल्लत उभर रही है। मध्य और पश्चिम महाराष्ट्र की तो यह मुख्य समस्या बन गई है। 24 घंटे, 36 घंटे रिकॉर्ड बारिश होती है, लेकिन मूसलाधार हुई बारिश जमीन के अंदर धंसती ही नहीं इसलिए धरती ज्यों की त्यों प्यासी बनी रहती है। पिछले कुछ सालों से बारिश का ट्रेंड बहुत तेजी से बदल रहा है। यह सिर्फ हमारे यहां ही नहीं हो रहा पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, चीन और यूरोप तक में ऐसा हो रहा है। जापान में पहली बार भयानक बारिश के चलते 100 लोग मारे गए हैं।

जबकि चीन में अचानक नदियों में आए उफान से 800 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवा दी है। हिन्दुस्तान में पिछले तीन सालों से बारिश के पैटर्न में साफ-साफ बदलाव दिख रहा है। बारिश के इस बदलते पैटर्न से सिर्फ लोगों को ही परेशानी नहीं हो रही, इससे हमारी कृषि, खासकर इसकी उत्पादकता पर असर पड़ रहा है। हम सब जानते हैं कि बारिश हमारी अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। देश की जीडीपी में कृषि क्षेत्र की करीब 17 फीसदी, जबकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में 35 से 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है। मौसम विभाग की मानें तो पिछले 50 सालों में देश में औसत या सामान्य बारिश 96 से 104 फीसदी के बीच रही है।

देश में जितनी बारिश साल भर में होती है, उसमें से 75 से 80 प्रतिशत मानसून में होती है। मध्य और उत्तर-पश् िचमी भारत में तो मानसून में होने वाली बारिश साल की कुल बारिश का 90 फीसदी तक होती है। लेकिन पिछले 3-4 सालों से मानसूनी बारिश का यह आंकड़ा गड़बड़ाने लगा है। पर्यावरणीय लिहाज से बेहद संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में भी बारिश का मिजाज बहुत तेजी से बदल रहा है। उत्तराखंड में इसे आम लोगों के स्तर तक महसूस किया जा रहा है। तकनीकी रूप से देखा जाए तो बारिश औसत के अनुरूप ही हो रही है, लेकिन इसका अब पहले जैसा पैटर्न नहीं रहा।

एक जमाने में बारिश के दिनों में पहाड़ों में लगने वाला सतझड़-पतझड़ (सात दिन या पांच दिन तक लगातार रिमझिम रिमझिम होने वाली बारिश) या यूपी-बिहार में लगने वाली झड़ी किस्से कहानियों की बात होकर रह गई है। इनकी जगह कम समय में होने वाली मूसलाधार बारिश ने ले ली है। बाढ़ की बढ़ती विभीषिका इसी का नतीजा है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह स्थिति ग्लोबल वार्मिंग के चलते पैदा हुई है। इस पैटर्न को रोकने का अगर गंभीरता से प्रयास न किया गया तो फिर से महाकाल या बंगाल भिक्षु की आशंकाएं पैदा हो जाएंगी।

विशेषज्ञों के मुताबिक अगर पूरे मानसून के सीजन में 120-150 घंटे तक धीमी और संयमित बारिश नहीं होती तो धरती का भू-जल रिचार्ज नहीं होता। इसलिए धीमी बारिश का होना दुनिया के अस्तित्व के लिए जरूरी है। जब तक रिमझिम रिमझिम बारिश नहीं होती, तब तक धरती तरबतर नहीं होती और न ही भूजल भंडार समृद्ध होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्षा के पैटर्न में आए इस बदलाव की वजह ग्लोबल वॉर्मिंग है। दरअसल जो बारिश पिछले तीन-चार सालों से हो रही है, उसकी तीव्रता में 15-17 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। इसको फिर से पुरानी गति पर लाने के लिए वैश्विक तापवृद्धि व जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों खासतौर पर मानवजनित कारकों पर अंकुश लगाना पड़ेगा। सबसे मुख्य बात है कि हमें प्रकृति के साथ एडजस्टमेंट करना पड़ेगा, उसके अनुरूप आचरण करना होगा। तभी वर्षा का बिगड़ता मिजाज संतुलित व समयबद्ध हो सकता है।


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