भ्रष्टाचार उन्मूलन के दावों के बीच महाघोटालों का पर्याय बन गए बैंक...!

जागरूक टाइम्स 170 Sep 10, 2018

देश में बैकों के कुल कर्जे का करीब दस फीसदी हिस्सा, जिसकी कुल रकम करीब दस लाख करोड़ रुपए बैठती है, का अभी कोई माई-बाप नहीं है। यह रकम बैंकिंग शब्दावली में एनपीए यानी गैर उत्पादक परिसंपत्ति कही जाती है। भारत के अब तक के बैंकिंग इतिहास में यह न केवल सर्वाधिक है बल्कि दुनिया में सर्वाधिक एनपीए वाले देशों की सूची में तीसरे नंबर पर दर्ज हो चुकी है। कहने का मतलब यह कि पहले तो हम बैंकों की लूट, एटीएम मशीनों की सेंधमारी तथा बैंकों के कैश वैन अगवा करने की बार-बार खबरों और घटनाओं से ही रूबरू हुआ करते थे, अब बैंकों में फर्जीवाड़ा, डिफॉल्टरी तथा घोटाले की घटनाओं से भी दिन रात दो-चार रहते हैं। अब तो लगता है कि देश के बैंक घोटालों और भ्रष्टाचार के सबसे बड़े अड्डे बन चुके हैं। पिछले एक दशक से बैंकों में महालूट जारी है।

बैंकों के दो बड़े महाघोटाले जिनमें एक विजय माल्या द्वारा साढ़े नौ हजार करोड़ रुपए के बैंक कर्ज को दिए बिना विदेश भाग जाना है तो दूसरा नीरव मोदी तथा मेहुल चोकसी यानी मामा भांजे की जोड़ी द्वारा करीब साढ़े बारह हजार करोड़ रुपए के लोन को हड़पकर विदेश चला जाना है। इसके अलावा पेन बनाने वाली रोटोमेक कंपनी द्वारा करीब साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए की बैंक हेराफेरी की गई है, जिसकी भुगतभोगी बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, सब कुछ जानते बूझते हुए भी दो साल तक छिपाए रखा। इस क्रम में इलाहाबाद बैंक के सीएमडी, बैंक ऑफ महाराष्ट्रा के एमडी सहित और भी कई बैंकों के उच्च अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई। इसके चलते आईडीबीआई बैंक के पूर्व सीएमडी भी जांच के दायरे में आए। अगर और पहले जाएं तो बैंक ऑफ बड़ौदा में मनी लॉड्रिंग की दो बड़ी करतूतें रंगे हाथों पकड़ी गईं।

इसी तरह एक और सार्वजनिक बैंक के सीएमडी को पचास लाख रुपए के रिश्वत मामले में पकड़ा गया। सरकारी बैंकों से इतर देश के सबसे बड़े निजी बैंक आईसीआईसीआई बैंक की सीएमडी चंदा कोचर द्वारा अपने पति के कॉरपोरेट दोस्त को भारी भरकम लोन बिना ठोस प्रक्रिया अपनाए दिया जाना भी जांच के दायरे में है तो एक्सिस बैंक की एमडी शिखा शर्मा के साथ भी ऐसा ही मामला चल रहा है। मौजूदा नरेन्द्र मोदी सरकार लाख सफाई दे कि बैंकों में एनपीए घोटाले की जमीन पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के कार्यकाल में तैयार हुई थी, मौजूदा नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए-2 सरकार के कार्यकाल में तो बस इसका खुलासा हुआ, तब भी वह इस अपयश की भागी होने से नहीं बच सकती। क्योंकि एनडीए सरकार के आगमन के समय बैंकों के एनपीए 6.5 प्रतिशत के आसपास था, जबकि बीते चार साल में यह बढ़कर 9.6 प्रतिशत हो गया है।

सवाल है अगर सारे घोटालों की जमीन यूपीए सरकार के रहते बनी तो फिर एनडीए सरकार के जमाने में इसमें बढ़ोत्तरी कैसे हुई? एनपीए की रकम 6.5 लाख करोड़ से बढ़कर करीब 9.5 लाख करोड़ कैसे हो गई? यूपीए के कार्यकाल में अधिकतर बैंक मुनाफे में थे, तो फिर मोदी सरकार के काल में महाघाटे के मोड में कैसे आ गए? नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को देश के बैंकों में भस्मासुर सरीखी रूप लेती एनपीए की समस्या तथा परत दर परत बैंकों में खुल रहे घोटाले की दास्तान पर जबाब तो देना ही पड़ेगा? वास्तव में इस पूरे मामले में दो बड़े सवाल उठते हैं, जिनमें से एक संबंध सरकार से है तो दूसरे का संबंध व्यवस्था से है। सरकार जनित मामला ये है कि मोदी सरकार ने अपनी तमाम कल्याणकारी योजनाओं के लिए इन्हीं सार्वजनिक बैंकों का मुख्य रूप से सहारा लिया है।

मोदी सरकार की जनधन योजना, जिसके अंतर्गत गांव और कमजोर वर्ग के लोगों के करीब 32 करोड़ एकाउंट खोले गए, जनसुरक्षा के अंतर्गत सामाजिक सुरक्षा की तीन योजनाओं में करीब बारह करोड़ लोगों को जोड़ा गया। इसी तरह प्रधानमंत्री मुद्रा बैंकिंग योजना के तहत करीब पांच करोड़ लोगों को स्वरोजगार चलाने के लिए करीब दस लाख करोड़ रुपए का लोन दिया गया। इसी तरह तकनीकी व शैक्षिक लोगों को स्वरोजगार प्रदान करने वाली स्टार्टअप व स्टैंडअप योजनाएं भी बैंकों से मिलने वाले लोन व परियोजना पूंजी पर ही आश्रित रही हैं। अब सवाल ये है कि मोदी सरकार की ये सभी योजनाएं क्या बैंकों के व्यावसायिक हितों का गला घोटकर नहीं चलाईं जा रही हैं? जहां तक सूक्ष्म ऋणों यानी माइक्रो फाइनेंस में एनपीए की बात है तो उसकी अदायगी 98 से 100 प्रतिशत के बीच है। मोदी सरकार को चाहिए कि वह बैंकों के एनपीए को लेकर पहले तो एक ईमानदार श्वेत पत्र व स्थिति पत्र जारी करे और बताए कि किन वजहों से पिछले चार सालों में बैंकों का घाटा व एनपीए दोनों बेतहाशा बढ़े हैं।

कहीं इसके लिए सरकार द्वारा की गई नोटबंदी और नोटबंदी के चलते बैंकों में भारी मात्रा में आए नकली व जाली नोट तो नहीं हैं? बैंकों में सुधार की बात करें तो जब हर्षद मेेहता शेयर बाजार घोटाला हुआ था तो बताया गया था कि देश में पूंजी बाजार के नियमन व सुरक्षा संबंधी कानूनी मशीनरी बेहद दोषपूर्ण थी। फिर देश में पूंजी बाजार के बेहतर नियमन व संचालन के लिए सेबी नामक संस्था का आगमन हुआ। इसके बाद कमोबेश पूंजी बाजार में होने वाले घोटाले में काफी हद तक नकेल लगी। शायद इसी के बाद देश के बेईमान कारोबारियों ने बैंकों की तरफ रुख किया और राजनीतिक पैरवी तथा बड़े बैंक अधिकारियों से रसूख बनाकर व उन्हें करोड़ों की रिश्वत देकर उनसे अरबों खरबों के लोन डकार लिए।

एक तरफ एक दो लाख रुपए लोन लेने वाला किसान अपनी फसल खराब होने पर बैंक का लोन न चुका पाने के डर से आत्महत्या कर लेता है तो दूसरी तरफ बैंकों से अरबों खरबों लोन लेने वाले बड़े कारोबारी सुरा व सुंदरियों के साथ विदेश भाग जाते हैं। यदि मोदी सरकार ये दावा करती है कि वह पिछली सरकारों से भिन्न है और भ्रष्टाचार को रत्तीभर न सहने के अपने वायदे पर कायम है तो आखिर बैंक डिफाल्टर कानून व कंपनी दीवालिया निस्तारण कानून को और मजबूत बनाने के लिए वह नीरव मोदी व विजय माल्या घोटाले का इंतजार क्यों कर रही थी? हमारे देश की व्यवस्था की हकीकत ये है कि कोई भी सरकार व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाने की जहमत नहीं उठाना चाहती। जब कोई महाघोटाला हो जाता है, तब कहीं जाकर वह उस पर रोक लगाने की कोई प्रक्रिया अपनाती है।


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