सऊदी अरब : निकला औरतों की आजादी का सूरज

जागरूक टाइम्स 243 Jun 25, 2018

दुनिया की तमाम आलोचनाओं के बाद भी पिछले काफी अरसे से सऊदी अरब की सरकार महिलाओं के विरूद्ध अपने कट्टरपंथी रवैय्ये पर बजिद थी, लेकिन अंतत: कट्टरता की इस बर्फ को पिघलना पड़ा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के वैश्विक दबाव ने सऊदी सरकार को झुकने तथा औरतों को आजादी देने के लिए मजबूर कर दिया है। 24 जून 2018 को सऊदी औरतों के चेहरे पर की खुशी को सोशल मीडिया पर सबसे अधिक शेयर किया गया। जी, हां! ड्राइविंग सीट पर बैठी औरतें ऐसी दिख रही थीं, जैसे कफस से कोई परिंदा आजाद हुआ हो।

ऐसा हो भी क्यों न? दरअसल आज के पहले तक सऊदी अरब दुनिया का अकेला ऐसा देश था, जहां औरतों को ड्राइविंग सीट पर बैठना कानूनन मना था। उन्हें लगातार इससे रोका जाता रहा है। मुल्लाओं ने इसे गैर इस्लामिक करार दे रखा था। इस्लाम की उल्टी-सीधी व्याख्या करके इन लोगों ने यह भ्रांति फैला रखी थी कि ड्राइविंग सीट पर जो लड़कियां बैठती हैं, उनका कौमार्य भंग हो जाता है। यह भी दलील दी जाती रही है कि औरतें कमअक्ल होती हैं, इसलिए उनके द्वारा गाड़ी चलाना गैर इस्लामिक है। लेकिन इस रविवार को सब कुछ बदल गया। ड्राइविंग सीट पर बैठी औरतों को आज सऊदी पुलिस गुलदस्ते भेंट कर रही थी, जबकि यही पुलिस कभी उन्हें इसके लिए हथकड़ी पहनाती थी। यह नजारा सचमुच 'न्यूपिंच' की तरह था।

सऊदी अरब में शासकों द्वारा लगाई गई इस पाबंदी का पिछले दो दशकों से विरोध हो रहा था। 1990 में इसके विरोध में रियाद में कुछ महिलाओं ने ड्राइविंग की, तो उन्हें जेल में डाल दिया गया था। लेकिन विरोध का यह सिलसिला रुका नहीं। इंटरनेट में 2008, 2011 और 2014 में सबसे अधिक वीडियो अपलोड किए गए, जिसमें सऊदी खवातीनें इसका विरोध करते हुए गाडिय़ां चलातीं दिख रही थीं। इस तरह के वीडियो ने दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों को सक्रिय कर दिया था। सऊदी शासन इसका ब्योरा देने से कटता रहा कि पिछले दो दशकों में कितनी महिलाएं ड्राइविंग प्रतिबंध को तोड़ते हुए गिरफ्तार हुईं और कितनी अब भी जेल में हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में सऊदी प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान एक मुक्तिदाता के रूप में उभरे हैं। उनके इस कदम से लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं कि सऊदी अरब को एक खुला समाज बनाने में प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान बड़ी भूमिका अदा करेंगे। मगर, मुल्ला इस कदम से काफी नाराज हैं। वहां सिनेमा देखने, म्यूजिक सुनने पर से पाबंदी हटा देने से मौलवी पहले से नाराज चल रहे थे। 32 साल के प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान दुनिया के सबसे कम उम्र के उप शासन प्रमुखों में गिने जाते हैं। ऐसा भी नहीं कि प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान की शिक्षा यूरोप या अमेरिका में हुई हो, जिससे लोग ये कहें कि उनपर पश्चिमी देशों का प्रभाव है और पश्चिम वाले सऊदी अरब में सुधार कर रहे हैं। उन्होंने कानून की डिग्री रियाद स्थित किंग सऊद यूनिवर्सिटी से प्राप्त की है।

15 दिसंबर 2009 को 24 साल की उम्र में प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने राजनीति में प्रवेश किया था, और आखिर में 21 जून 2017 को उन्होंने 'फस्र्ट डेप्युटी प्राइम मिनिस्टर' का पद संभाला। दरअसल, प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान सऊदी समाज में सुधार के अजेंडे को लेकर चल रहे हैं। उन्हें सामाजिक-आर्थिक सुधार के वास्ते बने 'विजन 2030' के मुख्य वास्तुकार के रूप में देखा जा रहा है। इस वजह से धर्म की दुकान चलाने वालों की परेशानी बढ़ गई है। प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान इस समय मानवाधिकार संगठनों के लिए हीरो जैसे हैं, जो संगठन सऊदी अरब में महिला मुक्ति के वास्ते काम कर रहे हैं, उन्हें पूरी उम्मीद है कि औरतों को पुरुषों के बराबर आफिसों में काम करने के अवसर भी जल्द मिलेंगे।

2015 के आंकड़े बताते हैं कि सऊदी अरब में सिर्फ 13 फीसदी औरतों की हिस्सेदारी कार्यालयों में है। संसद में 19.9 फीसदी खवातीनें हैं। गौरतलब है संसद में महिलाएं तब पहुंची, जब यहां उनकी हिस्सेदारी तय हुई। सऊदी अरब में 60.5 प्रतिशत औरतों ने सेकेंड्री स्कूल तक शिक्षा ली है। वहां वहाबी व हंबाली इस्लाम को आगे बढ़ाने वाले मौलवियों ने 'गार्जियन सिस्टम' की परंपरा डाल रखी है। इस सिस्टम के अनुसार औरतें गार्जियन की अनुमति के बाद नौकरी-पेशा कर सकती हैं। मुल्लाओं ने कड़ाई से 'इख्तिलात' पालन का आदेश दे रखा था। यानी औरतों का पुरुषों से मिक्स होना इस्लाम के विरूद्ध है। एक मुल्ला हैं, शेख अब्दुल रहमान अल बराक, उन्होंने फतवा दे रखा था कि जो औरत 'इख्तिलात' का उल्लंघन करती हुई पाई जाए, उसे मार देना चाहिए। मगर, इस फतवे से सभी सहमत नहीं थे।

मक्का में धार्मिक पुलिस 'मुताविन' के प्रमुख शेख अहमद कासिम अल घमादी ने कहा कि 'इख्तिलात' के बारे में शरिया में ऐसा कुछ नहीं कहा गया है, ये निराधार बातें हैं। अल अरबिया के संपादक आस्मा अल मुहम्मद ने बताया कि गल्फ समेत दुनिया के जितने मुसलमान देश हैं, उनसे तुलना करें तो सऊदी अरब में औरतों का हक सबसे अधिक छीना गया है बल्कि सऊदी अरब में औरतों की राजनीतिक शक्तियां कमजोर करके रखी गई हैं। डा. तमादेर बिंत युसूफ अल रमाह फरवरी 2018 में उपमंत्री बनाई गईं तो किंगडम में सबके सब चकित थे। मगर, क्या ऐसा पहली बार हुआ था? यह गड़बड़झाला 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति और उसी समय मक्का के 'मस्जिद अल हरम' पर आतंकी कब्जे के बाद हुआ।

इससे सबक लेते हुए सऊदी अरब ने शरिया का कड़ाई से पालन का आदेश दिया। इसकी गाज महिलाओं पर गिरी। महिलाओं के ड्राइविंग लाइसेंस निरस्त किए गए, जो पुरुष रिश्ते में नहीं आता हो, उसे कोई महिला घर नहीं बुला सकती थी। घर से बाहर वो तभी निकल सकती थीं, जब वो नख-शिख तक ढंके 'अबाया' पहने हों। साल 2005 में किंग अब्दुल्ला के शासन में आने के बाद सऊदी अरब में हालात धीरे-धीरे बदलने लगे। 2009 में नूरा अल फैज पहली महिला मंत्री बनीं। किंग अब्दुल्ला ने पहली बार को-एड विश्वविद्यालय खोलने की अनुमति दी। उन्होंने औरतों द्वारा ड्राइविंग के हुकूक का समर्थन किया था। इसे पाने में 13 साल और लग गए। उसकी मुख्य वजह कठमुल्लों के इशारे पर चल रही शासन व्यवस्था थी।


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