युवा पर्वतारोही शिवांगी पाठक, नन्ही सी जान, कदमों में जहान

जागरूक टाइम्स 179 Aug 8, 2018

हरियाणा का लिंगानुपात देश में सबसे अधिक चिंताजनक है। यहां प्रति हजार लड़कों में लड़कियों की संख्या इतनी कम हो गई है कि कुछ क्षेत्रों में लड़कों के लिए दूसरे राज्यों से 'पत्नियां' 'खरीद' कर लानी पड़ती हैं। फिर खाप पंचायतों का ऐसा दबदबा है कि लड़कियों को अपनी मर्जी से शिक्षा से लेकर शादी तक के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त पर्दा (घूंघट), सुरक्षा आदि भी लड़कियों की गंभीर समस्याओं में से हैं। लेकिन दूसरी तरफ विरोधाभास देखिये कि इसी हरियाणा की लड़कियों का खेलों से लेकर फिल्मों तक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है।

रिओ ओलंपिक 2016 में कुश्ती में कांस्य पदक विजेता साक्षी मलिक, कुश्ती में ही अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने वाली फोगट बहनें, अंतर्राष्ट्रीय फिल्म अभिनेत्री मल्लिका शेरावत आदि का रिश्ता हरियाणा से है। अब इस सूची में नया नाम शिवांगी पाठक का जुड़ गया है। मात्र 17 वर्ष की पर्वतारोही शिवांगी पाठक ने संसार की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह करने के बाद अभी हाल ही में माउंट किलिमंजारो पर चढऩे में कामयाबी हासिल की है।

यही नहीं उनकी इच्छा है कि वह 18 बरस की होने से पहले संसार के सातों महाद्वीपों की जो सबसे ऊंची चोटियां हैं, उनको फतह कर लें, यानी उनके शिखर तक पहुंचने में सफलता अर्जित कर लें। इस छोटी सी लड़की की यह बड़ी सी आशा है, जो संभवत: पूरी भी हो जाएगी क्योंकि उसके इरादे मजबूत, हौसले बुलंद और दिल बड़ा है। जो लड़की गुडग़ांव-फरीदाबाद रोड पर रॉक क्लाइम्बिंग की प्रैक्टिस करके माउंट एवरेस्ट व माउंट किलिमंजारो को फतह कर सकती है, उसके लिए अब कुछ भी असंभव नहीं है। हरियाणा की शिवांगी पाठक धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित करती जा रही हैं। पिछले तीन माह के दौरान इस किशोरी ने सबसे पहले तो नेपाल साइड से माउंट एवरेस्ट को फतह किया और फिर अफ्रीका के सबसे ऊंचे पहाड़ माउंट किलिमंजारो की चोटी पर चढऩे में कामयाबी हासिल की।

मात्र 17 वर्ष की आयु में माउंट एवरेस्ट पर चढऩे वाली शिवांगी पाठक, यह कारनामा करने वाली भारत की सबसे कम उम्र की पर्वतारोही हैं। इतनी जबरदस्त उपलब्धियों को देखते हुए, यह विश्वास करना कठिन है कि शिवांगी पाठक को पर्वतारोहण के क्षेत्र में कदम रखे हुए अभी पूरे दो वर्ष भी नहीं हुए हैं। लेकिन यही बात सच है। माउंट किलिमंजारो फतह करने के कुछ दिन बाद शिवांगी पाठक गुडग़ांव में अपने अंकल के घर पर थीं, जहां उनसे मुलाकात हुई। उन्होंने बताया कि किस तरह उनकी पर्वतारोहण में दिलचस्पी उत्पन्न हुई।

हरियाणा में स्पोट्र्स में हिस्सा लेने वाली लड़कियों के प्रति किस प्रकार नजरिया बदल रहा है और उनकी स्वयं की प्रेरणा व लक्ष्य क्या हैं इस सवाल पर हिसार की रहने वाली शिवांगी पाठक का कहना है कि जब वह 15 वर्ष की थीं तो उन्होंने छिन्नांग पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा पर बनी फिल्म देखी। शिवांगी के मुताबिक, ''इस फिल्म ने मुझे बहुत अधिक प्रभावित किया, प्रेरित किया। मैंने सोचा कि अगर वह अपनी शारीरिक सीमाओं के बावजूद इतना कठिन कार्य कर सकती हैं और वह भी सफलतापूर्वक तो मैं भी कुछ भी कर सकती हूं।'

बहरहाल, उन्होंने इस प्रेरणा को पहले अपनी शिक्षा में प्रकट करने का प्रयास किया, लेकिन वह फोकस न कर सकीं। शिवांगी पाठक बताती हैं, 'मैंने सोचा कि मैं अरुणिमा से शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा करने के लिए प्रेरित हुई हूं, लेकिन शिक्षा मेरा क्षेत्र न था। मुझे अरुणिमा के पदचिह्नों पर चलना था, पहाड़ों पर जाना था।' अपने सपने को साकार करने में शिवांगी पाठक की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वह पर्वतारोहण के बारे में कुछ नहीं जानती थीं, कुछ भी नहीं। वह बताती हैं, 'तब मेरे पास फोन नहीं था।

मैंने अपने भाई का फोन चुराया और इंटरनेट पर सर्च किया कि मुझे पर्वतारोही बनने के लिए क्या करना है। इस तरह मैंने पर्वतारोहण स्कूलों के बारे में जानकारी हासिल की और यह भी कि मुझे क्या करना है।'
शिवांगी पाठक ने पहलगाम, जम्मू कश्मीर के सरकारी जवाहर इंस्टिट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग एंड विंटर स्पोट्र्स में प्रवेश लिया। वह बताती है, 'वह पहला अवसर था जब मैं अपने परिवार से अलग रही। दरअसल, मैंने अपनी मां से आग्रह किया था कि क्या वह पूरे एक माह तक मेरे साथ रह सकती हैं, लेकिन उन्होंने व इंस्टिट्यूट के ट्रेनर्स ने इंकार कर दिया। बहरहाल, कुछ ही दिनों में मेरा वहां दिल लग गया और वह जगह मुझे घर सी लगने लगी।'

शिवांगी पाठक स्वीकार करती हैं कि शुरू में उनका परिवार, विशेषकर उनके पिता व दादी, उनके पर्वतारोही बनने के विरोध में थे। लेकिन, उनके अनुसार, हरियाणा अब पहले की तरह लड़कियों की स्पोट्र्स में हिस्सेदारी को लेकर दकियानूसी नहीं रहा है। वह बताती हैं, 'हरियाणा बदल रहा है। गुडग़ांव तो शहर है, लेकिन छोटे कस्बों व गांवों में भी आज आप ऐसी लड़कियों को सुबह दौड़ते हुए व खेलों में हिस्सा लेते हुए देख सकते हैं जिनके छोटे-छोटे बाल हैं और जो शॉट्र्स पहने हुए हैं। हिसार की जिला स्पोट्र्स प्रतियोगिता में भी अगर सैंकड़ों नहीं तो दर्जनों लड़कियां आपको हिस्सा लेती हुई नजर आ जाएंगी। लोग मुझे बताते हैं कि कुछ वर्ष पहले तक यह स्थिति नहीं थी।'

हमारी जब शिवांगी पाठक से मुलाकात हुई थी तब उन्हें माउंट किलिमंजारो फतह करने के बाद स्वदेश लौटे हुए पूरा सप्ताह भी नहीं बीता था, लेकिन अपनी उपलब्धि पर आराम करने की उनकी कोई योजना नहीं थी। वह बताती हैं, 'मेरा टारगेट है कि 18 वर्ष का होने से पहले मैं सेवन सम्मिट्स पूरा कर लूं। संसार के कुछ लोगों ने ऐसा किया है, लेकिन उनमें कोई भारतीय नहीं है। मैं अपने देश के लिए इस कमी को पूरा करना चाहती हूं। दो में कामयाबी मिल चुकी है, पांच अभी शेष हैं, वह भी हो जाएंगे।' सेवन सम्मिट्स पूरा करने का अर्थ है कि संसार के सात महाद्वीपों में जो सात सबसे ऊंचे पहाड़ हैं उन्हें फतह करना। शिवांगी पाठक की लगन, हिम्मत, हौसले व इरादे को देखते हुए हम उनके लिए शहरयार की इस पंक्ति को दोहरा सकते हैं- 'मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए'।


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