जम्मू-कश्मीर के नए मुख्यमंत्री होंगे?

जागरूक टाइम्स 1682 Nov 15, 2018

पिछले कुछ दिनों से सियासी गलियारों में ये अटकलें तेज हो गई हैं कि जम्मू-कश्मीर में पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के विधायकों का एक समूह विद्रोह करने के लिए तैयार है, बशर्ते बीजेपी जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने की इच्छुक हो। भाजपा ने भी अब इसके प्रबल संकेत दे दिए हैं। बीजेपी के महासचिव व कश्मीर मामलों के इंचार्ज राम माधव जून (जब महबूबा मुफ्ती की सरकार गिरी थी) के बाद घाटी के कई दौरे कर चुके हैं। जाहिर है इस संदर्भ में मध्यस्थ का काम करने हेतु। बहरहाल, अब सवाल है कि अगर राज्य में पुन: गठबंधन सरकार बनती है तो मुख्यमंत्री कौन होगा? इस सवाल के जवाब में एक ही नाम बार बार सामने आ रहा है-सज्जाद लोन। क्योंकि पिछले कुछ महीनों में राम माधव लोन से भी कई बार मिल चुके हैं।

अभी हाल में जब पीपल्स कांफ्रेंस श्रीनगर का मेयर पद जीतने का जश्न मना रही थी तो दोनों नेताओं ने साथ डिनर किया। हालांकि सज्जाद लोन का इस सिलसिले में यह कहना है कि वह फिलहाल लोकसभा चुनाव पर फोकस किए हुए हैं और अपनी पूरी ऊर्जा इसी में लगाये हुए हैं, लेकिन वह अपने मुख्यमंत्री बनने की संभावना से इन शब्दों के मार्फत स्पष्ट इंकार भी नहीं करते हैं, 'राज्यपाल शासन अल्पकालीन व्यवस्था है, ऐसे में आखिरकार जनता की सरकार आवश्यक है। मगर यह कब और कैसे संभव होगी, मुझे नहीं मालूम लेकिन हमारी पार्टी (जम्मू कश्मीर पीपल्स कांफ्रेंस) सभी संभावनाओं के लिए तैयार है, जिसमें विधानसभा चुनाव भी शामिल हैं।

'हां,अगर महबूबा मुफ्ती अपने विधायकों को अपनी ही पार्टी में बनाए रखने में सफल हो जाती हैं और बीजेपी के लिए पांच राज्यों-राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, तेलंगाना व मिजोरम में विधानसभा चुनाव के नतीजे उत्साहवर्धक नहीं आते हैं, तो जम्मू कश्मीर में पुन: गठजोड़ का प्रयोग नहीं होगा। क्योंकि 2019 के आम चुनाव से पहले बीजेपी अपने लिए फिर से वैसी ही समस्याएं नहीं खड़ी करेगी जो उसे महबूबा मुफ्ती के साथ रहते हुए हो रही थीं। ऐसे में एक मात्र विकल्प राज्य में नए चुनाव कराना ही रह जाएगा, जिनकी दिसम्बर में घोषणा हो सकती है। इस संभावना के लिए भी बीजेपी ने सज्जाद लोन का ही चयन किया है, जिनकी पार्टी के साथ मिलकर वह चुनाव लड़ेगी और लोन को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया जाएगा। सज्जाद लोन पूर्व अलगाववादी नेता अब्दुल गनी लोन के पुत्र हैं, जिनकी 2002 में हत्या कर दी गई थी।

सज्जाद लोन भी पहले अलगाववादी नेता ही थे, लेकिन 2009 में जब उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा तो अलगाववादी कैंप पर 'भारत-समर्थनÓ राजनीति को वरीयता दी। 2014 में इस 51 वर्षीय नेता ने बीजेपी से हाथ मिलाया और अभी हाल में उन्होंने स्थानीय निकाय चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। जिससे बीजेपी से उनकी नजदीकियां अधिक बढ़ गईं। हालांकि कश्मीर घाटी में एक वर्ग का मानना है कि सज्जाद लोन ने अपने व अपने पिता के सिद्धांतों से 'गद्दारीÓ की है, लेकिन वह अपने राजनीतिक परिवर्तन को क्रम विकास मानते हैं। सज्जाद लोन के मुताबिक, 'निरंतर तेजी से बदल रहे वातावरण में तर्क के द्वार खुला रखना ही तार्किक नेता को परिभाषित करता है। मैं राजनीति में नेतृत्व करने व सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए हूं। किसी के पीछे पीछे चलने के लिए नहीं। मुझे अपने पिता पर गर्व है।

लेकिन मैं सज्जाद लोन हूं, अब्दुल गनी लोन नहीं। अब अलग समय है, जिसमें अलग प्रतिक्रिया की आवश्यकता है।Ó वैसे एक बात यह भी है कि बीजेपी ने लोन से गठजोड़ तो कर लिया है, लेकिन वर्तमान स्थिति में जोड़-तोड़ से सरकार बनाना कठिन ही प्रतीत हो रहा है। पीपल्स कांफ्रेंस (पीसी) के पास मात्र दो विधायक हैं और बीजेपी के पास 25 विधायक हैं। 87 सदस्यों के सदन में बहुमत के लिए 44 विधायक चाहिए यानी पीडीपी से कम से कम 17 विधायक टूटें तो बात बने; जो असंभव नहीं तो कठिन कार्य अवश्य है। ऐसे में अनुमान यह भी है कि केंद्र सरकार मार्च में ही विधानसभा चुनाव कराएगी और उससे पहले आधिकारिक तौर पर बीजेपी-पीसी गठबंधन की घोषणा कर दी जाएगी और लोन को मुख्यमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट किया जाएगा। ध्यान रहे कि बीजेपी से हाथ मिलाने के बाद मुफ्ती मुहम्मद सईद चाहते थे कि लोन को एक किनारे कर दिया जाए, लेकिन बीजेपी ने स्पष्ट इंकार कर दिया और अपने कोटे से लोन को मंत्री बनवा दिया।

इसलिए कश्मीर के लिए 'राष्ट्रवाद हासिल किया जा सकता हैÓ की बात करने वाले लोन आज घाटी में बीजेपी के विश्वासपात्र हैं, जिनका प्रयोग वह अब्दुल्लाह व मुफ्ती परिवारों को किनारे करने के लिए भी कर रही है। यह जरूरी भी है। लोन भी इसीलिए कश्मीर में वंशवाद की राजनीति पर विराम लगाने की बात करने लगे हैं। वह कहते हैं, 'समान सोच के लोग साथ आने लगे हैं और हम एक ऐसी टीम बनाने की प्रक्रिया में हैं, जो वंशवाद की राजनीति के स्थान पर विकास की राजनीति लाएगी।Ó कश्मीर में आज जितना खून बह रहा है, 2010 को छोड़कर कभी नहीं बहा। इसलिए कश्मीर में रक्त प्रवाह पर विराम लगाना और मानव जीवन के सम्मान को पुन: स्थापित करना ही नेतृत्व की परीक्षा है। इस संदर्भ में अलगाववादियों व पाकिस्तान से वार्ता क्या एक रास्ता है, जैसा कि नेशनल कांफ्रेंस (एनसी) व पीडीपी कह रही हैं? सज्जाद लोन बीजेपी की तरह ही इससे सहमत नहीं हैं।

वह कहते हैं कि एनसी व पीडीपी सिर्फ चुनावी लाभ के लिए अलगाववादी दृष्टिकोण का समर्थन करती हैं। सज्जाद लोन डायलॉग को तो पवित्र, सभ्य व आवश्यक समझते हैं, लेकिन फिलहाल के लिए उनका मानना है, 'डायलॉग ऐसी स्थिति के समान है, जिसमें विक्रेता के पास बेचने के लिए सामान नहीं है और खरीदार के पास पैसे नहीं हैं। मैं प्रतीक्षा करुंगा कि विक्रेता के पास बेचने के लिए सामान हो और खरीदार के पास कुछ पैसा...मेरा मानना है कि राज्य की जनता तक पहुंचना और डायलॉग दो अलग विचार हैं...जिन्हें अलग अलग अंजाम दिया जा सकता है।Ó कश्मीर में मुख्यमंत्री अक्सर केंद्र की कृपा से ही बनते हैं। इसलिए मुमकिन है कि सज्जाद लोन भी मुख्यमंत्री बन जाए। लेकिन इससे पहले उन्हें उत्तर कश्मीर के हंडवारा में एनसी के मजबूत प्रत्याशी चौधरी रमजान को विधानसभा चुनाव में पराजित करना होगा।


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