क्या इन्हीं लोगों से बनेगा इमरान खान का नया पाकिस्तान?

जागरूक टाइम्स 114 Aug 22, 2018

इमरान खान ने भारत-पाकिस्तान शांति वार्ता को फिर से शुरू किए जाने की इच्छा जताई है। एक जिम्मेदार पद पर आसीन होने के नाते यह सद्भाव अच्छी बात है। लेकिन जैसा की न्याय के संबंध में कहा जाता है कि वह सिर्फ होना ही नहीं चाहिए होता हुआ दिखना भी चाहिए। उसी तरह कूटनीति में भी साइलेंट गेस्चर की बहुत अहमियत होती है। अगर वाकई इमरान खान चाहते हैं कि भारत के साथ रिश्तों की नई और सकारात्मक शुरुआत हो तो उन्हें कम से कम ऐसे लोगों को इस काम में लगाना चाहिए था जो दोनों देशों के रिश्तों के प्रति सकारात्मक रुख का मनोवैज्ञानिक संकेत देते जबकि है इसके उलट मुंबई में जब 2008 में हाफिज सईद के दस बदमाश अपने आतंकी हमले के दौरान मासूम भारतीयों का खून बहा रहे थे, उस समय तत्कालीन पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी नई दिल्ली में थे, जाहिर है 'शांति वार्ता' के लिए। यह बात अपने आप बता देती है पाकिस्तान की कथनी और करनी में कितना फर्क है। बहरहाल, उस समय कुरैशी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) की सरकार में विदेश मंत्री (2008-2011) थे। अब वही कुरैशी पूर्व क्रिकेटर व अब पाकिस्तान के 22 वें प्रधानमंत्री इमरान खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान तहरीके इंसाफ (पीटीआई) पार्टी की सरकार में फिर से विदेश मंत्री बनकर लौट आए हैं।

कुरैशी ही नहीं, इमरान खान ने जो 21 सदस्यों का मंत्रिमंडल घोषित किया है (16 मंत्री और 5 सलाहकार हैं) उसमें अधिकतर वही पुराने चेहरे हैं जो पाकिस्तान की विभिन्न सरकारों में काम करते आए हैं और जिनके कारण पाकिस्तान के न तो पड़ौसी मुल्कों (पड़ें भारत) से संबंध बेहतर हो सके और न ही उसके अंदरूनी आर्थिक, सामाजिक व सुरक्षा हालात में सकारात्मक सुधार आ सका। गौरतलब है कि इमरान खान के मंत्रिमंडल में 12 सदस्य ऐसे हैं जो पूर्व तानाशाह जनरल (रिटायर्ड) परवेज मुशर्रफ की काबिना में थे और पांच सदस्य ऐसे हैं जो पीपीपी की पिछली सरकारों (जिन पर इमरान खान भ्रष्टाचार का आरोप लगाते रहे हैं) में मंत्री रह चुके हैं। पाकिस्तानी संविधान के अनुसार फेडरल मंत्रिमंडल की संख्या नेशनल असेंबली व सीनेट की कुल संख्या का 11 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। इमरान खान ने भ्रष्टाचार खत्म करने और 'नया पाकिस्तान' गठित करने के मुद्दों पर चुनाव लड़ा था। जब उनकी पार्टी नेशनल असेंबली में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और उन्हें सरकार बनाने का अवसर मिला तो उन्होंने अपने पहले ही विजयी भाषण में भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने (अगर नई दिल्ली एक कदम बढ़ाएगी तो हम दो कदम बढ़ाएंगे) और पाकिस्तान की अंदरूनी स्थिति (विशेषकर आर्थिक व सुरक्षा के संदर्भ में) में सुधार लाने का वायदा किया था लेकिन पिटे हुए मोहरों से यह कैसे संभव होगा? पुराने व आजमाए हुए चेहरों से नया पाकिस्तान बनाना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। पुराने चेहरों को अपने मंत्रिमंडल में लेने के पीछे इमरान खान की मुख्यत: तीन मजबूरियां प्रतीत होती हैं।

एक, भले ही वह बतौर एक क्रिकेट कप्तान कुशल नेतृत्व देने के लिए विख्यात हों, लेकिन 11 खिलाडिय़ों का नेतृत्व और देश का नेतृत्व दो अलग बातें हैं, जमीन-आसमान के अंतर के साथ। प्रशासनिक मामलों में दोनों इमरान व उनकी पार्टी अनुभवहीन हैं, इसलिए नए व अनुभवहीन चेहरों को लेकर वह पहले ही ओवर में अपनी सरकार को बोल्ड होता हुआ नहीं देखना चाहते थे। हां, वह अनुभव व यूथ का मिश्रण कर सकते थे, जो उन्होंने नहीं किया। दूसरा यह कि इमरान खान गठबंधन सरकार में हैं। छोटी-छोटी अनेक पार्टियों से समर्थन लेकर उन्होंने अपनी सरकार बनाई है। गठबंधन सरकारों की अपनी मजबूरियां हुआ करती हैं, जो हम भारत में डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान अच्छी तरह से देख चुके हैं। गठबंधन सरकार को खींचने के लिए अनुभव की अति आवश्यकता होती है वरना वह देवगौड़ा, आई के गुजराल आदि की सरकारों की तरह समय पूर्व ही गिर जाती हैं। इसलिए पुराने चेहरों को लेने में इमरान की मजबूरी को समझा जा सकता है। अंतिम यह कि इमरान की सरकार को पाकिस्तानी सेना के दबाव से बाहर समझना भारी भूल होगी। वह सेना के 'सहयोग' से ही सत्ता में आए हैं और यह संभव नहीं है कि वह सेना जो चाहती है उसको अनदेखा कर दें। इसलिए उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में 12 ऐसे सदस्यों को शामिल किया है जो मुशर्रफ के मंत्रिमंडल में भी थे।

मुशर्रफ चूंकि स्वयं जनरल थे, इसलिए उन्होंने उन्हीं व्यक्तियों को अपने साथ रखा था जिनपर सेना का विश्वास था और है। यही कारण है कि सेना की पसंद के व्यक्ति इमरान के मंत्रिमंडल में लौट आए हैं। इमरान ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान 'तब्दीली' (परिवर्तन) का वायदा किया था। अगर वह मुशर्रफ के लोगों को साथ लेकर आगरा (विफल शांति वार्ता) व कारगिल जैसी स्थितियों को फिर से न आने दें तो भारत के लिए यही बहुत बड़ी तब्दीली होगी। अगर वह पाकिस्तान के भीतर पेशावर (स्कूली बच्चों का नरसंहार) जैसी घटनाएं फिर न होने दें तो यही 'नया पाकिस्तान' होगा। लेकिन क्या सेना उन्हें स्वतंत्र रूप से कार्य करने देगी? यही तो बहुत कठिन प्रश्न है। ध्यान रहे कि इमरान ने जिन असद उमर को अपना वित्त मंत्री बनाया है वह लेफ्टिनेंट जनरल मुहम्मद उमर के बेटे हैं, जो भारत से 1971 की जंग में पाकिस्तानी सेना का प्रमुख हिस्सा थे। स्वतंत्र पाकिस्तान में अधिकतर समय सेना का ही राज रहा है। मुशर्रफ ने 1999 में नवाज शरीफ का तख्ता पलटा था लेकिन जब 2008 में जनरल मुशर्रफ ने 2001 से 2008 तक राष्ट्रपति (पड़ें तानाशाह) रहने के बाद चुनावों की घोषणा की तो तब से यह पाकिस्तान में लगातार तीसरी लोकतांत्रिक सरकार है।

पीपीपी की सरकार पहली थी, जो पांच वर्ष के पूर्ण कार्यकाल तक सत्ता में रही। फिर जब नवाज शरीफ 2013 में प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान के इतिहास में यह पहला अवसर था कि एक लोकतांत्रिक सरकार के बाद दूसरी लोकतांत्रिक सरकार आई। इमरान खान की तीसरी लोकतांत्रिक सरकार है, इससे यह तो प्रतीत होता है कि संसार की बदली हुई परिस्थितियों में पाकिस्तानी सेना प्रत्यक्ष रूप से सत्ता पर काबिज नहीं होना चाहती, लेकिन केवल प्रत्यक्ष रूप से क्योंकि वह लोकतांत्रिक सरकार को अपने ही नियन्ंाण में रखना चाहती है। इसलिए इमरान खान के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह सेना को नारा किए बिना स्वतंत्र रूप से अपने चुनावी वायदों को कैसे पूरा करें। इमरान ने अपने खेल जीवन के दौरान और फिर राजनीति में लम्बे संघर्ष के दौरान यह तो प्रदर्शित किया है कि वह जुझारू प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं, जो ठान लेते हैं उसे पूरा करने का हर संभव प्रयास करते हैं, और अक्सर सफल भी हो जाते हैं 7 सरकार अलग मैदान अवश्य लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले व्यक्ति को अपने को साबित करने के लिए समय भी दिया जाना चाहिए।

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