किन्हें नामंजूर राहुल का अध्यक्ष पद छोडऩा

जागरूक टाइम्स 802 May 27, 2019

१७वीं लोकसभा के चुनाव में करारी शिकस्त मिलने के बाद ही मात्र दिखावे भर के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने पद से इस्तीफे की पेशकश करने का नाटक किया। पर जैसी कि कांग्रेस में वंशवाद की संस्कृति बनी हुई है, उनके इस्तीफे को अस्वीकार करने का नाटक भी किया जा रहा है। कम से कम ऐसा मीडिया को कहा जा रहा है। उन्हें कांग्रेस के वयोवृद्ध होते नेताओं जैसे मनमोहन सिंह और ए.के.एंटनी से पद पर बने रहने के लिए आग्रह करवाने का ढोंग कृत्य संपन्न किया जा रहा है। हारे हुए सेनापति राहुल को कांग्रेस के लिए अपरिहार्य बताया जा रहा है। सच में राहुल गांधी को अपने इस्तीफे को वापस लेने का दबाव डालने वालों ने या ढोंग करने वालों ने 125 बरस पुरानी कही जाने वाली पार्टी को तबाह करके ही रख दिया है। इन्हीं लोगों ने कांग्रेस के भीतर चमचागिरी की हद करते हुए जवाबदेही की संस्कृति को कभी भी पनपने ही नहीं दिया। दुर्भाग्यवश इन्होंने कांग्रेस को नेहरु-गांधी परिवार का पर्याय ही मान लिया। राहुल गांधी ने 2017 में कांग्रेस की कमान संभाली थी। तब से कांग्रेस को देश लगातार खारिज ही करता जा रहा है। पर मजाल है कि कोई उनके नेतृत्व पर जरा सा सवाल भी पूछ ले। कांग्रेस में जवाबदेही नाम की कोई चीज बची ही नहीं रह गई है। कांग्रेस से ही फूट कर निकली तृणमूल कांग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी ने भी लोकसभा चुनाव में तगड़े झटके खाने के बाद भी कांग्रेस की तर्ज पर ही इस्तीफे का नाटक किया।

दिल्ली की तरह कोलकाता में उनका इस्तीफा भी नामंजूर करने का नाटक कर दिया गया। यानी सब जगहों पर राजनीतिक नाटक पर नाटक ही खेले जा रहे हैं। मुझे यह कहने के लिए क्षमा कीजिए पर कांग्रेस में स्थापित लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने में महात्मा गांधी जी की भी एक हद तक भूमिका रही ही थी। यह कुछ हद तक नेहरु प्रेम और नेहरु के आलोचकों के तिरस्कार के रूप में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। याद कीजिए कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए 1939 में हुआ चुनाव। तब गांधी जी खुलकर नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के खिलाफ मैदान में उतरे पट्टाभि सीतारामैया के साथ खड़े थे। क्योंकि, सीतारमैया ने नेहरु जी के यानि खुद उनके द्वारा समर्थित उम्मीदवार थे। फिर भी नेताजी भारी बहुमत से चुनाव जीते। इससे गांधी जी इतने विचलित हुए कि उन्होंने इस हार को अपनी हार कह डाला। बापू के इस रुख के कारण नेता जी को मजबूर होकर अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा और कांग्रेस छोड़ कर फारवर्ड ब्लॉक का गठन करना पड़ा और बाद में रास बिहारी बोस के कहने पर आजाद हिन्द फ़ौज की कमान संभाल कर अंग्रेजों को भारत छोडऩे के लिए एक सशस्त्र आक्रमण का रास्ता अपनाते हुए देश भर में अंग्रेजों के विरुद्ध वातावरण का निर्माण करना पड़ा। यह बहुत कम लोगों को पता होगा कि जब नेताजी ने कांग्रेस छोड़ा तब वे अकेलापन महसूस कर रहे थे। 1940 के जून महीने में फारवर्ड ब्लाक का अधिवेशन महाराष्ट्र के वर्धा में आयोजित था।

नेताजी ने नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ केशव बलीराम हेडगेवार से मिलने का समय माँगा। डॉ. हेडगेवार बीमार चल रहे थे। उन्होंने 20 जून का समय दिया। जब नेताजी नागपुर संघ कार्यालय पहुंचे डॉ. हेडगेवार च्च्कोमाज्ज् में थे। नेताजी दो तीन घंटे रुके और वर्धा चले गये। वहां जाते ही उन्हें पता चला की डॉ. हेडगेवार की मृत्यु हो गई है। नेता जी ने अपने ड्राइवर को कहा, च्च्तुरंत वापस चलो।ज्ज् वह नागपुर की ओर जाने लगा। नेताजी ने कहा, च्च्मेरा मार्गदर्शन करने वाले दो ही व्यक्ति देश में बचे थे, एक डॉ. हेडगेवार जी तो चले गये। अब एक विनायक दामोदर सावरकर जी ही बचे हैं। जल्दी से मुंबई चलो। नेताजी 22 जून की सुबह वीर सावरकर के निवास पर पहुंचे। पूरे दिन उन दोनों की लम्बी एकाकी वार्ता हुई और उसके बाद जो हुआ वह इतिहास है। लेकिन, 20 जून 1940 से 22 जून 1940 के प्रकरण को वामपंथी इतिहासकारों ने दुष्टतापूर्ण तरीके से छुपा लिया। अब वापस लौटते है कांग्रेस में लोकतांत्रिक मूल्यों की ओर जिसे हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करने में अभूतपूर्व योगदान दिया राहुल गांधी की दादी श्रीमती इंदिरा गांधी ने। उन्होंने देश में 1969 में हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव के वक्त एक अजीबोगरीब खेल खेला।

राष्टपति डा. जाकिर हुसैन का निधन हो जाने के कारण 1969 में राष्ट्रपति का चुनाव हुआ था। उस चुनाव में कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार थे नीलम संजीव रेड्डी। लेकिन, विजय मिली वी.वी. गिरि को जिन्हें प्रधानमंत्री होते हुए भी इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार के रूप में खड़ा कर अपनी अंतरात्मा की आवाज पर मत देने की अपील की थी। पर वह चुनाव इसलिए यादगार हो गया, क्योंकि, इंदिरा गांधी ने अपनी ही कांग्रेस पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को स्वयं पार्टी विरोधी कार्य करते हुए बुरी तरह पराजित करवा दिया था। इसके बाद ही कांग्रेस में दो फाड़ हो गया। दरअसल प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस में उस समय के सर्व शक्तिमान सिंडिकेट के बीच खींचतान चल रही थी, जिसे राष्ट्रपति चुनाव के समय इसे सारे देश ने सिंडिकेट की बुरी तरह पराजय के रूप में सरेआम देखा। गिरि की जीत के पीछे इंदिरा गांधी की अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की खुली अपील ही मुख्य कारण रहा। अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील का मतलब ही यह था कि देश भर में कांग्रेस सांसद व विधायक रेड्डी व वी.वी.गिरि दोनों में से किसी को वोट देने के लिए स्वतंत्र हैं।

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