अभिव्यक्ति के आकाश में कहां हैं इस दौर के नारे और मुहावरे

जागरूक टाइम्स 113 Jun 27, 2018

गई सदी के सातवें-आठवें दशक से किसी भी सामाजिक, राजनीतिक आंदोलनों में जिन कवियों और शायरों द्वारा गढ़े मुहावरों या जुमलों का सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाता था, उनमें दो नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं। पहला दुष्यंत कुमार और दूसरा अवतार सिंह संधू 'पाश' । शायद ही कोई आंदोलन ऐसा रहा हो, जिसमें इनकी कविताओं का नारों की शक्ल में इस्तेमाल न हुआ हो।

लगभग आधी सदी गुजर गई लेकिन इन दोनों का प्रभाव कम नहीं हुआ। यह अकारण नहीं है कि आज भी इनकी लिखी गजलें लोगों में एक जोश, जुनून और कुछ करने का हौंसला भर देती हैं। जब मंच से कोई दुष्यंत की गजल कहता है, 'मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए' या 'हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए' तो आंदोलन में एक नई ऊर्जा सी भर जाती है।

इसी तरह जब किसी आंदोलन में पाश की तरह कोई कहता है कि 'बीच का रास्ता नहीं होता' , तो लोग इसके निहितार्थ समझ रह होते हैं। दिलचस्प बात यह है कि दुष्यंत कुमार का निधन 30 दिसंबर 1975 को हो गया था। लेकिन उनकी गजलों में आपको आम आदमी के संघर्ष, उसके सपनों के टूटने की पीड़ा, निराशा, दुख की जो संकरी गलियां दिखाई देती हैं, जो बिल्कुल आज की ही लगती हैं।

जब वह कहते हैं, 'कहां तो तय था चिराग हर एक घर के लिए, कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए' , तो वह दरअसल आजाद भारत के बाद जिस समाज और व्यवस्था की कल्पना की गई थी, उसके साकार न होने पर ही चोट कर रहे होते हैं। लेकिन दुष्यंत दरवाजे बंद नहीं करते। उम्मीद की लौ भी वे बराबर जलाते रहते हैं। 'कौन कहता है आकाश में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो' में वह समाज को ही संबोधित करते दिखाई पड़ते हैं।

दरअसल दुष्यंत और पाश दो ऐसे कवि दिखाई पड़ते हैं, जिन्होंने अपने दौर को कविता की शक्ल में ऐसे मुहावरे दिए जो लोगों की जुबान से हटने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। इन दोनों ने ही अपने समाज के दुखों, तकलीफों को बेहतर ढंग से जुबान दी है। यही साहित्यकार, शायर और कवियों का कर्म है। आजादी के तत्काल बाद अनेक कवियों ने अपने दौर को चित्रित किया। लेकिन वह दौर ऐसा था, जब हम सपनों में उलझे हुए थे। इसलिए कवि भविष्य के सपनों की कविता लिख रहा था। सपने पूरे न होने का अहसास या उनके टूट जाने की अनुभूति लगभग दो दशक बाद होनी शुरू हुई। लेकिन रामधारी सिंह 'दिनकर' , गजानन माधव 'मुक्तिबोध' और दूसरे रचनाकार अपने समय को देख और झेल रहे थे।

ये तमाम लोग अपने दौर की पीड़ा को अभिव्यक्ति दे रहे थे। नई-नई इबारतें गढ़ रहे थे। लेकिन भारतीय समाज पर दुष्यंत के अलावा सबसे अधिक प्रभाव अवतार सिंह संधू 'पाश' का ही पड़ा है। क्रांति के कवि कहे जाने वाले पाश जब कहते हैं, 'मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती, पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती, गद्दारी और लोभ की मु_ी सबसे खतरनाक नहीं होती, बैठे बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है, सबसे खतरनाक नहीं होता....।

सबसे खतरनाक होता है, मुर्दा शांति से भर जाना, न होना तड़प का, सब कुछ सहनकर जाना, घर से निकलना काम पर, और काम से लौटकर घर आना, सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना' तो वास्तव में वह मर रहे सपनों को जुबान देते हैं। यही वजह है कि आंदोलनों में इसका भरपूर इस्तेमाल हुआ। पाश की कविताओं में अपनी मिट्टी की महक, जीवन के प्रति आस्था, बदलाव के प्रति प्रतिबद्धता साफ दिखाई पड़ती है।

वह जमीन से इतने गहरे तक जुड़े थे कि उनकी कविताओं में बैल, रोटियां, हुक्का, गुड़, चांदनी रात, बाल्टी में झाग वाला दूध, खेत खलिहान अपने पूरे वजूद के साथ दिखाई पड़ता है। लेकिन उनकी भाषा में आक्रोश और क्रांति की गूंज जोर से सुनाई पड़ती है। पाश ने अपने दौर को (जो लगभग दुष्यंत के आसपास का ही था) जिस शिद्दत और गहराई से लिखा है, वह दुर्लभ है। यही वजह है कि वह आज भी हर आंदोलन में जीवित दिखाई पडऩे लगते हैं। बेशक पाश एक क्रांतिकारी कवि थे, लेकिन प्रेम और जिजीविषा उनमें भरपूर थी। पाश कहते थे 'बीच का रास्ता नहीं होता।' इसलिए जिस रास्ते पर वह चल रहे थे, उसके परिणामों से भी वाकिफ थे। इसलिए वे लगातार सबको आगाह कर रहे थे, यह वक्त बहुत अधिक खतरनाक है साथ। सचमुच वक्त उनके लिए खतरनाक साबित हुआ। 23 मार्च 1988 को उनकी हत्या कर दी गई। लेकिन उन्होंने जीवन भर अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

यही वजह है कि वे अपने दौर को सबसे निर्मम तरीके से अभिव्यक्ति दे पाए और आज भी उनकी कविताएं उन्हें जीवित रखे हैं। लेकिन पिछले तीन चार दशकों में यह अभिव्यक्ति कहीं दिखाई नहीं पड़ रही। कोई दुष्यंत और पाश हम पिछले पचास सालों में पैदा नहीं कर पाए। ऐसा नहीं है कि शायर कवि बेहतर कविताएं नहीं लिख रहे। बकायदा लिख रहे हैं लेकिन वे कविताएं समाज के लिए कोई नया मुहावरा नहीं गढ़ पा रही हैं। इसकी कुछ वजहें हैं। कमलेश्वर ने एक बार दुष्यंत कुमार के बारे में कहा था, हम सब जो जीवित हैं-आदमी के सपनों को लेकर चले थे और अपने सपनों को लेकर जीने लगे।
लेकिन दुष्यंत अपने सपनों को लेकर आया था और आदमी का सपना देकर चला गया। उस आदमी का सपना जो अपने विराट समय को पहचानते हुए उसी में जीता और मरता है। सचमुच पिछले तीन चार दशकों में भारतीय समाज में यह बुनियादी फर्क आया है। अब हम अपने सपनों के लिए जीते हैं। उन्हें किसी भी कीमत पर पूरा करने के लिए।

सामाजिक आंदोलनों की विदाई समाज से न जाने कब से हो गई है। जो थोड़े बहुत कथित आंदोलन चलते भी हैं वे सिर्फ पत्रिकाओं तक ही सीमित रहते हैं। समाज में उनका कोई वजूद दिखाई नहीं पड़ता। पाश अगर आज जीवित होते तो देखते कि भारतीय समाज ने किस तरह बीच का रास्ता तलाश लिया है। यह रास्ता आपको कहीं भी पहुंचा सकता है लेकिन निश्चित रूप से यह रास्ता पाश और दुष्यंत तक नहीं पहुंचता। ऐसे में कौन इस दौर को सही अर्थों में अभिव्यक्त करेगा।


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