जब खून से रंग जाती, शक्ल न मिलने की शंका...!

जागरूक टाइम्स 80 Aug 6, 2018

हम जिस शरीर को लेकर इस दुनिया में आते हैं, अधिकांश भारतीय अपने उसी शरीर का सच नहीं जानते। इस अज्ञानता की अपराध में सबसे बड़ी भूमिका होती है। कुछ दिन पहले गाजियाबाद में एक विचित्र तमाशा हुआ। एक मां अपनी मासूम बेटी को गोद में लेकर कहीं जा रही थी। मां का रंग काला था और बेटी एकदम गोरी। देखने वाले इस बात को पचा नहीं पाए कि मां काली है तो बेटी गोरी कैसे? एक ने यह सवाल उठाया, तो दर्जनों लोग उसके सवाल के साथ खड़े हो गए। लोगों ने उस औरत को घेरकर उससे जवाब मांगना शुरू कर दिया कि वह किसका बच्चा चुराकर भाग रही है। भला वह औरत कैसे साबित करती कि वह बच्चा उसी का है। लोगों ने उसे बच्चा चोर घोषित करके पीटना शुरू कर दिया। सबकी जुबान पर एक ही बात थी-तेरा रंग काला है, बच्चा गोरा है, यह तेरा कैसे हो सकता है? मामला थाने तक पहुंचा। पुलिस ने जांच की तो पाया कि बच्चा उसी औरत का था। एक वहम, एक संदेह के चलते उस निरपराध औरत ने लोगों की मार ही नहीं खाई, जलील भी हुई। सैकड़ों सालों से हमारा समाज इसी सोच में जीता आ रहा है कि हर चीज वंशानुगत होती है। जिस रंग तथा स्वभाव के माता-पिता होंगे, वैसा ही बच्चा भी होगा।

सामाजिक जागरुकता की मिसाल बनने की मूर्खतापूर्ण कोशिश कर रहे जो लोग एक मां पर लांछन लगा सकते हैं, वे स्वयं के बच्चे की शक्ल को लेकर भी संदेह की गहन कंदराओं में सिर पटक सकते हैं। संदेह वाली यह सोच कभी-कभी बेहद विकृत हो जाती है। इसीलिए हमारे देश में शक या संदेह के चलते होने वाले अपराधों का प्रतिशत काफी ज्यादा है। पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में दो ऐसे मामले प्रकाश में आए, जिसमें पिता ने अपने मासूम बेटे का इसलिए गला घोंट दिया कि उसे शक था, वह उसकी औलाद नहीं है। तीसरा मामला जहांगीरपुरी दिल्ली में घटित हुआ, जिसमें मासूम बेटा तथा मां दोनों शक्की पिता के हाथों मारे गए। प. बंगाल के आसनसोल शहर में एक पिता सालों तक इस शक को पाले रहा कि उसका बेटा उसकी संतान नहीं है। एक रोज उसने अपने बेटे का मर्डर कर दिया। राजस्थान में भी एक शक्की पिता ने ऐसा ही अपराध किया। इन सभी अपराधों के मूल में शक की वजह यह थी कि इन पिताओं की संतानों की शक्ल उनसे नहीं मिलती थी। जिस तरह गोरे रंग के बच्चे की काले रंग की मां को सामाजिक प्रताडऩा झेलना पड़ी, उसी तरह इन पिताओं को भी सामाजिक ताने झेलने पड़े थे। फलत: दिमाग की 'डार्क साइड' जाग्रत हुई और वे अपराध की ओर उन्मुख हुए।

ये मासूम बच्चे क्या वाकई अपनी पिता की औलाद नहीं थे या फिर ये सब एक 'भ्रम' की वजह से मारे गए? इस विषय की विडंना में जाने के लिए मैं आपको एक सच्चा वाकया सुनाता हूं। यह सन 1988 की घटना है। एक पिता ने संदेह के चलते अपने 3 साल के बेटे तथा अपनी बीवी को मार डाला। उसे शक था कि वह उसका नहीं, पत्नी के प्रेमी का अंश है। पुलिस ने अपनी कार्रवाई की। केस डायरी बनी, उसके बाद चार्जशीट अदालत में दाखिल हुई। पहले निचली, फिर उच्च अदालतों में मामला चला। अदालत ने साक्ष्य, गवाह एवं बहस के आधार पर उस व्यक्ति को कुसूरवार माना और उसे आजीवन कारावास की सजा हुई। इत्तेफाकन, इस घटना के 22 साल बाद एक एडवोकेट के चैंबर में मुझे वह व्यक्ति दिख गया। चूंकि मैंने उसके जुर्म की वह कथा कवर की थी। उसके मन के अंतद्र्वंद तथा उसके शक के कारणों को खोजने की कोशिश की थी, इसलिए मुझे वह केस याद था। मेरे मन में एक उत्कंठा थी। अत: मैंने उससे पूछ लिया कि वह अपने जुर्म की सजा काट आया है। अब तो बता सकता है कि उसने जो गुनाह किया, उसमें सच्चाई थी या सिर्फ शक था? असमंजस भरे लहजे में उसने बताया, 'हर आदमी यही कहता था कि मेरे बेटे की शक्ल मुझसे नहीं मिलती। इसी कारण मैंने गुस्से में बच्चे को मार डाला।

बीवी ने रोका, तो उसका भी गला दबा दिया। सच क्या था, मेरी बीवी ही जानती होगी।' आजीवन कारावास की सजा काट आने के बाद भी वह व्यक्ति नहीं जानता था कि उसने जो गुनाह किया, उसके पीछे का सच क्या था? वह अब भी अपनी उस बीवी को कटघरे में खड़ा कर रहा था, जिसे वह मौत की सजा दे चुका था। किसी भी देश, किसी भी समाज तथा किसी भी व्यवस्था की इससे बड़ी असफलता क्या हो सकती है कि उस देश का एक नागरिक अपने जुर्म की सजा भोग ले, तब भी उसे यह ज्ञात न हो कि उसने जो जुर्म किया, उसकी वजह क्या थी? उसे न पुलिस इस बारे में बताती है, न कानून बताता है, न अदालत बताती है, न उसका वकील बताता है, न वे जेलें बताती हैं, जहां उसको जुर्म की सजा दी जाती है, उसका तथाकथित सुधार किया जाता है। है न, यह एक विचित्र विडंबना। यदि आजीवन कारावास भोगने के बाद भी कोई अपराधी अपने जुर्म का सच नहीं जानता है, तो दोष किसका है? उस व्यक्ति को यह सच बताने की कोशिश क्या किसी ने की कि बच्चे की शक्ल का निर्धारण कैसे होता है? उसे यह बताने के लिए तो हजारों किताबें हैं कि शरीर नश्वर है, आत्मा अजर-अमर है। जो पैदा होता है, वह मरता है। एक दिन सबका शरीर मिट्टी में मिल जाता है।

लेकिन उसे शरीर तथा उसकी संरचना का सच बताने वाली किताब कोई भी उसके सामने नहीं खोलता। उसके शरीर के जीन, हारमोन, कोशिकाएं, देह के अवयवों के फंक्शन, शरीर संचालन की वैज्ञानिक प्रक्रियाओं तथा शरीर-संबंध का सच बताने की कोशिश न समाज करता है, न शिक्षा प्रणाली, न व्यवस्था। मनुष्य के जिस्म के राज इतने जटिल भी नहीं हैं कि उन्हें सरलता से न बताया जा सके। इस संसार में दो व्यक्ति हू-ब-हू एक जैसे नहीं हो सकते। हर मानव शरीर की आकृतियों में भिन्नता होती है। इसे निर्धारित करती हैं मनुष्य के शरीर की कोशिकाएं। इन्हीं कोशिकाओं के अंदर एक केन्द्रक (न्यूक्लियस) होता है, इसी केन्द्रक के भीतर 'जीन' मौजूद होते हैं, जो इंसान की शक्ल निर्धारित करते हैं। गर्भ जब ठहरता है तो माता तथा पिता के शरीर से आधे-आधे (24 मां से 24 पिता से) जीन भ्रूण कोशिका में आते हैं। जिन मां-बाप के संगम से भू्रण जन्मता है, उन माता-पिता में भी अपने-अपने मां-बाप के आधे-आधे जीन होते हैं। उनके माता-पिता में भी अपने पूर्वजों के आधे-आधे जीन थे। यही कारण है कि पैदा होने वाले बच्चे में अपने मां-बाप के अलावा उनके पूर्वजों (फोर फादर्स) के भी गुण-दोष आ सकते है।

हमारे शरीर की हर कोशिका में एक लाख से भी ज्यादा जीन होते हैं। इंसान के हर गुण, हर दोष के लिए अलग-अलग जीन उत्तरदायी होता है। अमूमन, बच्चे की शक्ल मां-बाप पर जाती है या फिर दादा, नाना, चाचा या मामा वगैरह पर। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बच्चे की शक्ल न मां-बाप से मिलती है, न अपने पूर्वजों से। संदेह की गहन गुफाओं की सृजना यहीं से होती है। वैज्ञानिक तथ्य यह है कि माता-पिता की देह में उनके मां-बाप से मिले कुछ जीन निष्क्रिय रहते हैं, लेकिन जब वे उनके बच्चे की देह में आते हैं, तो सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे में बच्चे की शक्ल तथा स्वभाव मां-बाप से भिन्न हो सकता है। बच्चे की शक्ल तथा स्वभाव माता-पिता से भिन्न होने की एक और वजह भी हो सकती है। जब स्त्री में मादा जनन कोशिका और पुरुष में शुक्राणु बन रहे होते हैं, उस वक्त उनके जीन में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन आ जाते हैं! ये बदलाव जिस प्रक्रिया के चलते होते हैं, उसे उत्परिवर्तन या म्यूटेशन कहते हैं। इस क्रासिंग ओवर के चलते ये जीन अपना मूल व्यवहार ही बदल लेते हैं। बदले हुए ये जीन जब बच्चे में आते हैं, तो उस बच्चे की शक्ल तथा व्यवहार मां-बाप से एकदम अलग हो जाते हैं।

यही कारण है कि किसी शौर्यवान पुरुष की संतान नालायक या किसी साधारण पिता की औलाद बेहद प्रतिभाशाली निकल जाती है। शक हमारे समाज की सबसे बड़ी बीमारी है। एक शोध के अनुसार, लगभग 30 प्रतिशत भारतीय पिता कभी न कभी अपनी औलाद को लेकर शंकित होते हैं कि क्या वह उसी की संतान है। इनमें से 12-13 प्रतिशत ऐसे होते हैं, परिस्थितियां जिनके मन में पल रहे संदेह के बीज को सींचकर इतना बड़ा वृक्ष बना देती है, कि एक दिन वह भरभराकर गिरता है और सब तहस-नहस हो जाता है। हमारे देह की दर्जनों ऐसी सच्चाइयां हैं, जो हमारे लिए कौतूहल तथा जिज्ञासा बनी रहती हैं। चूंकि जब किशोरावस्था शुरू होती है, हमारे समक्ष ऐसा आईना नहीं रखा जाता, जिसमें हम अपने जिस्म को आर-पार देख लें और प्रकृति प्रदत्त उसकी विशेषताओं को समझ लें, इसलिए जिस्म इस देश के लोगों के लिए एक ÓराजÓ रहता है। उस पोशीदा राज को पाने के लिए अज्ञानता अक्सर पाप कराती है या अपराध।


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