वीर दुर्गादास जयंती : ''जौहर-साका" से औरंगजेब भी कांपा

जागरूक टाइम्स 117 Aug 23, 2018

मारवाड़ राज्य के वीर दुर्गादास राठौड़ वीरता एवं स्वामिभक्ति की भारतीय इतिहास की ऐसी मिसाल के गौरवशाली महापुरुष हुए है जिन्होंने अपना सर्वस्व मारवाड़ राज्य के लिए न्यौछावर किया। युवा अवस्था में महाराजा के पेशावर(पाकिस्तान) में अचानक मृत्यु के पश्चात वीर दुर्गादास द्वारा शिशु राजकुमार अजीत सिंह की सुरक्षा तथा औरंगजेब से जोधपुर पुन: प्राप्त करने के लिए किए गए संघर्ष ने उन्हें अमरत्व प्रदान किया। मुगल बादशाह की राह में रोड़ा बने दुर्गादस ने उनसे अनेक संघर्ष करते शाही सेना के दांत खट्टे किए जिसमें दिल्ली के ''साका एवं जौहर" में जोधपुर के सरदारों एवं ललनाओं का मुगलों की विशाल सेना के साथ लड़ा गया युद्ध तो वीरता एवं शौर्य की परकाष्ठता थी। मुगल बादशाह औरंगजेब के निर्देश पर जमरूद थाने (अफगानिस्तान) पर सुबेदार नियुक्त जोधपुर के महाराजा की जसवंत सिंह (प्रथम) की पेशावर के ओरछा राजा वीरभद्र देव के पौत्र पूरणमल बुन्देला के बाग में 28 नवंबर, 1678 को युवावस्था में नि:सन्तान रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु ने जोधपुर राज्य पर संकट ला दिया। महाराजा की गर्भवती महारानी कछवानी एवं जसकुंवर जमदागजी को संतानों के जन्म देने तक सती होने से रोका गया। उनकी सुरक्षा का भार दुर्गादास पर आन पड़ा। पेशावर में महाराजा की तेरहवीं रस्म एवं अन्य शाही औपचारिकता के पश्चात् मारवाड़ सरदारों का दल लाहौर पहुंचा।

शक्तिशाली महाराजा जसवंत सिंह(प्रथम) की नि:सन्तान मृत्यु का समाचार औरंगजेब को दिसंबर, 1678 को मिलने पर औरंगजेब का खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह मारवाड़ रियासत को खालसा घोषित कर हड़पने का सपना देखने लगा। लाहौर में 11 फरवरी, 1679 का दिन मारवाड़ के राठौड़ों के लिए अत्यंत भाग्यशाली रहा। इसी दिन महारानी जसकुंवर ने प्रात: एक अल्पवयस्क शिशु राजकुमार अजीतसिंह को मारवाड़ के पाटवी शासक के रूप में जन्म दिया। इसके कुछ अवधि पश्चात् ही गर्भवती महारानी कछवनी ने दूसरे राजकुमार दलथम्भन को जन्म दिया। मारवाड़ के राठौड़ों में खुशी का ठिकाना नहीं रहा तथा उत्सव मनाते लाहौर की गलियों में 28 फरवरी, 1679 को भव्य जुलूस निकाल शाम को ही जोधपुर के लिए रवाना हुए। इस घटना की शुभ सूचना दिल्ली में जोधपुर राज्य की ओर से नियुक्त वकील श्यामलदास ने जब बादशाह औरंगजेब की दी तो उसे सांप सूंघ गया। मारवाड़ राज्य को खालसा करने की कुटिल चाल के निष्फल होते देख बादशाह ने दोनों शिशु राजकुमारों को महारानियों सहित दिल्ली बुलाया। साथ ही अपने हाथों से राजकुमारों का सम्मान करने एवं उन्हें मारवाड़ राज्य सौंपने का लालच दिया। लाहौर से लौट रहे राठौड़ों के दल शाही फरमान से एक अप्रेल, 1679 को दिल्ली के निकट बादली गांव पहुंचा। यहीं राठौड़ों से बड़ी गलती हुई और वे संकट में फंसते ही गए। इसकी सूचना मिलते ही औरंगजेब ने अगले ही दिन जोधपुर में ''जजिया कर" लगाने का शाही हुक्म जारी कर दिया जिससे जोधपुर की जनता पर अत्याचारों का दौर शुरू हुआ।

जोधपुर सरदारों ने बादली गांव में चार दिन विश्राम कर औरंगजेब की करतूतों एवं भावी विपत्तियों से निपटने की समीक्षा की। तत्पश्चात राठौड़ सरदार दिल्ली स्थित आनन्दीदास एवं श्यामलदास के निवास ''जोधपुर हवेली" पंहुचे। इधर अपने राजकुमारों को देखने तथा उनकी रक्षार्थ स्वयं के बलिदान का गौरव प्राप्त करने की लालसा में मारवाड़ के अनेक जागीरदार अपने दल बल सहित दिल्ली पहुंचने लगे। वीर दुर्गादास ने मारवाड़ राज्य के 10 प्रमुख सरदारों बख्शी उल मुल्क सर बुलंद खां से मिल बादशाह से संपर्क की इच्छा प्रकट की। राठौड़ों को 12 अप्रेल, 1679 को बादशाह से मिलने की अनुमति मिली। दूसरी ओर राठोड़ों की शक्ति से भलि-भांति परिचित औरंगजेब उनमें आपसी फूट उत्पन्न कर उनकी शक्ति क्षीण करने का षडयंत्र भी रचता रहा। राठौड़ों का दल तय समय पर अपनी मांगों के साथ उपस्थित हुआ तो फूट डालने में विफल रहे बादशाह ने बात आगे बढ़ाने के लिए टाल दी। नए आदेशानुसार राठौड़ 14 अप्रेल, 1679 को दीवान-ए-आम में पंहुचे लेकिन बात नहीं बनी। वीर दुर्गादास का अपमान किया। औरंगजेब की कुटिल नीयत का भान राजपूतों को हो चुका था। बादशाह ने दिवंगत महाराजा जसवंतसिंह(प्रथम)के भाई के पौत्र व शाही सेवा के पिठ्ठू नागौर के शासक इंद्रसिंह को जोधपुर का शासक बना पुन: राठौड़ों में फूट डालने की कुत्सित चाल खेली। इंद्रसिंह ने शीघ्र ही जोधपुर की राज गद्दी संभाल कर दिल्ली में स्थित ''जोधपुर की हवेली" को शीघ्र खाली करने के निर्देश दुर्गादास को भेजा।

मारवाड़ सरदार दिल्ली में ही स्थित किशनगढ़ महाराजा ''रूपसिंह की हवेली" में दोनों महारानियों एवं शिशु राजकुमारों के साथ चले गए। संकट बढ़ता देख राठौड़ों को दिल्ली आने की अपनी गलती का ऐहसास हुआ। राठौड़ों ने मारवाड़ जाने की अनुमती औरंगजेब से मांगी। बादशाह भी भारी संख्या में मारवाड़ सरदारों की दिल्ली में उपस्थित से चिंतित था। बादशाह ने दोनों महारानियों एवं उनके शिशु राजकुमारों का दिल्ली में ही रखने की शर्त पर जोधपुर जाने की अनुमति दे दी। खींची मुकुन्ददास के नेतृत्व में बलूंदा ठिकाने के राठौड़ मोकमसिंह सहित दुर्गादास के अति विश्वास प्राप्त सरदारों के दल के साथ ''गोरा धाय" ने अपने दूधमुंहे शिशु को महारानी के पास छोड़ शिशु राजकुमार अजीत सिंह को ले सपेरों के छद्म वेष में मारवाड़ रवाना हुए। शिशु राजकुमार अजीतसिंह के सिरोही के पास सुरक्षित स्थल ''कालंद्री" पंहुचने की सूचना मिलते ही मारवाड़ सरदारों ने राहत की सांस ली। दुर्गादास ने बादशाह को संदेश भेजा कि शिशु राजकुमार अभी दूधमुंहे हैं अत: कुछ बड़े होने पर पेश किया जाएगा। हत्या की अपनी योजना को विफल होता देख बादशाह आगबबूला हो गया। उसने फैलाद खां को ससैन्य शिशु राजकुमारों सहित महारानियों को बलात् नूनगढ़ लाने का आदेश दिया। मारवाड़ की आन, बान और शान की रक्षार्थ अपने प्राणों को न्यौछावर करने सभी राजपूतों ने अपने सिर पर आत्मोत्सर्ग का प्रतीक केसरिया साफा बांध अपने इष्ट आराध्य देवों की स्तुति की। दुर्गादास की योजनानुसार भाटी रघुनाथ के नेतृत्व में एक सौ रणबांकुरों का दल एकाएक हवेली की घेराबंदी किए मुगल सैन्य टुकड़ी पर टूट पडा। मुगल सैनिक इस भीषण हमले से हतप्रभ भाग छूटे। वीर दुर्गादास एवं कुछ सरदार दोनों महारानियों को पुरुष वेश में लेकर निकलने में सफल हो गए।

इधर अपनी आबरू बचाने के लिए अनेक राजपूती विरांगनाओ ने हवेली के अन्दर बारूद से भरे कोठार में जा कर बच्चो सहित आपने आप को विस्फोट से उडा ''जौहर" कर मारवाड सरदारो को षक्ति प्रदान की। देखे ही देखते भीषण विस्फोट से हवेली सहित अनेक वीरागंनाए स्वाहा हो गई। राजपूत वीरांगनाओ के ऐसे षौर्यपूर्ण जौहर देख राजपूतो का खून खौल उठा और मुगलो पर भूखे षेरो की तरह टूट पडे। इस दल ने पूरे दिल्ली की गलियो को रक्त रंजित कर वीरगति प्राप्त की। दूसरी ओर दुर्गादास के नेतृत्व में मारवाड की ओर बढ रहे दल के मुगल सेना की एक बडी टुकडी पीछे लग दिल्ली से 10 मील की दूरी पर जा घेरा। इस संघर्ष में रणछोडदास जोधा के नेत्त्व में मुठ्ठी भर राजपूतो ने चट्टान की तरह अड कर मुगल सेना से काफी अवधि तक लोहा लेते वीरगति प्राप्त की। अब दुर्गादास के पास महारानियो की रक्षार्थ मात्र 50 जांबाज राजपूत ही बचे थे जबकि षाही सेना का पीछा जारी था। एक बार पुन: राजपूत सरदारो एवं मुगन सेना में भयंकर मारकाट मची जिसमें दानो महारानिया भी तलवार चलाते बुरी तरह घायल हुई।

महारानियो की रक्षा मं नियुक्त पांचला ठिकाने के राठौड चन्द्रभान जोधा के सम्मुख घुडसवारी में अक्षम हो चुकी दोनो घायल महारानियो की रक्षा का विचित्र घर्म संकट आन पडा। दोनो बहादुर महारानियों ने परिस्थितियो की नजाकत समझ चन्द्रभान को उन्हें स्वयं के ''मस्तक पूजा" का षौर्यपूर्ण आदेेष दिया। एक बार तो स्वामी भक्त असहाय चन्द्रभान कुछ सकपकाएं लेकिन महारानियो की आबरू की रक्षार्थ दोनो महारानियो के चरण स्पर्ष कर उनके सिर काट 'मस्तक पूजा' की। तत्पष्चात् महारानियो के षवो के साथ मुगलो के हाथो अपमान से बचाने के लिए पास ही बहते एक बरसाती नाले में षवो को ससम्मान बहा दिए। अपनी मातृ स्वरूपा महारानियो के 'मस्तक पूजा' के वीरोचित्त कर्म के गौरव से लबालब चन्द्रभान जोधा ने मारवाड की ओर आगे बढने की बजाय पीछा कर रही मुगल सेना की ओर मुड कर ऐसी गजब की तलवार चलाई कि षाही टुकडी के होष उडा दिए व काफी संख्या में मुगलो को धराषायी कर वीरगति प्राप्त की। यह घटना राजपूती षौर्य एवं बलिदान के इतिहास की बेमिसाल घटना थी।

इस संघर्ष में दुर्गादस के 42 योद्धाओ ने आर-पार की लडाई लडते मुगलो को भारी क्षति पहुंचाते वीरगति प्राप्त की तथा बचे खुचे घायल मात्र सात राजपूत सरदारो सहित दुर्गादास 16 जुलाई, 1679 को सूर्यास्त तक षाही सेना से दूर निकल मारवाड पहुंचने में कामयाब हुए। इस राजपूत-मुगल संघर्ष में सर्वश्री चन्द्रभान, कुम्भा, विठ्ठलदास, रणछोडदास, जूझारसिंह, रामसिंह, जगतसिंह, महासिंह, पृथ्वीराज, दीपा, आसकरण, गोविन्ददास, भारमल, मोहनदास, हिन्दूसिंह, महेषदास, सुन्दरदास, भाखर, काष्ठसिंह, भीम, जस्सू, गोवर्धन, रघुनाथ, उदयसिंह, डूंगरसिंह, भैरवदास, लक्ष्मीदास, सुन्दरदास, हरिदासोत, नारायणदास, सूरजमल, अखैराज, पूर्णमल, षक्तिसिंह तथा उदयभानु ने वीरगति प्राप्त की। इसी क्रम में भाटी गिरधरदास, द्वारकादास, षक्तिसिंह, जगन्नाथ, जोगीदास, चौहान रघुनाथ, धनराज, रघुनाथ मेहता, विष्णुदास, सोमावत, पंचोली, हरिराम, गिरधर, आनन्द सांखला, रेबारी कुम्भा तथा सुलतान ने भी अपनी षहादत दी।

षिषु राजकुमार दलथम्भन की मार्ग में ही मृत्यु हो चुकी थी लेकिन राजकुमार अजीतसिंह के सकुषल मारवाड पहुंच जाने की राजपूतो को अपार प्रसन्नता थी। दुर्गादास ने मारवाड के गुप्त ठिकाने सिवाना के छप्पन की दुर्गम पहाडियों में अवस्थित ''मालकोट" में रहते राठौडो की षक्ति का पुर्नगठन किया एवं मुगलो के अनेक प्रलोभनो को ठुकराते, संघर्ष करते जोधपुर सत्ता हासिल करने का प्रयास जारी रखा। इस क्रम में मारवाड के राजपूतो ने दुर्गादास ने औरंगजेब के षाहजादा अकबर (द्वितीय) को ''नाडोल" में 3 जनवरी, 1681 में पिता के विरूद्ध कर हिन्दुस्तान का बादषाह घोषित करवा दिया। इससे क्रुध हो औरगंजेब षाही सेना के साथ अजमेर के पास पहुंचा। राजपूत समर्थित षाहजादा की सेना से 15 जनवरी, 1681 को षाही सेना का युद्ध हुआ। लेकिन धोखे की चपेट में आ कर षाहजादा युद्ध क्षेत्र से भाग गया व जीती हुई बाजी हार गया। बाद में अकबर (द्वितीय) अपनी नन्ही पु़त्री सफियुतनिषा एवं पुत्र बुलन्द अख्तर को दुर्गादास की षरण में छोड कर डर कर ईरान चला गया। मालकोट में छुप कर रह रहे राजपूतो से निपटने औरंगजेब ने अजमेर के सुबेदार सुजाबेग को भेजा लेकिन षाही सेना की हार हुई। बाद में सिपहदार खां को ससैन्य भेजा उसे भी मार भगाया। तत्पष्चात् जोधपुर के प्रषासक ने अपने अमीन ईष्वरदास नागर को दुर्गादास से वार्ता के लिए भेजा ''मालकोट" भेजा। इस पर तरूणी होती सफीयतुन्निसा को दुर्गादास ने ससम्मान दिल्ली दरबार में भेजा जिस पर औरंगजेब दुर्गादास के उच्च चरित्र से अत्यन्त प्रभावित हुआ। बाद में दक्षिण के इस्लामपुरी में बुलन्दअख्तर को भी बादषाह को सौंप दिया।

औरंगजेब की् केन्द्रीय सत्ता के कमजोर होते ही सन् 1707 के प्रारम्भ में स्वामीभक्त दुर्गादास ने जोधपुर के फौजदार जाफरकुली खां को मार भगाया। युवा अजीतसिंह को जोधपुर की गद्दी पर बिठा कर अन्तोगत्वा अपना संकल्प पूर्ण किया। इसकी चर्चा एक कवि ने अपनी रचना में की। ''ढबक ढबक ढोला बाजे, दे दे ढोल नगाडो की। आसे घर दुर्गो नी होतो, सुन्नत होती सारा री। कालान्तर में मामूली बात पर महाराजा अजीतसिंह द्वारा वृद्ध दुर्गादास को राज्य से निस्कासित करने पर महाराजा की जबरदस्त अपकीर्ति हुई। ऐसे स्वामिभक्त एवं वीर षिरोमणी दुर्गादास जैसा उच्च चरित्र का नायक मारवाड ही नही बल्कि पूरे देष में कही नहीं हुआ। जिसकी ओरंगजेब स्वयं ने कई अवसरो पर दाद दी। जोधपुर के सालवा गांव में वि.स. 1695, सावन सुदि 14 सोमवार (13 अगस्त, 1638 )को जन्में दुर्गादास की अन्तत: मृत्यु 22 नवम्बर, 1718 को मध्य प्रदेष में हुई तथा उनका अन्तिम संस्कार क्षिप्रा नदी के तट पर हुआ। इस पर भी एक कवि ने लिखा ''इण घर आ ही रीत दुर्गा सफरा दागियां। "


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