अल्लाह और अमरीका के बीच नाक की लड़ाई में फंसा तुर्की

जागरूक टाइम्स 759 Aug 17, 2018

अंकल सैम की एक पुरानी आदत है, काम निकालो और दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर फेंको। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही 'अंकल सैम' अमेरिकी सरकार के लिए पर्यायवाची शब्द है। अमेरिका अलग-अलग समय में अलग अलग देशों के साथ ऐसी हरकतें करता रहा है। इन दिनों वह ऐसा सुलूक तुर्की के साथ कर रहा है। अमरीका की दबंगई के चलते तुर्की अर्थव्यवस्था के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। पांच साल पहले तुर्किस लोग दो लीरा देकर एक डॉलर खरीद सकते थे। अब तुर्की की करेंसी लीरा पर मुद्रास्फीति की मार पड़ रही है। 6.50 लीरा देने के बाद एक डॉलर मुश्किल से मिल पा रहा है।

तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोआन ने बयान दिया है कि उनके पास डॉलर है, तो हमारे पास अल्लाह है। अल्लाह और अमेरिका के भरोसे हर वक्त रहने वाले तुर्की के साथ ऐसा होने की जो वजह बताई जा रही है, वह है अमेरिकी पादरी एंड्रयू ब्रुसन की गिरफ्तारी। अक्टूबर 2016 से पादरी एंड्रयू ब्रुसन जासूसी के आरोप में नजरबंद हैं। पादरी एंड्रयू ब्रुसन लंबे समय से तुर्की में रह रहे हैं। आरोप है कि पादरी एंड्रयू ब्रुसन का कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी और फतेउल्लाह गुलेन से संबंध है। फतेउल्लाह गुलेन इस समय अमेरिका की शरण में हैं । पेन्सिल्वेनिया के सायलोसबुर्ग में रह रहे फतेउल्लाह गुलेन की पूरी दुनिया में बहुधर्मी (इंटरफेथ) संस्था, 'हिजमत' चलती है, जिसपर प्रतिबंध के वास्ते एर्दोआन ने अभियान छेड़ रखा है।

फतेउल्लाह गुलेन की संस्था से सरोकार रखने वाले देशों में भारत भी है। 19 जुलाई 2016 को तुर्की के राजदूत बुराक अक्कापार ने बाकायदा पत्र लिखकर भारत सरकार से अनुरोध किया कि फतेउल्लाह गुलेन से संबद्ध संस्थाओं पर रोक लगाई जाए। तुर्की का यह अपरोक्ष दबाव था कि भारत फतेउल्लाह गुलेन और उसकी संस्था पर पाबंदी आयद करे और उसे आतंकी घोषित करे। मार्च 2016 में दिल्ली में विश्व सूफी फोरम के आयोजन में फतेउल्लाह गुलेन आमंत्रित थे, अंकारा ने उसका भी बुरा माना था। तुर्की ने 'फेटो' (फतेउल्लाह गुलेन टेररिस्ट आर्गेनाइजेशन) जैसा शब्द चला रखा है, जिसपर भारत भी सहमत हो, उसके लिए एर्दोआन ने 'एनएसजी' का चुग्गा फेंका था। यह ठीक है कि राष्ट्रपति ओबामा के रहते 'एनएसजी' (न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप) की सदस्यता के वास्ते भारत ने गंभीर प्रयास किए थे।

मगर, चीन, न्यूजीलैंड, और तुर्की के कारण बनती हुई बात बिगड़ गई थी। दक्षिण तुर्की में 1978 से स्वतंत्र कुर्दिस्तान की मांग की लड़ाई चल रही है। राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोआन के लिए अपना घर संभालना मुश्किल हो रहा है। अमेरिकी पादरी एंड्रयू ब्रुसन पर कुर्द अलगाववादियों की मदद और फतेउल्लाह गुलेन टेररिस्ट आर्गेनाइजेशन से संबंध साबित हुआ तो 35 साल की सजा पक्की मानिये। नाटो का प्रमुख सदस्य होने के कारण अमेरिका तुर्की पर हमलावर भी नहीं हो सकता। इसलिए ट्रंप प्रशासन ने आर्थिक नाकेबंदी कर तुर्की को सबक सिखाने का रास्ता अख्तियार किया है। तुर्की का विदेशी मुद्रा भंडार धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। सालाना आर्थिक विदेशी फंड 218 अरब डॉलर एर्दोआन जुटा पाएंगे, या नहीं? बड़ा सवाल है। अभी तो अमेरिका ने सिर्फ अल्युमिनियम और स्टील पर आयात शुल्क दोगुना किया है।

धीरे-धीरे ट्रेड बास्केट पर कहर बरपाने का विस्तार होगा। लेकिन क्या इस सबक सिखाओ अभियान का बुरा असर नाटो पर पडऩे वाला है? पिछले साल से अबतक तुर्की ने सबसे अधिक परेशानी पैदा की है। 2017 में रिसेप तैयप एर्दोआन ने एक आदेश द्वारा नाटो में कार्य कर रहे 300 में से डेढ़ सौ अफसरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया था। एर्दोआन की जर्मन चांसलर मैर्केल से भी अच्छी-खासी बहस हुई थी। मैर्केल ने तुर्की में प्रेस की आजादी से लेकर सीरिया सीमा तक जर्मन अधिकारियों को रोकने का मुद्दा उठाया, तो एर्दोआन ने तुर्की से जर्मनी गए शरणार्थियों को वापिस भेजे जाने के मामले पर मैर्केल को घेरा। इस बहसबाजी से यही लग रहा है कि नाटो में सबकुछ सही नहीं चल रहा है।

तुर्की ऐसे भू-सामरिक मुहाने पर है, जिसे साधे बिना यूरोप और अमेरिका मध्य पूर्व को नियंत्रित नहीं कर सकते। सीरिया और इराक में जो कुछ सफलता अमेरिका व उसकी मित्र मंडली को हाथ लगी, उसमें तुर्की के योगदान से इंकार नहीं कर सकते। सवाल यह है कि ट्रंप व एर्दोआन के बीच बात बिगड़ती गई, तो नाटो का क्या होगा? सभव है इस लड़ाई का फायदा पुतिन उठाएं। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) बना इसलिए, ताकि उत्तर अमेरिकी और यूरोपीय देशों पर कभी हमला होता हो, तो उसकी रक्षा के वास्ते सदस्य देश सामूहिक रूप से मुकाबला करें। 4 अप्रेल 1949 को इस सैनिक गठजोड़ पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने हस्ताक्षर किए थे। इस समय नाटो सदस्य देशों की संख्या 29 है।

ट्रंप जब से सत्ता में आए हैं, नाटो का खर्च उठाने से कट रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सवाल उठाया कि अमेरिका ही क्यों नाटो पर सबसे अधिक पैसे खर्च करे। इस संगठन के बुनियाद के समय तय यह हुआ था कि सदस्य देश अपनी जीडीपी का दो प्रतिशत नाटो को देंगे। मगर, ऐसा हुआ नहीं। नाटो को टिकाये रखने के लिए अमेरिका को दो प्रतिशत ही नहीं, बल्कि अपने जीडीपी का 3.6 देना पड़ रहा है। मगर, ट्रंप जैसे राष्ट्रपति के पास इसका जवाब नहीं है कि कोरियन वार से कोसोवो, और कुवैत तक इराक से लेकर सीरिया, अफगानिस्तान तक और यूक्रेन समेत पूर्वी यूरोप के देशों, अफ्रीका तक अमेरिका ने जो चैधराहट दिखाई है, उसकी बड़ी कीमत छोटे सदस्य देश क्यों चुकाएं? इराक और सीरिया में जो कुछ हुआ, उसमें तुर्की की भू-सामरिक स्थिति का फायदा अमेरिका ने खूब उठाया था। ट्रंप भले ही एर्दोआन से नाक की लड़ाई लड़ रहे हों, मगर बात आगे बढ़ी तो नुकसान नाटो को हो सकता है।



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