ट्रंप-किम मुलाकात : आखिर कितनी उम्मीद रखें ?

जागरूक टाइम्स 113 Jun 13, 2018

शाहिद ए. चौधरी : कभी हां, कभी ना के बाद आखिर यह तय हो गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के प्रमुख किम जोंग-अन के बीच ऐतिहासिक परमाणु हथियार सम्मेलन 12 जून को सिंगापुर में होगा, जिसका पूरा खर्च आईकैन ने उठाने की पेशकश की है। आईकैन परमाणु हथियारों के विरुद्ध अभियान चलाने वाला संगठन है, जिसे अपने प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। वह परमाणु हथियार मुक्त संसार और कोरियाई प्रायद्वीप में शांति का इच्छुक है। इसलिए वह अपनी नोबेल राशि से इस सम्मेलन को फंड करने के लिए तैयार है।

लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि अगर ये दोनों नेता यानी ट्रंप व किम, किसी समझौते पर पहुंचते हैं तो वह किस प्रकार का होगा? किम की अब तक की वरीयता अमेरिका के विरुद्ध परमाणु प्रतिरोधक विकसित करने की रही है, इसलिए यह तो संभव प्रतीत नहीं होता कि वह अपने देश पर लगीं संयुक्त राष्ट्र पाबंदियों को हटाने के बदले में पहली ही मुलाकात में अपने परमाणु हथियार पूर्ण रूप से तुरंत या निकट भविष्य में त्यागने के लिए तैयार हो जाएंगे, जैसा कि अमेरिका के रक्षा सचिव जेम्स मैटिस की तरफ से शर्त रखी गई है। मैटिस ने कहा कि उत्तर कोरिया को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से राहत तभी मिलेगी, जब वह अपरिवर्तनीय निरस्त्रीकरण के साक्ष्य प्रस्तुत करेगा। हां, सम्मेलन में यह संभव है कि अमेरिका से संबंध सुधारने की प्रक्रिया, कोरियाई युद्ध विराम की जगह शांति स्थापित करने के समझौते और आर्थिक प्रतिबंधों को कम करने के लिए उत्तर कोरिया निरस्त्रीकरण के लक्ष्य के लिए सहमत हो जाए।

 इन रियायतों के बदले में उत्तर कोरिया परमाणु परीक्षण स्थगित कर सकता है और अपनी परमाणु सुविधाओं के निरीक्षण की अनुमति भी दे सकता है। लेकिन यह पुष्टि करने में बहुत लम्बा समय लगेगा कि उत्तर कोरिया ने अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से छोड़ दिया है। यहां यह बताना भी आवश्यक है कि कोई यह उम्मीद न रखे कि निकट भविष्य में उत्तर व दक्षिण कोरिया का एकीकरण हो जाएगा; यह अलग बात है कि अब दोनों देशों के नेताओं के बीच चार मुलाकातें हो चुकी हैं-पहली 2000 में, दूसरी 2007 में और दो इस वर्ष। यह प्रश्न भी प्रासंगिक है कि उत्तर कोरिया ने अचानक अपनी रणनीति क्यों बदल दी है? निश्चित रूप से उत्तर कोरिया पर अपना परमाणु व मिसाइल कार्यक्रम बंद करने का जबरदस्त अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ रहा था और पिछले दो वर्षों के दौरान आर्थिक प्रतिबंध उसके लिए बहुत ही कष्टदायक रहे हैं। लेकिन उसका लक्ष्य अपनी यह क्षमता प्रदर्शित करना रहा है कि वह अमेरिका से अपनी सुरक्षा अपने परमाणु हथियारों के बल पर कर सकता है। किम ने दावा किया कि उन्होंने अपना यह लक्ष्य 2017 के अंत तक हासिल कर लिया था, जब उन्होंने अमेरिका के मुख्य भाग पर वार करने में सक्षम मिसाइल का सफल टेस्ट किया। यह करने के बाद, किम ने हाल के महीनों में यह संकेत दिए कि अब वह अपना फोकस अपने देश के आर्थिक विकास पर करना चाहते हैं।

यह करने के लिए अमेरिकी नेतृत्व वाले प्रतिबंधों को हटाना आवश्यक है। इस परिवर्तन की इस साल अप्रेल में किम ने यह कहकर व्याख्या की कि यह 'नई रणनीति है', जिसमें फोकस सैन्य विकास की जगह आर्थिक विकास होगा। अत: उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया व अमेरिका से संपर्क बढ़ाया ताकि अपने अकेलेपन से बाहर निकले और बाहर के संसार से पुन: जुड़ जाए। यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि भूमंडलीकरण के दौर में प्रतिबंधों का सामना करते हुए उत्तर कोरिया ने अपना अस्तित्व कैसे बचाए रखा? उत्तर कोरिया ने अति निम्न स्तर पर अपनी अर्थव्यवस्था को जारी रखने का प्रबंधन किया, जिसमें चीन से मदद व व्यापार (उत्तर कोरिया का लगभग 80 प्रतिशत विदेशी व्यापार) और प्रतिबंधों से वैध व अवैध रूप से बचना शामिल रहा है। हालांकि इससे उत्तर कोरिया ने अपने को 'जीवित' तो रखा, लेकिन यह वहनीय योजना नहीं है अगर कोई देश महत्वपूर्ण आर्थिक विकास चाहता है। लेकिन 2011 में सत्ता संभालने के बाद से ही किम की वरीयता अमेरिका के खिलाफ परमाणु प्रतिरोधक क्षमता विकसित करनी रही है। अब जब वह यह हासिल कर चुके हैं तो किम व उनकी सरकार अपनी अर्थव्यवस्था विकसित करने के लिए अमेरिका से संबंध सुधारने पर फोकस कर रहे हैं। सवाल है, क्या यह सम्मेलन ग्लोबल आर्डर को बदल सकेगा? इस सम्मेलन से कोई ज्यादा उम्मीद न रखे क्योंकि इससे कोई ठोस नतीजे निकलने वाले नहीं हैं।

 इससे संसार तो क्या कोरियाई प्रायद्वीप पर भी व्यवस्था में तुरंत कोई परिवर्तन नहीं आएगा। लेकिन इससे कोरियाई प्रायद्वीप पर तनाव कम करने, उत्तर कोरिया व अमेरिका के बीच कम टकराव वाले संबंध और आखिरकार 1953 के कोरिया युद्ध विराम की जगह शांति समझौता और कोरियाई युद्ध की औपचारिक समाप्ति का सिलसिला आरंभ हो सकता है। इसमें भी सालों लग सकते हैं। उत्तर कोरिया ने तथाकथित 'लीबिया मॉडल' को स्वीकार करने से इंकार किया है, जिसके तहत परमाणु हथियारों को तुरंत हवाई जहाजों पर लादकर अमेरिका रवाना कर दिया गया था। किम के अनुसार समस्या का समाधान 'स्टेज बाय स्टेज' आधार पर होना चाहिए।

ट्रम्प इस बात पर बल दे रहे हैं कि अंतिम लक्ष्य निरस्त्रीकरण है, लेकिन क्रमिक तरीका अपनाने के लिए दरवाजा खुला रखा है। इसलिए सम्मेलन का अति संभावित नतीजा यह निकल सकता है कि वार्ता को जारी रखा जाए। लेकिन इस संभावना को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि सम्मेलन बुरी तरह से फ्लॉप हो जाए। ट्रंप ने अपने अब तक के कार्यकाल में यह प्रदर्शित नहीं किया है कि ग्लोबल मंच पर वह प्रभावी समझौते करने में सक्षम हैं-उन्होंने समझौते रद्द किए हैं (जैसे ईरान संधि), बजाय इसके कि कोई नया समझौता किया हो। उनके फैसलों (येरुशलम को इजराइल की राजधानी स्वीकार करना) से तनाव बढ़ा है, शांति स्थापित नहीं हुई है। इसलिए सिंगापुर में अगर ट्रंप उत्तर कोरिया पर अपनी बात मनवाने के लिए अधिक दबाव बनाते हैं तो बनती हुई बात ऐन मौके पर बिगड़ भी सकती है।

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