दलितों के सामने आ खड़े हुए सवर्ण, यह किसकी साजिश, किसका खेल?

जागरूक टाइम्स 1068 Sep 5, 2018

एससी-एसटी (एट्रोसिटी एक्ट) पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सरकार द्वारा पलटने से नाराज सवर्णों ने पहले बिहार और फिर मध्य प्रदेश के कई जिलों में रैली की और अब 6 सितंबर 2018 यानी कल के लिए भारत बंद का ऐलान किया है। सवर्णों के इस बंद में पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था (सपाक्स) भी शामिल हो गई है। इस तरह सपाक्स सहित 30 से 35 संगठनों ने मिलकर भारत बंद का जो आह्वान किया है, वह करीब-करीब वैसा ही है जैसे इस साल अप्रेल में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के करीब 3 दर्जन संगठनों ने बंद किया था। यह बंद एक किस्म से उसी बंद का जवाब है। ऐसे में यह आशंका स्वभाविक है कि अप्रेल की ही तरह कल भी हिंसा और तोडफ़ोड़ की घटनाएं हो सकती हैं। भले इनका दायरा छोटा हो और भारत बंद के नाम पर महज उत्तर भारत के कुछ इलाको में ही यह बंद की मनमानी दिखे।

बहरहाल इस बंद पर हम कोई निष्कर्ष निकालें उसके पहले चुप्पी साधे उस संस्था की भूमिका पर भी एक नजर डाल लेते हैं जिसे सरकार कहते हैं। भारतीय राजनीति अपने विरोधाभासी विचारों के लिए ही नहीं, विरोधाभासी हरकतों के लिहाज से भी दुनिया में अद्वितीय है। एक तरफ सवर्णों की नई पीढ़ी उबाल पर है, उसे लगातार लग रहा है कि उसकी योग्यता के साथ, उसको मिलने वाले जेनुइन अवसरों के साथ अन्याय हो रहा है। अगर सवर्णों की नई पीढ़ी को यह सब लग रहा है तो यह निरानिर अस्वाभाविक भी नहीं है। खासकर तब जब बड़े पैमाने पर तमाम सवर्ण भी बेहद गरीबी और पिछड़ेपन का शिकार हों। ऐसे में अगर इन सवर्णों की नई पीढ़ी को लगता है कि महज जाति से ऊंचे होने के नाम पर उनके साथ यह नाइंसाफी हो रही है। कोई भी हो, उसको यही लगेगा।

सवाल है फिर कौन गलत है और इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? निश्चित रूप से इसके लिए देश की राजनीतिक पार्टियां और तमाम सरकारें ही जिम्मेदार हैं। तमाम राजनीतिक पार्टियां जब सत्ता में नहीं होतीं तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौरपर न केवल सवर्णों की नई पीढ़ी की भावनाओं को स्वीकारती हैं बल्कि पर्दे के पीछे रहकर और कई बार तो खुल्लम-खुल उनकी इन भावनाओं को भड़काती भी हैं। लेकिन जब यही राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आ जाती हैं तो उन्हें संविधान की याद आ जाती है और वे संविधान की दुहाईयां देने लगती हैं। सत्ता में आने के बाद राजनीतिक पार्टियां अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के उत्थान हेतु न सिर्फ उनके लिए संविधान में तय किए गए आरक्षण की बात करती हैं बल्कि उनके कल्याण के लिए बनाए गए तमाम किस्म के कानूनों का भी बढ़ चढ़कर वकालत करती हैं।

लेकिन ठीक उसी समय इन्हीं राजनीतिक पार्टियों के जो नेता सरकार में नहीं होते, वे सरकार की नीतियों के उलट बयान देते हैं और सवर्णों के साथ पर्दे के पीछे खड़े होते हैं। देश के जिन प्रांतों में सवर्ण गुस्से में उबल रहे हैं, उन्हें भी इन्हीं पार्टियों के नेताओं ने शह दे रखी है। इसका साफ मतलब है कि राजनेता एक तरफ दलितों के हितैषी बनते हैं, ठीक उसी समय उन्हीं राजनीतिक पार्टियों के कुछ नेता सवर्णों के साथ सांठगांठ किए हुए हैं। नेताओं ने सवर्णों और गैरसवर्णों दोनों को ही फुटबॉल बना दिया है। जब जैसी जरूरत पड़ती है, अपनी राजनीति को बचाने और उसे चमकाने के लिए वे वैसी ही किक लगाते हैं। सवर्ण और गैरसवर्ण दोनों ही सही मायनों में राजनेताओं की साजिश का शिकार हैं। लेकिन वे अपने विरुद्ध इन साजिशों को समझने की बजाय आमने-सामने खड़े हुए हैं और एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं जबकि सही मायनों में दोनों ही राजनेताओं के शिकार हैं।

आखिर देश को कभी न कभी तो इस सवाल से दोचार होना ही पड़ेगा कि अगर सवर्णों की नई पीढ़ी यह सोचती है कि उनकी योग्यता के साथ आरक्षण के नाम पर अन्याय हो रहा है या एससी-एसटी (एट्रोसिटी एक्ट) के चलते उनको नाहक परेशान किया जा रहा है, उनकी सामाजिक छवि पर आघात किया जा रहा है, तो आखिर यह पीढ़ी ऐसा क्यों सोच रही है और यह ऐसा न सोचे इसके लिए क्या करना होगा? दूसरी तरफ हमें यह सवाल भी कभी न कभी परेशान करेगा ही कि जो समाज बराबरी की कसौटी पर तार्किक नहीं होगा, आखिर उस समाज में समरसता कैसे आएगी और कब तक डंडे के बल पर ही बनाई रखी जा सकेगी? हकीकत यह है कि न तो दलितों की नाराजगी गलत है, न ही उनके सवाल गलत हैं। साथ ही इसी तरह यह भी गलत नहीं है कि सवर्णों की नई पीढ़ी अपनी पुरानी पीढिय़ों की तरह ही गैरबराबरी पसंद और अतार्किक है। यह स्थिति राजनीति और राजनेताओं की नाकामी तथा तात्कालिक फायदों की सोच के चलते बनी है।

हमारे राजेनताओं ने वोट खोने के डर से कभी भी ईमानदारी से न तो कोई राजनीतिक फैसला किया है और न ही ईमानदारी से विचारों की पक्षधरता की है। दलितों और गैर दलितों की समस्याओं में सबसे बड़ा रोड़ा आर्थिक विषमता है और इस आर्थिक विषमता का मूलभूत कारण यही है कि देश के तमाम आर्थिक संसाधन थोड़े से सवर्णों के कब्जे में हैं। जबकि देश की बहुत बड़ी तादाद के पास उनकी संख्या के मुकाबले बहुत कम संसाधन हैं। आजादी के ठीक बाद बनने वाली हिंदुस्तान की पहली सरकार ने देश के तमाम संसाधनों का अगर तमाम लोगों के बीच न्यायिक बंटवारा कर दिया होता और शुरू से ही स्पष्ट रूप से यह कानून बना दिया होता कि जो भी गरीब और कमजोर हैं, उनकी इसी आधार पर मदद होगी तो सवर्णों और गैरसवर्णों के बीच आपस में गुस्से और आक्रोश की यह स्थिति ही न आई होती। आज भी देर नहीं हुई।

सरकार को चाहिए कि वह सवर्णों की नई पीढ़ी को बताए कि उसे मालूम है कि सवर्णों के साथ तार्किक रूप से गलत हो रहा है। लेकिन सदियों से पीडि़त समुदाय के सामाजिक उत्थान के अभियान में यह सवर्णों की कुर्बानी है। अगर ईमानदारी से देश की वस्तुस्थिति को भारत की राजनीतिक पार्टियों ने आजादी के बाद आम लोगों के बीच रखा होता तो इस किस्म का विषैला बंटवारा सवर्णों और गैरसवर्णों के बीच न हुआ होता। लेकिन राजनेताओं ने वोट खोने के डर से कभी आम जनता के सामने सच्चाई रखी ही नहीं और दोनों को कूटनीतिक तरीके से सहलाती रही है। इसलिए सवर्ण तथा गैरसवर्ण एक दूसरे के दुश्मन बन गए हैं। राजनीति को शायद इसी में फायदा है।

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