तकनीकी शिक्षा स्कूली स्तर से हो शुरुआत

जागरूक टाइम्स 139 Jun 30, 2018

आज भारत के हर संभव विकास की बुनियाद में तकनीकी विकास भी जरूरी हो गया है। इसके विभिन्न रूपों, जैसे- आर्टिफिशियल इंटेलीजेंसी, ऑटोमेशन, वर्चुअल रियलिटी, आग्मेंटेड रियलिटी, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, डिजिटलाइजेशन, डिजिटल इंडिया और सोशल मीडिया के आयामों की चर्चा जोरों पर है।

क्योंकि टेक्नोलॉजी के बगैर एक कदम भी आगे चलना आसान नहीं है। इनका प्रवेश कामकाज के कई क्षेत्रों में हो चुका है, तो कई महकमों में पिछले दरवाजे से इनकी दखलंदाजी बढ़ रही है। आने वाले दिनों में टेक्नोलॉजी के बगैर किसी कार्य को निपटाना संभव नहीं होगा।

देश का सामान्य व्यक्ति हो या फिर शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, परिवहन, औद्योगिक क्षेत्र, सभी विज्ञान और टेक्नोलॉजी की जद में आ चुके हैं। ऐसे में हमारी बुनियादी शिक्षा व्यवस्था के अंतर्गत पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों को लेकर दुविधाएं बढ़ती जा रही हैं।

करिअर के लिहाज से डाक्टरी, इंजीनियरिंग, कॉमर्स, शिक्षक और वकालत जैसे पेशे के अतिरिक्त दूसरा कुछ नजर नहीं आता है। बाकी के पेशे फिजूल समझे जाते हैं, जबकि ऐसा समझना बड़ी भूल कही जा सकती है। आज प्राथमिक से लेकर हाईस्कूल में नामांकन के दौरान तक न तो बच्चों को विषय चयन की चिंता रहती है, और न ही अभिभावक इसकी जरूरत समझ पाते हैं।

बुनियाद बनाने वाले शिक्षविद और शिक्षक रिजल्ट एवं परीक्षा पास होने की एक खींची लकीर पर चलते रहते हैं। वे स्कूल की कक्षाओं के बाहर देश-दुनिया में हो रहे बदलावों से बेखबर हिंदी, अंग्रेजी या क्षेत्रीय भाषा, विज्ञान, गणित, सामाजशास्त्र, इतिहास, भूगोल और चरित्र निर्माण की नैतिकता सीखने-समझने में जुटे होते हैं। जबकि कक्षा से बाहर निकलते ही उनका सामना स्मार्टफोन, गैजेट से भरे घर, सार्वजनिक स्थल, मनोरंजन के विविध आयाम बाजार और दूसरे संसाधनों से होता है।

तब उन्हें महसूस होता है कि इनके बारे में आवश्यक जानकारी कैसे और कहां मिलेगी? जब उच्च शिक्षा के लिए कोर्स के चयन की बारी आती है तब वे काफी उलझ जाते हैं। उनके लिए अपनी योग्यता और स्कूली जानकारी के आधार पर किसी कोर्स का चयन करना मुश्किल भरा काम हो जाता।

बेहतर करिअर के लिए आखिर किस विषय की पढ़ाई करें? कहां जाएं? करिअर किन विषयों में बनाएं? नौकरी करें या किसी रोजगार को चुनें? इस उलझन का नुकसान न केवल बेहतर करिअर की उम्मीद लगाए बैठे नवयुवकों को होता है बल्कि समाज और देश को भी होता है यानी कि समुचित दिशा-निर्देश और पर्याप्त प्रशिक्षण की सुविधा के अभाव में बाहें फैलाए कई असीमित संभावनाओं की ओर उनकी नजर ही नहीं जाती है।

यह समस्या इसलिए है क्योंकि आज स्कूलों में तकनीक के बड़े बदलावों के साथ कदमताल बिठाने की कोई शिक्षा नीति नहीं है, जिसका उपयोग उच्च शिक्षा संबंधी कोर्स के चयन के लिए किया जा सके। यदि डिजिटल इंडिया के सपने के संदर्भ में नई तकनीक आर्टिफिशियल इंटेलीजेंसी(एआई) की बात करें तो इस क्षेत्र में बनी हुई तेजी और करिअर संबंधी फायदे से नई पीढ़ी अनजान है।

इसके सकारात्मक पहलू ही सामने नहीं आए हैं। हालांकि उच्च स्तर पर एआई के क्षेत्र में कुछ भारतीय विशेषज्ञ शोधकार्य शुरू कर चुके है, जिससे देश में इसकी जरूरतें और इससे होने वाले भविष्य के बदलावों का नया दृष्टिकोण मिलेगा। भविष्य के इस नए माहौल के लिए भी तो तैयारी स्कूली स्तर से होनी चाहिए, वह नहीं हो रही। ऐसे में सवाल यह है कि इसे स्कूलों तक कैसे पहुंचाया जाए? इसमें देरी होने पर इसकी भी स्थिति कंप्यूटर के बेसिक ज्ञान की तरह स्कूली बच्चों के पिछडऩे जैसी न हो जाए? चार दशक बाद भी अधिकतर स्कूलों के बच्चे कंप्यूटर इस्तेमाल से वंचित हैं।

जबकि इसे 'तकनीकी भाषा ज्ञान' की तरह अनिवार्य विषय बनाया जाना चाहिए था। इसकी भी बोर्ड स्तर की परीक्षा ली जानी चाहिए थी। ऐसा होने पर मैट्रिक पास करने वाले हर विद्यार्थी को कंप्यूटर के हार्डवेयर, साफ्टवेयर के साथ-साथ कंप्यूटिंग की बेसिक जानकारी भी हो जाती। यदि ऐसा होता तो सरकार को अलग से कंप्यूटर कोर्स करवाने के लिए कौशल विकास के नाम पर योजनाएं नहीं चलानी पड़तीं।

चर्चित अमेरिकी भविष्यक्ता रे कुर्जवेल की मानें तो आने वाला समय कृत्रिम एआई का है। वर्ष 2029 के अंत तक इसमें होने वाले व्यापक सुधार से कंप्यूटर संचालित उपकरण या कहें इस्तेमाल होने वाली अधिकतर मशीनें इंसानी दिमाग की तरह काम करने में सक्षम हो जाएंगी। हर क्षेत्र में इसके आ जाने से उस दौर को तकनीकी श्रेष्ठता की तरह समझा जाएगा, जिसमें हमारी क्षमताएं मौजूदा स्तर से अरबों गुना बढ़ चुकी होंगी। ..तो क्या हम इस परिवर्तन के क्रम में तकनीकी उन्नति के उस दौर में हैं, जहां हमारा जीवन इसकी बदौलत तेजी से बदल रहा है? ऐसे में दोधारी तलवार की तरह तकनीक के वेजा इस्तेमाल के अनिश्चित तरीके की भी समझ होनी चाहिए। यह पूरा का पूरा समुचित शिक्षा और बच्चों के कौशल विकास, प्रतिभा और मेधा की समझ के साथ जुड़ा हुआ है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि डिजिटल तकनीकी बदलाव की कमान भविष्य में उनके हाथ में ही होगी। यदि वे इसमें कमजोर साबित हुए तो हमारी निर्भरता यूरोपीय देशों पर और अधिक बढ़ जाएगी और फिर इनसे सृजित होने वाले नए दौर के रोजगार को अपनाने में भी हम असफल हो जाएंगे। बहरहाल, हमें जर्मनी से सीख लेनी चाहिए, जिसने तकनीकी शिक्षा और विज्ञान को स्कूली बच्चों के बीच लोकप्रिय बनाकर तरक्की हासिल की है।

औद्योगिक विकास के लिए कुशल कामगारों की कमी इन्हीं की बदौलत पूरी हो पाई। जर्मनी की अर्थव्यवस्था में कामयाबी का राज वहां अच्छा व्यवसायिक प्रशिक्षण और तकनीकी शिक्षा ही रहा है। इनके प्रति रूचि जगाने के साथ-साथ सुविधाएं मुहैय्या करवाई गई है। हमें भी तकनीकी शिक्षा को व्यापक पैमाने पर अपनाने की जरूरत है। यहां के स्कूलों में एक पीरियड ऐसा हो जिसमें सामयिक तकनीकी बातों की पढ़ाई की जा सके। इसका लाभ बच्चों की अभिरूचि के चयन और उसकी तार्किक क्षमता विकसित करने मेें मिल सकता है तथा वे इंटरनेट ऑफ थिंग्स तकनीक का बेहतर इस्तेमाल करने में सक्षम हो सकते हैं।




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