सम-सामयिक : क्या हम ऑडियो में साहित्य सुनना पसंद करेंगे?

जागरूक टाइम्स 130 Aug 31, 2018

सच कहूं तो मुझे ऑडियो में कोई कहानी सुनना कभी भी रास नहीं आता। किसी छोटे या बड़े उपन्यास को तो ऑडियो में सुनना किसी सजा से कम नहीं लगता। हां, कविताएं जरूर मैं ऑडियो में कभी-कभी सुन लेता हूं। लेकिन मुझे हमेशा यही लगता है कि किसी रचना को पढऩे में जो सुख और आत्मीयता का अहसास होता है, वह ऑडियो में नहीं मिल सकता। बावजूद इसके मैं कुछ कहानियां या कविताएं ऑडियो में सुन लेता हूं। ये आमतौर पर किसी मित्र या परिचित की ही रचनाएं होती हैं। लेकिन अगर सुनने और पढऩे में से किसी एक को चुनना हो तो मैं पढऩा ही पसंद करूंगा। किताब की अपनी एक खूबी यह भी है कि वह आपको सोचने का वक्त देती है। अगर आप कहानी के किसी हिस्से या उपन्यास के किसी अंश पर कुछ देर विचार करना चाहते हैं तो आप पढऩा रोक कर, ऐसा कर सकते हैं। जो मुझे दूसरे माध्यमों में इतना सहज नहीं लगता।

ये मेरी निजी दिक्कतें भी हो सकती हैं। हो सकता है किताबें पढऩे की मेरी पुरानी आदतें तमाम नये माध्यमों को जिनमें ऑडियो भी शामिल है, स्वीकार न कर पा रही हों। लेकिन किताबों की दुनिया विशेषकर साहित्य की दुनिया ऑडियो को भविष्य के एक बड़े बाजार के रूप में देख रही है। कुछ साल पहले भी हिंदी के एक बड़े प्रकाशक ने इस तरह के प्रयोग किये थे, लेकिन वे ज्यादा कामयाब नहीं हुए थे। तब से अब तक तकनीक का बहुत विकास हो चुका है। अब आप अपने मोबाइल से ही वीडियो या ऑडियो रिकार्ड करके सोशल मीडिया पर या यूट्यूब पर डाल सकते हैं। यूट्यूब पर कहानियों और कविताओं के न जाने कितने चैनल चल रहे हैं। युवाओं द्वारा चलाए जा रहे ये चैनल और कुछ बेशक न कर पा रहे हों, लेकिन युवाओं में साहित्य की रुचि पैदा करने का काम तो कर ही सकते हैं(?) या शायद कर भी रहे हों।

लेकिन हिंदी के कई प्रकाशक एक बार फिर ऑडियो बाजार को टैप करना चाहते हैं। ऐसी खबरें हैं कि दिल्ली के कई बड़े प्रकाशक अपनी किताबों को ऑडियो फॉरमेट में लांच करने की तैयारी कर रहे हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि आप प्रिंटेड किताबों को बेच पाने में असफल रहे हैं या ऑडियो माध्यम में जाने की तैयारी एक पूरक तैयारी है? हिंदी युग्म ने अपनी सभी प्रकाशित किताबें (160 के आसपास) एमेजॉन को ऑडियो के लिए दे दी हैं। जाहिर है इन किताबों को ऑडियो में कन्वर्ट करने में अच्छी खासी रकम खर्च होगी। यह रकम क्या पाठकों से ली जाएगी या उन्हें डाउनलोडिंग का पैसा देना होगा? अगर पाठकों को पैसे देकर ही ऑडियो भी सुनना है तो यह गौरतलब है कि इंटरनेट पर आज भी हजारों लाखों किताबें (इनमें वल्र्ड क्लासिक भी हैं) उपलब्ध हैं। आप चाल्र्स डिकेंस, एच जी वेल्स, जेन आस्टिन, शेक्सपीयर, मार्क ट्वेन, लियो तोलस्ताय, एमिल जोला, एडगर एलन पो, आस्कर वाइल्ड, मोपासां जैसे तमाम रचनाकारों की कृतियों को सुन सकते हैं। इनके साथ ही बच्चों का साहित्य तो ऑडियो में बेपनाह है। वह भी बिना पैसा दिये।

तो सवाल यह उठता है कि आखिर ऑडियो बुक्स का अर्थशास्त्र क्या होगा? क्या वे पाठकों को मुफ्त में उपलब्ध कराई जाएंगी? क्या पाठकों को उसके लिए कोई कीमत देनी होगी? ये सारे सवाल अभी जवाबों के इंतजार में हैं। लेकिन इतना तय है कि प्रकाशक अब ऑडियो के बड़े और संभावित बाजार की तरफ रुख कर रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि कहानियां कविताएं ऑडियो में उपलब्ध नहीं हैं। यूट्यूब पर कई लोग ऐसे चैनल चला रहे हैं जो कहानियां या कविताएं सुनवाते हैं।

कुछ लेखक या उत्साही युवा अपनी रचनाओं को ऑडियो में रिकार्ड करके सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं। कुमार विश्वास यूट्यूब पर कविताओं का एक चैनल चला रहे हैं, अनिमेष जोशी यूट्यूब पर 'सुनो कहानी', मनीष गुप्ता क से कविता, कार्यक्रम चला रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इन कार्यक्रमों को लोग सुनते या पसंद नहीं करते। लेकिन इनकी संख्या उत्साह बढ़ाने वाली नहीं है। अनिमेष जोशी कहते हैं, 'ऑडियो बाजार में बहुत ज्यादा संभावनाएं मैं भी नहीं देख रहा हूं। लेकिन मुझे लगता है कि इस माध्यम का इस्तेमाल हम युवाओं में साहित्य की रुचि पैदा करने में कर सकते हैं। मेरा मानना है कि सिर्फ चैनल चलाने से कुछ नहीं होगा। इसके लिए आपको लगातार युवाओं से संपर्क करना होगा, संवाद करना होगा यानी एक समूह ऐसा तैयार करना होगा जो कहानियों-कविताओं में रुचि रखता हो।'

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इस माध्यम की एक और दिक्कत है। इसमें वही कहानियां या कविताएं होती हैं, जिनमें आपको ठहरकर सोचना न हो। कहानी शुरू हो और अपने पूरे वेग के साथ समाप्त हो जाए। समय की सीमाएं भी इस माध्यम की सीमाएं हैं यानी कोई बहुत लंबी कहानी बेहद अच्छी होने के बावजूद इस माध्यम में नहीं आ सकती। परिवेश की कहानियां, बेहद गंभीर कहानियों के लिए भी संभावनाएं कम हैं। इनमें घटनाप्रधान, रूमानी या जासूसी कहानियों की ज्यादा संभावनाएं दिखाई पड़ती है। ऑडियो माध्यम के पक्ष में एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि आप सफर में इन्हें आराम से सुन सकते हैं। लेकिन जब आप सफर में होते हैं तो कहानियां सुनने के लिए नहीं होते। आप गाड़ी से जाते हुए अपने आसपास देखना चाहते हैं, महसूस करना चाहते हैं और अगर कोई बहुत ही जुनूनी साहित्य प्रेमी भी है तो वह अपने पास पढऩे की किताब रखेगा। फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ऑडियो का बहुत बड़ा बाजार है। 

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हिंदी के प्रकाशक जो काम पिछले सात दशकों में नहीं कर पाये, अब वह काम उन्हें ऑडियो माध्यम के जरिये करना होगा। लेकिन हमने-कम से हिंदी वालों ने आजादी के बाद से पाठकों का एक ऐसा वर्ग तैयार नहीं किया है जो किताबें खरीद कर पढऩा चाहता हो, न ही पढऩे के हमने कोई संस्कार विकसित किये हैं। बहुत कम परिवार आपको ऐसे मिलेंगे जिनके घरों में टेक्स्ट बुक्स के अलावा साहित्यिक किताबें हों।

सोच और देखकर आश्चर्य होता है कि आज भी दिल्ली जैसे शहर में लोग अखबार तक मांग कर पढऩा पसंद करते हैं। वे अखबार पढऩा तो चाहते हैं, लेकिन उसके लिए पैसे खर्च नहीं करना चाहते। ऐसे में वे साहित्यिक ऑडियो बुक्स के लिए पैसे देंगे, इसमें संदेह लगता है। हां, अगर प्रकाशक और विक्रेता के पास इससे इतर कोई गणित है तो शायद ऑडियो बुक्स के बड़े बाजार को कैप्चर किया जा सके। लेकिन सवाल फिर वही उठता है कि साहित्य को पढऩे या सुनने के संस्कार हम कहां से लायेंगे?

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