सुप्रीम कोर्ट को भी आसान नहीं... सबरीमाला मंदिर प्रवेश विवाद पर फैसला

जागरूक टाइम्स 109 Jul 30, 2018

सबरीमाला मंदिर, केरल की प्रबंधक समिति दस से पचास वर्ष की महिला को मंदिर में प्रवेश नहीं करने देती। उसे लगता है कि मासिक रक्त अपवित्र होता है और इसलिए रजस्वला स्त्री अशुद्ध। चिनार दरख्तों से घिरी हजरतबल दरगाह मस्जिद में आप अपनी पत्नी, बेटी, बहन, माँ, महिला मित्र या रिश्तेदार के साथ प्रवेश नहीं कर सकते क्योंकि यहां महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध है। महिलाओं को मंदिर में पुजारी या मस्जिद में इमाम बनने की भी अनुमति नहीं है। रुकिए यह स्थिति केवल हिंदुओं व मुस्लिमों तक ही सीमित नहीं है, ईसाइयों के गिरजाघर, सिखों के गुरुद्वारे, जैनों के मंदिर व बौद्धों के स्तूप भी महिलाओं के लिए खुले अवश्य हैं। महिलाएं यहां नन, सेविकाएं साधिकाएं भिक्षुणी आदि बनकर सेवा के लिए अपना पूरा जीवन भी अर्पित कर देती हैं, लेकिन यहां भी पादरी या पुजारी बनने की उन्हें इजाजत नहीं है। बहरहाल इस समय सबरीमाला का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

पिछले काफी समय से न्यायिक सक्रियता के चलते सुप्रीम कोर्ट मानवाधिकारों, विशेषकर महिला अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण निर्णय व निर्देश देता आ रहा है। जैसा कि तीन तलाक, मोब लिंचइंग आदि के स्वागतयोग्य फैसलों से स्पष्ट है, जिनसे जनता का लोकतंत्र व धर्मनिरपेक्षता में विश्वास बढ़ा है। अब सबरीमाला से संबंधित जनहित याचिकाओं के रूप में उसके पास सुनहरा अवसर है। इसलिए उम्मीद की जाती है कि इसकी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट महिलाओं के धार्मिक अधिकारों को मद्देनजर रखते हुए न सिर्फ सभी धर्मों के धर्मस्थलों के द्वार गर्भगृह आदि खोल देगा बल्कि महिलाओं पर जो पुजारी, पादरी, इमाम आदि बनने पर धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों ने अघोषित प्रतिबंध लगाया हुआ है, उसे भी असंवैधानिक घोषित कर देगा। कम से कम प्रत्येक समतावादी, लोकतांत्रिक व्यक्ति तो यही आशा बांधे हुए है। सुप्रीम कोर्ट से धर्मनिरपेक्ष निर्णय की उम्मीद करना गलत नहीं है। ऐसा अकारण नहीं।

सबरीमाला की परंपरा कि निश्चित आयु अवधि की महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं, की संविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली पांच सदस्यों की खंडपीठ ने कहा था कि कोई धर्मस्थल उस व्यक्ति का प्रवेश वर्जित नहीं कर सकता जो आस्था रखता है और संबंधित देवी-देवता के प्रति भक्तिपूर्वक समर्पित है। यह धर्मनिरपेक्ष अवलोकन स्पष्ट आदेश में परिवर्तित होना चाहिए कि बराबरी या समता का जो मौलिक अधिकार है वह लिंग, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता। यह हमेशा धर्म व उसकी परंपराओं के पालन पर हावी रहेगा। दूसरे व स्पष्ट शब्दों में, धर्म या उसकी शिक्षाएं चाहे जो कहती हों, लेकिन उनके आधार पर समता संबंधी अधिकारों का किसी भी सूरत में उल्लंघन नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक रूपी कुप्रथा पर विराम लगाने के लिए इसी सिद्धांत का प्रयोग किया था।

अब सभी धर्मों के धर्मस्थलों के पट महिलाओं के लिए खोलने हेतु भी इसी का ही इस्तेमाल किया जाए। ऐसे धर्मनिरपेक्ष निर्णय का एक प्रमुख लाभ यह होगा कि महिलाओं को जो कभी शनि मंदिर तो कभी हाजी अली में प्रवेश करने के लिए आंदोलन व कानूनी लड़ाई लडऩी पड़ती हैं, वह उससे बच जाएंगी और अदालतों की भी ऊर्जा व समय बचेगा। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है कि सबरीमाला या अन्य मुद्दों को पूर्णत: संविधान व सिद्धांतों के दृष्टिकोण से ही देखा जाए। लगभग 70 साल पहले सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीश उस समय सुप्रीम कोर्ट में कुल सात ही न्यायाधीश थे। शिरूर मठ ;1954 एआईआर 282 मामले में साथ बैठे थे एक धार्मिक मुद्दे पर निर्णय देने के लिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश एमसी महाजन, न्यायाधीश बीके मुखर्जी, न्यायाधीश एसआर दास, न्यायाधीश विवियन बोस, न्यायाधीश गुलाम हसन, न्यायाधीश एनएच भगवती और न्यायाधीश टीएलवी अय्यर की खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला दिया।

धर्म केवल नैतिकता के नियम ही नहीं देता है कि उसके अनुयायी उनका पालन करें, वह कुछ रीतिरिवाज, कर्मकांड, परम्पराएं व पूजा के तरीके भी बयान कर सकता है जो धर्म का अटूट हिस्सा समझे जाते हैं और इनका विस्तार फूड व ड्रेस के मामलों तक भी हो सकता है। इस निर्णय में एक सुनहरा नियम स्थापित किया गया, धर्म का आवश्यक हिस्सा क्या है। यह बुनियादी तौरपर संबंधित धर्म के सिद्धांतों के संदर्भ में ही सुनिश्चित किया जा सकता है। अब इस नियम का प्रयोग अयोध्या विवाद में वरिष्ठ वकील राजीव धवन कर रहे हैं। साल 1994 के इस्माइल फारूकी निर्णय पर सवाल उठाने के लिए जिसमें कहा गया था कि मस्जिद नमाज अदा करने के लिए जरूरी नहीं है। सात न्यायाधीशों की खंडपीठ ने कहा था, अगर हिंदुओं के किसी धार्मिक संप्रदाय के नियम यह कहते हैं कि मूर्ति को भोग दिन के किसी खास समय पर लगाया जाए कि निश्चित अवधि पर किए जाने वाले कर्मकांड एक खास अंदाज में वर्ष के खास समय में किए जाए या पवित्र ग्रंथों का दैनिक पाठ हो या पवित्र अग्नि में आहुति दी जाए तो इन सबको धर्म का हिस्सा माना जाएगा और यह तथ्य कि इनमें पैसा खर्च होता है या पुजारी व नौकरों को रोजगार देना पड़ता है या इनमें बाजार की चीजों का प्रयोग होता है, तो यह अपने कमर्शियल या आर्थिक चरित्र से धर्मनिरपेक्ष गतिविधियां नहीं हो जाएंगी।

यह सब धार्मिक प्रथाएं हैं और इन्हें अनुच्छेद 26;बी के तहत धार्मिक मामला ही माना जाना चाहिए। 1954 का यह निर्णय सबरीमाला परंपरा का कितना समर्थन करता है, यह तो सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों की खंडपीठ ही तय करेगी। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि पिछले निर्णयों को आज की स्थितियों को देखते हुए बदला नहीं जा सकता। दरअसल एक जटिल मुद्दे पर संपूर्ण धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाना कठिन भी है और साहसिक भी। अगर कल को कोई सुप्रीम कोर्ट में यह जनहित याचिका दायर कर दे कि हिंदू पूजा पाठ में देवियों को बराबरी का स्थान दिया जाए तो क्या यह मूर्तियों की पूजा में लिंग समता के अधिकार का उल्लंघन है। इसलिए लगता है कि सुप्रीम कोर्ट अपने को सबरीमाला तक ही सीमित रखेगा, जबकि जरूरत सभी धर्मस्थलों के पट महिलाओं के लिए खोलने की है।


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