समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

जागरूक टाइम्स 205 Sep 8, 2018

कुछ माह पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेसी से संबंधित ऐतिहासिक निर्णय दिया था तो समझदार लोगों को पर्याप्त संकेत मिल गए थे कि अब सहमति समलैंगिकता के अपराध बने रहने की मियाद कम है। बीती 6 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक खंडपीठ ने अपने 493 पृष्ठ के स्वागतयोग्य निर्णय के जरिये हमेशा के लिए औपचारिक रूप से स्पष्ट कर दिया कि समलैंगिक समुदाय जिसे इन दिनों सतरंगी समुदाय कहने का भी सिलसिला चल निकला है, का यौन झुकाव या यौन प्राथमिकताएं अपराध नहीं हैं।

लेकिन नवतेज जौहर बनाम भारतीय संघ मामले में दिया गया यह ऐतिहासिक फैसला केवल समलैंगिक अधिकारों तक सीमित नहीं है। इस फैसले में भारत में समता के इर्दगिर्द घूमने वाले विधिशास्त्र को बुनियादी तौरपर पुन: परिभाषित करने की क्षमता है। जहां यह निर्णय स्वायत्तता की पुष्टि करने और मनमाने कानूनों को पीछे धकेलने के लिए महत्वपूर्ण है, वहीं इसमें कानूनों की समान सुरक्षा की धारणा को नया अर्थ देने की क्षमता है।

जिससे न सिर्फ सतरंगी समुदाय को सुरक्षा मिलती है बल्कि 'अल्पसंख्यकों के देश' में व्यवहारिक तौरपर प्रत्येक अल्पसंख्यक को सुरक्षा की गारंटी मिलती है। साल 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को नाज फाउंडेशन बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली मामले में रद्द कर दिया था। इसके मुताबिक भारत के समलैंगिक नागरिकों को अपने यौन झुकावों को मुखर करना प्रतिबंधित था। लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट के प्रगतिशील व ऐतिहासिक निर्णय को 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन मामले में उलट दिया और फिर पुरानी स्थिति बहाल हो गई- वयस्कों के बीच सहमति समलैंगिकता अपराध बन गई।

कौशल मामले में सुप्रीम कोर्ट से निश्चित रूप से अनेक चूकें हुई थीं (जिसको उलटते हुए उसने अपने नवीनतम निर्णय में खेद भी व्यक्त किया है), उन सबका उल्लेख यहां आवश्यक नहीं है, लेकिन दो न्यायाधीशों की खंडपीठ से अपने निर्णय में जो सबसे बड़ी चूक हुई थी, वह थी 'अति सूक्ष्म अल्पसंख्यकों के तथाकथित अधिकारों' शब्दों का प्रयोग। इन शब्दों का सीधा सा अर्थ यह है कि अगर आप अल्पसंख्या में हैं तो आपके कोई अधिकार नहीं हैं, बहुसंख्या का मत ही सही मत है।

संभव है कि यह शब्द पूर्णत: सतरंगी समुदाय के संदर्भ में ही बोले गए हों, लेकिन इनसे दो बातें एकदम स्पष्ट हो रही थीं- एक, देश का टॉप कोर्ट समाज में आ रहे परिवर्तनों व विविधता के लिए अधिक सहिष्णुता की आवश्यकता के प्रति अनजान था। दूसरा यह कि इन शब्दों का प्रयोग अगर स्थितियां अनुमति दें तो किसी भी कारण से किसी भी अल्पसंख्यक के खिलाफ किया जा सकता था।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अपने नवीनतम निर्णय में व्यक्तिगत अधिकारों पर बल दिया है, जिससे संवैधानिक महत्वकांक्षाओं और जमीनी सच्चाइयों में जो फासला है उसके कम होने की उम्मीद बनती है। आखिरकार, वर्तमान भारतीय राजनीति का झुकाव धर्म व जाति की तरफ है या दूसरे शब्दों में जिसके पास अधिक संख्या है उसकी मनमर्जी चलेगी, ऐसी ही स्थिति में लोकतंत्र व संवैधानिक मूल्यों के प्रति समर्पित न्यायपालिका परेशान नागरिकों का अंतिम शरणस्थल बन जाती है।

याद कीजिये किस तरह हादिया को उसके पति से मिलाकर या फिल्म 'पद्मावत' पर लगे प्रतिबंधों को रद्द करके, सुप्रीम कोर्ट ने बहुसंख्यक तानाशाही को नियंत्रित किया। बहुसंख्यकवाद के चलते ही विभिन्न सरकारें धारा 377 में आवश्यक संशोधन करने से बचती रहीं, हालांकि इस संदर्भ में संसद में निजी विधेयक भी लाए गए थे। जब तक सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेसी को मौलिक अधिकार घोषित नहीं किया था, तब तक सरकार इसका यह कहकर विरोध करती रही कि प्राइवेसी अमूर्त विचार है। अब यही प्राइवेसी निर्णय हमारे जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालने लगा है, जैसा कि 377 के रद्द किए जाने से स्पष्ट है (और आशा है कि आधार व व्यभिचार मामलों में भी यही होगा, जिनके बारे में निर्णय जल्द आने वाले हैं)।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने में जो काम सुप्रीम कोर्ट करता है, उसकी रोशनी निचली अदालतों में भी चमकनी चाहिए। व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा, भले ही आप उस व्यक्ति से सहमत न हों, सही मायनों में लोकतंत्र है। लोकतंत्र ही असहमति व विविधता को जीवित रखता है। यह निर्णय सामाजिक नैतिकता पर संवैधानिक नैतिकता को वरीयता अवश्य प्रदान करता है, लेकिन सतरंगी समुदाय ने अपने अधिकारों के लिए जो संघर्ष छेड़ा हुआ है, वह अभी पूर्ण नहीं हुआ है। समलैंगिकों को अभी विवाह, बच्चे गोद लेने, विरासत आदि के अधिकार नहीं मिले हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट ने जो इस समुदाय को कानूनी अधिकार दिया है, उसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि समलैंगिक रुझान के सामाजिक विरोध पर भी विराम लग गया है। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आते ही भाजपा के सांसद सुब्रह्मणियम स्वामी ने इसकी कड़े शब्दों में निंदा व आलोचना करते हुए कहा कि यह 'जेनेटिक खामी' है जैसे किसी के छह उंगलियों का होना। विश्व हिंदू परिषद ने समलैंगिकता को 'आयातित रोग' बताया, जबकि आरएसएस ने समलैंगिकता को 'असामान्य' बताते हुए इसे सामाजिक व मनोवैज्ञानिक स्तर पर संबोधित करने पर बल दिया।

हिंदू महासभा का मानना है कि समलैंगिकता को वैध घोषित करना, भारतीय मूल्यों व संस्कृति को नष्ट करने की घिनौनी साजिश है। दारुल उलूम देवबंद के मुल्ला समलैंगिकता को इस्लाम व शरिअत के विरुद्ध मानते हैं, उनके अनुसार यह प्रकृति के खिलाफ है और कोई समझदार व्यक्ति इस प्रकार के संबंधों को स्वीकार नहीं करेगा।

धार्मिक व कट्टरपंथी संस्थाएं हमेशा से ही प्रगतिशील प्रयासों का विरोध करती आई हैं, इसलिए इनकी आलोचना में कोई नई बात नहीं है, लेकिन देश में जो वर्तमान माहौल है, उसमें इन संस्थाओं का भय बहुत अधिक है। इसलिए पंजाब विश्वविद्यालय में पहले ट्रांसजेंडर छात्र धनंजय चौहान, जो मूलत: पौड़ी गढ़वाल जिले के देवप्रयाग से हैं, का कहना है, 'कानून चाहे जो कहे, कट्टरपंथी तत्व हमें परेशान करना जारी रखेंगे। यह युद्ध अभी बहुत लंबा है। जो लोग अपने को धर्म का ठेकेदार समझते हैं, वह हमारी आवाजों को दबाना जारी रखेंगे। उन्हें हमारे अधिकारों की चिंता नहीं है। निकट भविष्य में भयंकर हमले से लेकर हत्या तक, हमारे साथ कुछ भी हो सकता है।' बहरहाल, मुक्त समाज व्यक्तिगत पहचान व अधिकारों की सुरक्षा से ही संभव है, जिसके लिए निश्चितरूप से लम्बा संघर्ष करना पड़ता है, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय तो इस दिशा में मात्र पहला कदम है।


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