तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, प्रक्रिया के दौरान दूसरा विवाह वैध

जागरूक टाइम्स 240 Aug 27, 2018

सुशील कुमार (बदला हुआ नाम) की पहली पत्नी से तलाक के विरुद्ध याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित थी कि उसी दौरान उन्होंने दूसरा विवाह कर लिया। फलस्वरूप उन्होंने अपनी पहली पत्नी से विवाद का निपटारा किया और तलाक को स्वीकार करने की अर्जी देते हुए अपनी अपील याचिका को वापस लेने का भी आग्रह किया। सुशील कुमार ने दूसरा विवाह उस समय किया था जब हाईकोर्ट ने उनकी अपील वापस लेने की अर्जी को अनुमति देने के संदर्भ में औपचारिक आदेश पारित नहीं किया था।

दूसरे व स्पष्ट शब्दों में इसका अर्थ यह है कि सुशील कुमार ने दूसरा विवाह उस समय किया था जब उनकी पहली पत्नी से तलाक प्रक्रिया कानूनन पूर्ण नहीं हुई थी। हिंदू विवाह अधिनियम के तहत जब तक तलाक की डिक्री न मिल जाए या इस संदर्भ में कोई लंबित अपील पर अदालत का अंतिम निर्णय न आ जाए तब तक दूसरा विवाह नहीं किया जा सकता।

लेकिन हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 15 की महत्वपूर्ण व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एसए बोबडे और न्यायाधीश एल नागेश्वर की खंडपीठ ने कहा है कि वह अवधि जब विवाह की कानूनन अनुमति नहीं होती- तलाक के विरुद्ध अपील के लंबन के दौरान- का अर्थ यह नहीं है कि विघटित (डिजोलव्ड) विवाह जारी रहता है और इस अंतराल में किया गया विवाह वैध नहीं होगा क्योंकि वह 'वैधानिक अक्षमता' के तहत किया गया है।

गौरतलब है कि धारा 15 के तहत जब तलाक की डिक्री के जरिये विवाह विघटित हो गया हो और निर्णय के विरुद्ध अपील का अधिकार न हो या अपील का रास्ता होते हुए भी अपील करने का समय निकल गया हो या अपील करने पर उसे रद्द कर दिया गया हो, तो दूसरे विवाह की कानूनन अनुमति है। इसी अधिनियम की धारा 5(1) में आगे कहा गया है कि दो हिंदुओं के बीच विवाह संभव है अगर विवाह के समय किसी भी पार्टी का जीवनसाथी जीवित नहीं है।

बहरहाल, सुशील कुमार को दूसरे विवाह में भी शांति नहीं मिली यानी दूसरी पत्नी से भी मनमुटाव रहने लगा। फलस्वरूप दूसरी पत्नी ने अपने विवाह की वैधता को अदालत में यह कहते हुए चुनौती दी कि हाईकोर्ट में पहली पत्नी से तलाक का मुकदमा चलते हुए यह विवाह हुआ था, इसलिए यह वैध नहीं हो सकता। परिवार न्यायालय ने दूसरी पत्नी की याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन हाईकोर्ट ने उसका पक्ष लिया और विवाह को अवैध घोषित कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर तलाक की डिक्री के खिलाफ अपील लंबित हो और उस दौरान दूसरा विवाह कर लिया जाए तो यह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 15 व 5(1) का उल्लंघन होगा।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। दोनों पार्टियों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि धारा 15 के उल्लंघन से विवाह अवैध नहीं हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'अगर कानून का प्रावधान विवाह के लिए वैधानिक अक्षमता घोषित करता है और इसके बावजूद व्यक्ति वैधानिक अक्षमता के तहत विवाह कर लेता है तो यह विवाह विधिविरुद्धता घोषित करने वाले स्पष्ट प्रावधान की अनुपस्थिति में अवैध नहीं होगा।'

खंडपीठ ने कहा, 'हिंदू विवाह अधिनियम समाज कल्याण कानून है और लाभकारी कानून है और इसकी व्याख्या इस प्रकार की जाएगी ताकि कानून के उद्देश्य को आगे बढ़ाया जा सके। इस अधिनियम का उद्देश्य समाज सुधार लाना है। यह सर्वविदित है कि यह अदालत समाज के लिए लाभकारी कानून की व्याख्या इस आधार पर नहीं कर सकती कि जैसे इसके शब्द पत्थर से तराश दिए गए हों।' अपने 1978 के निर्णय का संदर्भ देते हुए सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा, 'एक बार जब तलाक की डिक्री पूर्ण हो जाती है तो विवाह विघटित हो जाता है, बशर्ते कि अपील न हो। इस अदालत ने भी निर्णय लिया था कि निश्चित अवधि तक दूसरे विवाह के लिए वैधानिक अक्षमता का प्रभाव यह नहीं होता है कि पूर्व विवाह को जारी समझा जाए और यह कि शब्द 'जीवनसाथी' (स्पाउस) के अर्थ में पूर्व जीवनसाथी शामिल नहीं है।' सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा, 'कानून जहां भी किसी चीज को प्रतिबंधित करता है और इस बात को अनदेखा कर देता है कि उसे गैर-कानूनी बनाने के परिणाम क्या होंगे, तो यह कहना वैध न होगा कि जब भी वह चीज की जाती है तो वह अवैध है क्योंकि इसका अर्थ तो यह हो जाएगा कि हर गैर-कानूनी चीज अवैध है।'

सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि विवाह को अवैध मानने के परिणाम इतने गंभीर व दूरगामी होंगे कि मासूमों को प्रभावित करेंगे जैसे बच्चे जो उस अवधि में पैदा हुए हों जब पहले विवाह की तलाक की डिक्री न मिली हो। इसलिए तलाक प्रक्रिया के दौरान किए गए अन्य विवाह को अवैध नहीं माना जा सकता जब तक कि ऐसा कोई कानून न हो या जिस विवाह का संज्ञान लिया जा रहा है उसका निष्कर्ष अनिवार्य रूप से अवैध हो। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि कानून, विशेषकर पारिवारिक कानूनों, का उद्देश्य समाज को बेहतर बनाने या सुधारने का होता है, इसलिए उसकी व्याख्या पत्थर की लकीर की तरह नहीं की जा सकती।

निचली अदालत से तलाक की डिक्री प्राप्त करने के बाद भी उच्च अदालतों में उसके खिलाफ वर्षों तक अपील जारी रहती हैं, तो इस अवधि में व्यक्ति को अगर दूसरे विवाह की अनुमति नहीं होगी तो वह वैवाहिक सुख से वंचित रहेगा/रहेगी। इस दृष्टि से देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट की ताजा व्याख्या स्वागतयोग्य है। लेकिन यह सिक्के का एक ही पहलू है। अगर स्थिति यह हो कि व्यक्ति ने तलाक प्रक्रिया के दौरान दूसरा विवाह कर लिया है और उसकी तलाक की डिक्री से संबंधित अपील खारिज हो जाती है, तब क्या कानून दो पति या दो पत्नी की स्थिति को स्वीकार करेगा? इसलिए इस संदर्भ में कानून की अतिरिक्त स्पष्टता (या संशोधन) की आवश्यकता है।


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