स्वतंत्रता दिवस पर विशेष : मारवाड़ के 'मालाणी क्षेत्र' की कुर्बानियां

जागरूक टाइम्स 124 Aug 14, 2018

देश की स्वतंत्रता से पूर्व एवं पश्चात् अन्य क्षेत्रों की ही तरह तत्कालीन मारवाड़ राज्य भी कुर्बानियों का क्षेत्र रहा। थार मरूस्थल की कठिन परिस्थितियों एवं भीषण अभावग्रस्तता के बावजूद साहसी मारवाडिय़ों द्वारा राष्ट्र की रक्षार्थ दिए गए बलिदानों का इतिहास अनूठा है। अंग्रेजी सत्ता की देश में स्थापना के पश्चात् मारवाड़ क्षेत्र भी उसकी चपेट में आया तथा मालानी क्षेत्र में भयानक अराजकता का माहौल रहा। संपूर्ण देश में महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन का शंखनाद हुआ। 

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इसका प्रभाव मालानी क्षेत्र पर भी पड़ा। मालानी के देश भक्त स्वतंत्रता सेनानी बाबू हीरालाल शर्मा, पुरखाराम, देरावरसिंह, शंकरलाल सोनी, परमानंद खत्री, खुशालसिंह, सहित अनेक राष्ट्र भक्त स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। ये स्वतंत्रता सेनानी एवं उनके परिवार अंग्रेजों एवं स्थानीय जागीदारों के जुल्मों के शिकार हुए व जेलों में ठूंस दिए गए। अंततोगत्वा देश आजाद हुआ लेकिन देश के विभाजन तथा मारवाड़ राज्य के पाकिस्तान में विलय की आशंका एवं सुगबुगाहट से ''मालानी क्षेत्र" के लोगों की धड़कने तेज थीं। मालानी क्षेत्र में बसे हिंदू-मुस्लिम परिवारों की मनोदशा कल्पनाओं एवं कशमकश से स्थिति काफी तनाव पूर्ण थी।

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मालानी क्षेत्र के बाशिंदों का ज्यादातर संपर्क सिंध एवं कराची से था जबकि ये लोग जोधपुर एवं अन्य शहरों से ज्यादा वाकिफ नहीं थे। ''जिन्ना" की जिद से देश के बंटवारे के तनाव पूर्ण माहौल में सिंध, कराची एवं मालानी क्षेत्र के लोगों को अपनी अपनी संपत्तियों को छोड़ भीषण मारकाट, बलवों, उपद्रवों के बीच अपनी जान हथेली पर ले कर इधर-उधर भागना पड़ा। विभाजन की इन परिस्थितियों का असामाजिक तत्वों ने भी जम कर निंदनीय लाभ उठाया।

हैद्राबाद (सिंध) से खोखरापार-बाड़मेर हो कर जोधपुर आने वाली रेलगाडिय़ां निर्दोष स्त्री पुरुषों एवं बच्चों की कटी रक्तरंजित लाशों से अटी पड़ी रहती थीं। सिंध के कई लोग कराची बंदरगाह से स्टीमर द्वारा गुजरात, मारवाड़ जक्ंशन, लूनी होते हुए रेलगाडिय़ों से भूखे प्यासे, लुटे पिटे मालानी आए। सिलसिला कई दिनों तक जारी रहा। देश के विभाजन के तत्पश्चात् भी यह क्षेत्र भारत-पाक के वर्ष 1965 एवं 1971 के युद्धों में अंतर्राष्ट्रीय चर्चा का विषय रहा। राष्ट्र के विभाजन के पश्चात् मालानी क्षेत्र (बाड़मेर) अंतर्राष्ट्रीय सीमावर्ती क्षेत्र बन गया एवं क्षेत्र का एकाएक सामरिक महत्व बढ़ गया था। 

वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध में पाक का ध्यान पंजाब एवं कश्मीर से विभाजित करने के लिए भारत ने सिंध सीमा का मोर्चा खोला। जबकि इससे पूर्व ही पाक ने कच्छ के नगरयार क्षेत्र में अपना हस्तक्षेप एवं दावा प्रस्तुत कर दिया था। इस वजह से युद्ध से पूर्व ही संपूर्ण मालानी क्षेत्र उग्र सैन्य गतिविधियों का केंद्र बन गया। भारत सरकार ने सेना को बाड़मेर क्षेत्र से पाक की ओर कूच करने तथा मालानी क्षेत्र में घुसी पाक सेना को खदेडऩे का आदेश दिया। हर दृष्टिकोण से पिछड़ा यह मरूस्थलीय क्षेत्र भारतीय सेना के लिए नया एवं अत्यंत दुष्कर था। लेकिन भारतीय रणबांकुरों ने 8 सितंबर, 1965 को पाक के ''गडरा सिटी" में प्रवेश कर वहां तिरंगा फहरा दिया। इस कार्य को अंजाम देने के लिए कई कुर्बानियां भी हुई। 

इससे बौखला कर पाक बमवर्षक विमानों ने सर्वाधिक बम ''गडरा रोड"(अंतिम भारतीय रेल्वे स्टेशन) एवं आस पास की भारतीय चौकियों पर गिराए। गडरा रोड की भारतीय रेल लाईन एवं एक सीमा चौकी ''पांचल" बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई थी। रेल लाईन के क्षतिग्रस्त हो जाने से अग्रिम मोर्चा से डटी भारतीय सेना की सैन्य एवं रसद सामग्री की आपूर्ति ठप्प हो गई। तब रेल्वे के कर्मचारियों ने पाक हवाई हमलों के बीच अपनी जान पर खेलकर दो किमी लंबी पाक बमबारी से क्षतिग्रस्त रेल लाईन (सैनिकों की जीवन रेखा) को दुरूस्त किया। कार्य समाप्ति पश्चात् वापस लौर रहे इन रेल कार्मिकों की विशेष रेल पर 9 सितंबर, 1965 को पाक बमवर्षकों ने हवाई हमला किया जिसमें 14 बहादुर रेल्वे कर्मियों ने अपनी कुर्बानी दी।

इनमें सर्वश्री मुलतानाराम, भंवरिया, करणा, नंदराम, हेमाराम, माला, मघा, हुम्मा, रावता, चीमा, खीमराज, लाला, जेहा, तथा देवसिंह वीर शामिल थे। इसी दरम्यान एक पाक घुसपैठिए के षडयंत्र से भारत-पाक सीमा की ओर जा रहे एक रेल इंजन के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर उनके चाकल दल सर्वश्री चुन्नी लाल, चिमन सिंह एवं माधो सिंह भी शहीद हुए। पाक बमवर्षकों ने 12 सितंबर, 1965 को ''पांचला" चौकी पर पुन: भीषण बमबारी की। शहीद वीरों की स्मृति में सीमा सुरक्षा बल की 16 वीं बटालियन ने 9 मई, 1968 को ''पांचला" गांव में एक स्मारक भी बनवाया जो कि इन शूरवीरों की शौर्य गाथा का साक्षी है। इस युद्ध में भारतीय फौज ने मरूस्थल में दो मील की डग रोड बना कर आगे बढ़ते पाक के 150 वर्ग किमी. क्षेत्रफल के 30 गांवों पर कब्जा किया। इस कार्य के लिए सेना के जांबाज मेजर देश पांडे, सफी मोहम्मद, खंगारसिंह, जूझाराम, अर्जुनसिंह, रिडमल ने अनुपम शौर्य का प्रदर्शन किया। इस युद्ध में मालानी क्षेत्र के वीर सैनिक मोतीपुरी, धनसिंह एवं बालाराम ने अपने प्राणों की आहूति राष्ट्र के लिए दी। ताशकंद समझौते के बाद यह युद्ध 21 सितंबर, 1965 को समाप्त हुआ। 


कुछ वर्षों की शांति के बाद भारत-पाक के मध्य तनाव पुन: बढ़ा और मालानी क्षेत्र में 3 दिसंबर, 1971 को युद्ध पुन: प्रारंभ हुआ। भारतीय सेना ने गडरा रोड विजय द्वार से पाक सीमा में प्रविष्ट हो कर भीषण युद्ध करते पाक स्थित सिंध प्रांत के थारपारकार जिले के कई कस्बों पर अधिकार किया। युद्ध में पाक के पांच युद्धक विमानों को मार गिराए जाने से बौखलाए पाक ने मालानी क्षेत्र में 129 बम गिराए जिनमें 113 बम फटे लेकिन कोई खास क्षति भारत को नहीं हुई। पाक बमवर्षकों ने चौहटन में दो, पचपदरा में 43, महाबार में 13, बच्चु का तला में 17, बाड़मेर रेल्वे माल गोदाम पर तीन, कुडला में दो, बाड़मेर आगोर में दो, सरली में 10, मीठडाखुर्द में दो तथा सीमांत भारतीय चौकियों पर अनेक बम गिराए। पचपदरा के आसपास का क्षेत्र बमों के फटने से थर्रा उठा था। लेकिन सौभाग्य से बमबारी स्थल से कुछ घंटों पूर्व ही सैन्य साजो समान से लदा एक विशाल सैनिक कारवां आगे बढ़ चुका था। बाड़मेर माल गोदाम पर बमबारी से आग लग गई थी लेकिन साहसी नागरिकों एवं रेल कर्मचारियों ने गोला बारूद से लदी मालगाड़ी के डिब्बों को काट कर क्षेत्र से हटा लिया था। इससे बाड़मेर शहर में बड़ी दुर्घटना होते होते टली।

पाक के छाछरो कस्बे पर भारतीय फौज के अधिकार के पश्चात् भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी तत्कालीन सीमान्त आयुक्त ने वहां तिरगंा फहराया। बाडमेर के तत्कालीन जिला कलेक्टर श्री आर. एम. कुमार एवं पुलिस अधीक्षक श्री अमिताभ गुप्ता ने छाछरो कस्बे(पाक) में नागरिक प्रशासन का कार्यभार सम्भाला। सीज फायर के पश्चात् लगभग एक वर्ष तक पाक क्षेत्रों पर भारत का कब्जा रहा तथा ''शिमला समझोते के पश्चात् यह क्षेत्र 31 दिस.,1972 को पाक को लौटाया गया। देश के पश्चिमी सीमा पर अवस्थित मालानी(बाडमेर) क्षेत्र शान्त अवश्य लगता हेै लेकिन कुर्बानियो एवं उथलपुथल से भरा रहा है।
गौरतलब रहे कि देश की स्वतन्त्रता से पूर्व थार मरूस्थलीय क्षेत्र में ''मालानी रियासत"(वर्तमान में पश्चिमी राजस्थान के बाडमेर जिले की खेड नगरी) अस्तित्व में थी । राठौड सरदार आदिपुरूष राव सिहा वंशजो में राव मल्लीनाथ उनके कुल ने वहां राज्य किया तथा उत्तरोतर ''मारवाड राज्य"(जोधपुर) की नींव पडी।

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