अकेले स्वरोजगार से नहीं होगा बेरोजगारी की समस्या का समाधान

जागरूक टाइम्स 238 Sep 19, 2018

उत्तर प्रदेश में चंद दिन पहले चपरासी के कुछ पद के लिये लाखों शिक्षित बेरोजगारों के आवेदन आए जिसमें सैकड़ों की संख्या में तो पीएचडी धारक थे। विगत में यहां सफाइकर्मी की नौकरी के लिये भी सैकड़ों पीएचडी धारकों ने आवेदन किया था। अभी रेलवे में अस्सी हजार पद के लिए करीब तीन करोड़ उम्मीदवारों के आवेदन आये हैं। यह परिघटना इस बात को दर्शाती है कि भारत में बेरोजगारी खासकर शिक्षित बेरोजगारी की समस्या कितनी विकराल है।

बेरोजगारी हमेशा से महंगाई और भ्रष्टाचार के साथ देश की उन मौलिक समस्याओं में शामिल रही है जिसको लेकर समय-समय पर देश में व्यापक जनांदोलन होते रहे हैं और करीब हर आम चुनावों का यह मुख्य मुद्दा बनता रहा है। मोदी सरकार के खिलाफ अभी भ्रष्टाचार और महंगाई का मुद्दा उस स्तर तक तो नहीं जा पाया है पर बेरोजगारी को लेकर जनमानस में अब घोर रोष व्यापता जा रहा है। कहा जा रहा है इस सरकार ने देश में रोजगार के अवसरों में पर्याप्त वृद्धि करने को लेकर समुचित प्रयास नहीं किये।

नवीनतम आर्थिक आंकड़े भी इस बात की गवाही दे रहे हैं कि देश में या तो रोजगार वृद्धि की दर स्थिर है या नकारात्मक है। पहले विमुद्रीकरण और उसके बाद जीएसटी ने अर्थव्यवस्था में एक ऐसी ठहराव की स्थिति ला दी है, जिससे हमारी विकास दर के साथ स्वाभाविक रूप से होने वाली रोजगार बढ़ोत्तरी बुरी तरह प्रभावित हुई है।

हम सबको मालूम है कि किसी अर्थव्यवस्था की चलायमान अवस्था वहां रोजगार अवसरों को स्वमेव तरीके से पैदा करती है, जिसके लिए सरकारों के किसी विशेष प्रयास की जरूरत नहीं पड़ती। मगर सवाल है कि यदि ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो गयी है तो सरकार कम से कम अपने सभी विभागों व उपक्रमों में रिक्त पड़े तमाम पदों को क्यों नहीं भर रही हैं? अनुमान है कि केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों में लाखों पद रिक्त पड़े हैं।

इस वजह से उनकी अनेक योजनाओं के समन्वित क्रियान्यवन का काम भी बाधित हो रहा है। अभी हकीकत ये है सरकारें चाहे केंद्र की हों या तमाम राज्यों की, सबका मूल मकसद लोगों को स्थायी नौकरी देने से परहेज करना है। दरअसल भारत में सरकारी नौकरी को लेकर यह सोच है कि एक बार पा जाओ और फिर आजीवन सुरक्षित हो जाओ। श्रम संघ कानून के तहत सरकारों को जीवन पर्यंत उसका वित्तीय भार ढोना पड़ता है।

यही वजह है कि सरकारें अब अपनी जरूरत और रिक्तियों के बावजूद पक्की नौकरी देने से गुरेज करती हैं। इसके लिए वे कभी भर्ती स्थगित करती हैं तो कभी नियुक्ति की प्रक्रिया में टालमटोल करती हैं। मोदी सरकार इन दिनों जब भी बेरोजगारी का सवाल आता है, तो वह अपनी मुद्रा बैंक योजना का राग अलापना शुरु कर देती है। वास्तव में यह योजना उनके लिए बनायी गयी थी, जो अपना छोटा मोटा काम धंधा शुरू करना चाहते हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस योजना के तहत करीब 5 करोड़ लोगों ने अपने विभिन्न तरह के कारोबार के लिए करीब 10 लाख करोड़ रुपये का लोन प्राप्त किया है। यह स्कीम बेशक अच्छी है, पर इसे देश की बेरोजगारी समस्या का एकमात्र निदान मान लेना भारी भूल होगी। हमें इस बात को समझना चाहिए कि हमारे देश में बेरोजगारों की एक नहीं कई श्रेणियां हैं। इनमें अनपढ़, अकुशल दिहाड़ी मजदूरों की, अर्ध शिक्षित और अर्धकुशल कामगारों की, शिक्षित और कुशल कामगारों की और उच्च शिक्षित और पूर्ण कुशल कामगारों की अलग-अलग बेरोजगार श्रेणियां हैं।

इन सभी श्रेणी की बेरोजगारी के समाधान के लिए हमें अलग-अलग नीतियों, परिस्थितियों और योजनाओं की जरूरत है। मिसाल के तौरपर अकुशल अशिक्षित और दिहाड़ी देहाती कामगारों की रोजगार सुरक्षा के लिए यूपीए सरकार ने मनरेगा योजना शुरू की। इसी तरह से मौजूदा सरकार की मुद्रा बैंक योजना अर्ध शिक्षित और अर्ध कुशल कामगारों को अपना कारोबार, उद्यम और सेवा व्यापार के लिए वित्तीय सहूलियत प्रदान करती है।

 अब सवाल है कि इन दोनो श्रेणी के अलावा देश के बाकी श्रेणी के बेरोजगारों का क्या होगा? इन सभी के लिये मोदी सरकार हर बार मुद्रा योजना का हवाला नहीं दे सकती। ठीक है कि देश में तकनीकी रूप से शिक्षित लोगो के स्वरोजगार ले लिए भी स्टार्टअप और डिजिटल योजना मौजूदा सरकार द्वारा लायी गई हैं। परन्तु इस योजना का दायरा देश की विशाल शिक्षित बेरोजगार आबादी की मात्रा के हिसाब से कुछ भी नहीं। हम जानते हैं की डिजिटल इंडिया योजना में रोजगार मिलने की ढ़ेर सारी संभावनाएं छिपी हैं जैसे कि देश में सूचना प्रौद्योगिकी और टेलीकॉम सेवाओं के विस्तार के जरिये रोजगार का आगमन संभव हुआ था।

मगर बेरोजगारी का इससे अभी तात्कालिक समाधान नहीं दिखता। मोदी सरकार का यह रवैय्या कि बेरोजगारी का एकमात्र निदान स्वरोजगार ही है, एक लोकतांत्रिक सरकार के लिये उचित नहीं। यही वजह है कि इस सरकार के मंत्रियों का यह बयान आता है कि नौकरी की भीख मांगने से अच्छा है चाय पकोड़े और पान की दुकान खोल लेना। स्वरोजगार को प्रोत्साहित करना और लोगो में उद्यमशीलता की प्रवृत्ति पनपाना सही है, पर आप सभी श्रेणी के बेरोजगारों को उद्यमी बना दें, यह संभव नहीं।

कौन-कौन बेरोजगार उद्यमी बनेंगे और किस सीमा तक बनेंगे, इनकी भी अपनी सीमाएं हैं, वह भी भारत जैसे देश में जहां लोगों में उद्यमशीलता और जोखिम लेने की प्रवृति बेहद क्षीण है। दूसरी बात यह है कि देश में उद्यमियों की जरूरत के हिसाब से बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में मौजूद नहीं हैं। गौरतलब है कि किसी भी अर्थव्यवस्था में श्रमिक और उद्यमी का अनुपात 90:10 से ज्यादा नहीं हो सकता। अत: सरकारों को चाहिए अर्थव्यवस्था में जितना ज्यादा संभव हो सभी तरह के रोजगार सृजित करने का प्रयास करें।

जहां-जहां कामगारों की जरूरत है, वहां उनकी संविदा पर बहाली करें। यह कार्य सिर्फ केंद्र ही नहीं बल्कि सभी राज्यों तथा स्थानीय सरकारों को एक अभियान के तहत चलाना चाहिए। हां, हर नियुक्ति एवं भर्ती की उत्पादकता की पूरी ऑडिट जरूर होनी चाहिए, नहीं तो वह देश में सफेद हाथी की संस्कृति पैदा करेगा और भविष्य में रोजगार की अतिरिक्त संभावनाओं पर वज्राघात करेगा। विडम्बना ये है कि व्यापक भर्ती वाले ज्यादातर कदम सरकारों द्वारा सिर्फ चुनाव के वक्त शुरू किये जाते हैं जैसे कि रेलवे में अभी भर्तियां की जा रही हैं।

सरकारी नौकरियों के देने के नाम पर लोगों से पैसे ऐंठने वाले गिरोह से सरकार में मौजूद भ्रष्ट तत्वों द्वारा साठगांठ किया जाता है और सरकारी नौकरी मिलने के एवज में लोग लाखों की रिश्वत देने को भी तैयार होते हैं; क्योंकि उन्हें मालूम है कि सरकारी नौकरी मिलने के बाद उन्हें रिश्वत से भी ढेर सारी कमाई होगी।

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