तस्करी पीडि़त महिलाओं से समाज का घिनौना व्यवहार

जागरूक टाइम्स 162 Aug 29, 2018

14 दिसंबर 2016 को 23 वर्षीय सेरीना को कल्याण (मुंबई) के चकलाघर से छुड़ाया गया था। 2 फरवरी 2017 को उसे उसके गृह राज्य पश्चिम बंगाल के लिए ट्रेन में बैठा दिया गया। यह यात्रा दो दिन तक चली। उसे कुछ समय नार्थ 24 परगना में मध्यमग्राम स्थित एक शेल्टर में गुजारने पड़े। छुड़ाए जाने के लगभग एक वर्ष बाद (इस साल 18 फरवरी) ही उसे अपने परिवार के साथ रहने का अवसर मिला, जो साउथ 24 परगना में पड़ता है।

तस्करी का शिकार महिलाएं, जिन्हें जबरन सेक्स वर्क में ठूंस दिया जाता है, छुड़ाए जाने पर किसी से अपने घर पर मिलना पसंद नहीं करती हैं। सेरीना भी इस अघोषित नियम का अपवाद नहीं है। वह 20 किमी का सफर तय करके कैनिंग सब डिवीजन के गोकुलपारा क्षेत्र में एक एनजीओ (गोरनबोस ग्राम विकास केंद्र) के दफ्तर में ही किसी से मिलना पसंद करती है। यह एनजीओ तस्करी पीडि़तों के कल्याण हेतु कार्य करता है। सेरीना बहुत कमजोर हो चुकी है।

उसका वजन मात्र 35 किलो है जो निरंतर कम होता जा रहा है। वह एचआईवी पॉजिटिव है। तस्करी या ट्रैफिक पीडि़तों के लिए पश्चिम बंगाल ने मुआवजा योजना आरंभ की हुई है। सेरीना ने भी मुआवजे के लिए याचिका लगाई हुई है, जिसकी स्थिति जानने के लिए उसे अपने गांव से अलीपुर अदालत (कोलकाता) के लिए नियमित लगभग 70 किमी का सफर करना पड़ता है। उसने जुलाई 2017 में मुआवजे के लिए अर्जी दी थी। उसका मेडिकल खर्च हर माह बढ़ता जा रहा है, लेकिन उसे अब तक खाली आश्वासन ही मिलते आ रहे हैं। सेरीना को अपने टेस्ट व दवाओं पर हर माह 3 से 4 हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं। 28 वर्षीय मेहरून्निशा भी बाहर के लोगों से अपने घर पर नहीं मिलती।

कैनिंग के ही एक गांव में रहने वाली मेहरून्निशा बताती है, 'जब 2017 के शुरू में मैं पुणे से अपने घर लौटी तो मेरे परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। रोजमर्रा की खाने पीने की चीजें खरीदना भी एक चुनौती है। मैंने कई माह तक अपने घर से बाहर कदम तक नहीं रखा।' अपने छुड़ाए जाने के लगभग एक वर्ष बाद वह इतना साहस जुटा सकी कि पुलिस स्टेशन जाकर उस व्यक्ति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा सके जिसने उसकी तस्करी की थी। वह व्यक्ति उसका पति था।

उसने धोखे से मेहरून्निशा से शादी की, उसे जॉब दिलाने के बहाने पुणे ले गया और वहां उसे एक चकलाघर में बेच दिया। आजकल मेहरून्निशा नियमित कोलकाता की यात्रा करती है ताकि आवश्यक कागजात जुटा सके, तस्करी पीडि़त मुआवजा की अर्जी देने के लिए। गौरतलब है कि 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि यौन हिंसा, एसिड अटैक व तस्करी के पीडि़तों को मुआवजा दिया जाए। अनेक राज्यों ने पीडि़त मुआवजा फंड गठित किया है।

पश्चिम बंगाल में मानव तस्करी पीडि़तों को 2017 से एक लाख रुपए मुआवजा देने की योजना है। आज के युग में यह पैसा बहुत कम है, लेकिन कुछ न होने से बेहतर है। सेरीना व मेहरून्निशा उन हजारों युवा लड़कियों व महिलाओं में से हैं जो हर साल बेहतर भविष्य की तलाश में हमदर्द का रूपधारण किए तस्करों का शिकार हो जाती हैं। ये तस्कर नए बॉयफ्रेंड, अजनबियों और कभी कभी परिवार के सदस्यों के रूप में सामने आते हैं, जाल बिछाते हैं, लड़कियां फंस जाती हैं और फिर उन्हें देशभर के चकलाघरों में बेच दिया जाता है।

हाल के दिनों में मानव तस्करी के मामलों में जबरदस्त वृद्धि हुई है, जिसपर लगाम कसने के लिए 'मानव तस्करी (रोकथाम, सुरक्षा व पुनर्वास) विधेयक 2017' गठित किया गया जिसमें आजीवन कारावास का प्रावधान है। हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने जो आंकड़े जारी किए हैं उनसे मालूम होता है कि 2015 की तुलना में 2016 में मानव तस्करी के मामलों में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2015 में मानव तस्करी के 6,877 मामले प्रकाश में आए थे जो इसके अगले साल बढ़कर 8,132 हो गए।

सबसे अधिक घटनाएं पश्चिम बंगाल (44 प्रतिशत) से रिपोर्ट की गईं और इसके बाद राजस्थान (17 प्रतिशत) का नंबर रहा। 2016 में तस्करी के 15,379 पीडि़तों में से 10,150 महिलाएं थीं और 5,229 पुरुष (अधिकतर लड़के) थे। विशेषज्ञों के अनुसार यह संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि बड़ी संख्या में मानव तस्करी के मामले रिपोर्ट ही नहीं किए जाते, इस वजह से कि बहुत से लोग अभी तक इस अपराध से अनजान हैं या उनमें पुलिस की मदद लेने का साहस नहीं है।

मानव तस्करी का उद्देश्य बंधुआ मजदूरी, वेश्यावृत्ति के लिए यौन शोषण, यौन शोषण के अन्य प्रकार, घरेलू नौकर बनाकर रखना, जबरन विवाह, बाल पोर्नोग्राफी, भीख मंगवाना, ड्रग्स सप्लाई करवाना, गुर्दे वगैरह अंग निकालकर बेचना आदि है। इन्हीं कारणों से विदेशों में भी मानव 'सप्लाई' किए जाए हैं। दूध पीते शिशुओं को बेऔलाद (खासकर लड़के की चाहत रखने वाले) दम्पतियों को भी बेचा जाता है।

लेकिन कानून का सख्त होना और पीडि़तों को मुआवजा देना इस समस्या का पूर्ण समाधान नहीं है। मानव तस्करी एक घिनौना सामाजिक कृत्य है, जिसको नियंत्रित करने के लिए सरकार व कानून के साथ-साथ समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। दुर्भाग्य से समाज अपनी भूमिका निभा ही नहीं रहा है बल्कि यूं कहना अधिक सही होगा कि समाज के कारण ही पीडि़तों का पुनर्वास संभव नहीं हो पा रहा है। देवरिया (उत्तर प्रदेश) से एक 16 वर्षीय लड़की को अगवा करके मेरठ के लालबत्ती क्षेत्र में बेच दिया गया। लगभग एक वर्ष बाद संबंधित चकलाघर पर समाज सेवियों के दबाव में पुलिस ने रेड डाली। नाबालिग लड़की को रिहा कराकर नारी निकेतन भेज दिया गया, जहां से उसने अपने पिता को फोन किया। लेकिन पिता ने रॉंग नंबर कहकर फोन काट दिया और फिर कभी अपनी बेटी का फोन नहीं उठाया।

सवाल है आखिर बाप ने ऐसा क्यों किया? दरअसल उसके मोहल्ले में एक तस्करी पीडि़त लड़की अपने घर जब लौटी तो मोहल्ले वालों ने उस परिवार को अपने बीच रहने नहीं दिया कि माहौल खराब हो जाएगा। नाबालिग लड़की का पिता मोहल्ला छोडऩा नहीं चाहता था। वह लड़की जब नारी निकेतन से बाहर निकली तो उसके पास लौटने की कौन सी जगह थी- चकलाघर। धर्म कर्म की बात करने वाला समाज अगर अपनी पीडि़त बेटियों के प्रति भी इतना असंवेदनशील रहेगा तो बेटियों का उद्धार कैसे होगा?  

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