धारा-497 : फिर कटघरे में पितृसत्ता

जागरूक टाइम्स 60 Aug 10, 2018

आजकल फिर आईपीसी की धारा-497 चर्चा में है। क्योंकि इसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की इस धारा का संबंध व्यभिचार से है। इस धारा के तहत व्यभिचार के दोषी पाए जाने वाले पुरुष के लिए तो सजा का प्रावधान है, लेकिन इसमें लिप्त महिला के लिए सजा का कोई प्रावधान नहीं है। मौजूदा याचिका इस धारा में मौजूद इस भेदभाव को खत्म करना चाहती है।

इसे अदालत में केरल निवासी जोसेफ शिन ने दायर किया है। याचिका में इस धारा के मौजूदा प्रावधानों को लिंग विभेद वाला बताया गया है। लेकिन धारा-497 के विरुद्ध अदालत तक पहुंची यह कोई पहली गुहार नहीं है। व्यभिचार के कानूनी पक्ष पर यूसुफ अब्दुल बनाम बंबई राज्य (ऑल इंडिया रिपोर्टर, 1954 सुप्रीम कोर्ट 321) के मामले में कई दशक पहले अदालत द्वारा निर्णय दिया गया था कि भारतीय दंड संहिता (1860) की धारा-497 संविधान के अनुच्छेद 14 या 15 के विरुद्ध नहीं है।

दरअसल धारा-497 के अनुसार अगर कोई पुरुष किसी महिला के साथ, महिला के पति की 'सहमति अथवा सहयोग से यौन-संबंध स्थापित करता है तो कोई बात नहीं। (यहां शायद यह मान लिया जाता है कि पति, दूसरे पुरुष को अपनी पत्नी के साथ संभोग की अनुमति दे देता है, तो पत्नी भी सहमत होगी ही) मगर यदि कोई पुरुष यह जानता हो कि उसकी प्रेयसी किसी और की पत्नी है और उससे यौन संबंध स्थापित करने के लिए वह उसके पति से सहयोग-समर्थन नहीं जुटाता, तो वह व्यभिचार का दोषी होगा।

भले ही महिला यानी किसी और की पत्नी इसके लिए कितनी ही इच्छुक क्यों न हो? अदालत में महिला की इच्छा या सहमति की कोई कीमत नहीं है। इस अपराध के लिए पर-पुरुष अर्थात् व्यभिचारकर्मी को पांच साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों भुगतने पड़ सकते हैं। लेकिन यूसुफ अब्दुल अजीज के मुकदमे के 30 साल बाद भारतीय दंड संहिता की व्यभिचार संबंधी धारा-497 की वैधता और औचित्य के समक्ष एक बार फिर प्रश्नचिह्न लग गया, जब ऐसा ही विवाद श्रीमती सौमित्री विष्णु और भारत सरकार के बीच सामने आया (ऑल इंडिया रिपोर्टरÓ 1985 सुप्रीम कोर्ट- 1618)।

यूसुफ अब्दुल अजीज के ममाले में दिए गए 1954 के अपने फैसले के आधार पर इस बार सर्वोच्च न्यायालय, श्रीमती सौमित्री विष्णु की याचिका रद्द कर सकता था। मगर ऐसा इसलिए नहीं किया गया कि 'अजीज का फैसला 30 वर्ष पहले हुआ था और इस बीच महिलाओं के यौन संबंधी सामाजिक आचार-विचार तथा दृष्टिकोण में आए तथाकथित परिवर्तनों की समीक्षा आवश्यक थी।'

 मुकदमे के तथ्य रोचक किंतु दुर्भाग्यपूर्ण हैं। श्रीमती विष्णु ने निचली अदालत में पति के विरुद्ध अपने को छोड़ देने का दावा दायर किया यानी उन्होंने अदालत में दावा किया कि उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया है। लेकिन सुनवाई के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि वस्तुस्थिति इसके उलट है; छोड़ा पत्नी ने पति को है। अब पति ने पत्नी के विरुद्ध छोड़े जाने की याचिका दायर कर दी और आरोप लगाया कि श्रीमती विष्णु वैवाहिक मर्यादा और पति का परित्याग करके व्यभिचारपूर्ण जीवन व्यतीत कर रही हैं। सुनवाई के दौरान श्रीमती विष्णु ने कहा कि अदालत चाहे तो परित्याग के आधार पर पति को उनसे तलाक लेने की अनुमति दे दे। व्यभिचार के आरोप की जांच जरूरी नहीं होनी चाहिए। मगर पति महोदय यह प्रमाणित करने के आधार पर अड़े रहे कि उनकी पत्नी व्यभिचारपूर्ण जीवन व्यतीत कर रही है।

निचली अदालत पति की बात से सहमत थी, पर पत्नी की पुनर्विचार याचिका पर उच्च न्यायालय ने मत व्यक्त किया कि परित्याग के आधार पर तलाक देना काफी है, व्यभिचार के आरोप की तह में जाना अनावश्यक है। सुनवाई के दौरान ही श्रीमती विष्णु के पति ने अपनी पत्नी के प्रेमी मिस्टर धर्मा ऐबेंजर के विरुद्ध धारा-497 के अंतर्गत अपनी पत्नी की व्यभिचार करने की शिकायत दाखिल कर दी। (यानी, एक विवाहिता से उसके पति की सहमति के बिना यौन संबंध स्थापित करने की हिमाकत) प्रकट है कि आरोप प्रमाणित होने पर मिस्टर ऐबेंजर को पांच साल की कैद, जुर्माना या दोनों सजाएं भुगतनी पड़ सकती थीं।

अब पत्नी ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इस याचिका में दलील दी गई कि धारा-497 व्यभिचार संबंधी मामलों में पति और पत्नी को समान अधिकार नहीं देती, इसलिए यह असंवैधानिक है। (अत: श्रीमती विष्णु के पति की व्यभिचार संबंधी शिकायत खारिज कर दी जाए।) असल मुद्दा दरअसल यही है- धारा 497 संवैधानिक है या असंवैधानिक? जो न्यायविदों की बहस के बीच हमेशा फिसल जाता है और बात कहीं से कहीं जा पहुंचती है। अपराध संहिता की धारा-198 (2) के अनुसार धारा-497 और 498 के अंतर्गत पीडि़त पक्ष हमेशा पति माना जाता है। पत्नी या और प्रेमी नहीं; ये सिर्फ व्यभिचारी हो सकते हैं; यानी दंडनीय अपराध भर कर सकते हैं। इसलिए इन धाराओं के अंतर्गत शिकायत का अधिकार सिर्फ पति का है। इन धाराओं की व्याख्या का अगला चरण और भी अजीब है: कोई व्यक्ति किसी विवाहिता से (उसके पति की अनुमति बिना) यौन संबंध रखेगा तो व्यभिचार (दंडनीय दुष्कर्म) करेगा; मगर अविवाहिता, विधवा अथवा तलाकशुदा महिला के साथ ऐसा कुछ करे या करता रहे तो कोई बात नहीं। कोई प्रेमी व्यभिचारी तभी माना जाएगा जब पति ऐतराज करेगा।

अर्थात् कोई पति किसी को भी अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध स्थापित करने की सहमति और अनुमति दे सकता है; या सब कुछ देखते-जानते भी अपने हित सधते महसूस करके मक्कड़ मारे पड़ा रहे तो भी वह पीडि़त पक्ष है और जब चाहे शिकायत अधिकार का उपयोग कर सकता है। तब बहस के दौरान श्रीमती सौमित्री विष्णु के वकीलों ने इस तरफ भी ध्यान खींचा कि धारा-497 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं कि पत्नी भी किसी महिला के विरुद्ध दंडनीय अभियोग की प्रक्रिया चला सके जो उसके पति के साथ यौन संबंध स्थापित करती है या जो उसके पति से विवाह बंधनों से बाहर रहकर प्रेम करती है।
 पत्नी अपने ऐसे पति को भी न्यायालय में नहीं पेश कर सकती जो पर-पत्नी अथवा पर-स्त्री से यौन संबंध रखता है। इस पूरे संदर्भ में वकीलों की राय थी कि इस धारा ने पत्नी को पति की संपत्ति बनाकर छोड़ दिया है। पति चाहे तो इसका उपयोग करे, चाहे तो न करे। मानो व्यभिचार का मामला एक पुरुष द्वारा दूसरे पुरुष की संपत्ति के जा-बेजा इस्तेमाल भर का मामला है।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायमूर्तियों की संविधान पीठ (मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, ए.एम.खनविलकर, धनंजय चंद्रचूड़, आर.एफ.नरीमन और सुश्री इंदु मल्होत्रा) 'व्यभिचार' की संवैधानिकता पर सुनवाई कर रही है। फैसले की प्रतीक्षा है। देखते हैं इस बार, कानून की भाषा की क्या नई परिभाषा गढ़ी जाती है। पिता और पुत्र आमने-सामने खड़े हैं...। नि:संदेह, जिस दिन सुप्रीम कोर्ट, पत्नियों को भी पति और उसकी 'वो' के खिलाफ व्यभिचार की शिकायत का अधिकार दे देगी, पितृसत्ता के लाडलों की न केवल सारी पोल ही खुल जाएगी बल्कि तमाम स्त्री देह व्यापार की दुकानों पर ताले लग जाएंगे।

लेकिन मुझे लगता है कि पांच न्यायमूर्तियों की संविधान पीठ भी धारा 497 को असंवैधानिक भले ही कह दे, स्त्री को भी पति/प्रेमिका के विरुद्ध शिकायत करने का अधिकार (शायद) कभी नहीं देगी। परिणाम स्वरूप मर्दों को और आजादी मिलने से समाज में व्यभिचार और वेश्यावृति बढ़ेगी और बढ़ती रहेगी। व्यवस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि हर कीमत पर, पितृसत्ता बनी-बची रहनी चाहिए।

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