महाराष्ट्र में आरक्षण की घोषणा के बाद क्या जातीय राजनीति की नई जंग शुरू होगी ?

जागरूक टाइम्स 184 Nov 19, 2018

अभी तक मुंबई में रहने वाले गैर मराठी यही समझते थे कि हर मराठी बोलने वाला शख्स मराठा होता है.लेकिन वोट की राजनीति में आरक्षण की टोपी ने इस पारम्परिक सामुदायिक पहचान को नए अर्थ और संदर्भ दे दिए हैं.इसलिए अगर जल्द ही महाराष्ट्र के कुछ ख़ास लोग ही खुद के मराठा होने का दावा करें और कुछ लोग खुद को मराठा कहे जाने से नाराज हों, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा.क्योंकि वोट की राजनीति ने ऐन लोकसभा चुनावों से पहले मराठा गैर मराठा का सवाल खड़ा कर दिया है.महाराष्ट्र सरकार ने बीते 18 नवंबर 2018 को लम्बे समय से आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे मराठा समुदाय को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के तहत आरक्षण देने की घोषणा कर दी है.

सवाल है क्या विधानसभा के शीतकालीन सत्र शुरू होने के एक दिन पहले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस का बिना आरक्षण प्रतिशत का खुलासा किये खेला गया आरक्षण का दांव राजनीतिक रूपसे दुरुस्त साबित होगा या प्रदेश में जातीय पहचान के नए दांवपेंच देखने को मिलेंगे ? महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडऩवीस ने प्रेस कांफ्रेंस करके इसकी घोषणा करते हुए कहा कि पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट में कई ठोस तर्कों के साथ इसकी जरूरत बतायी गयी है.मसलन पिछड़ा वर्ग आयोग का मानना है कि चूँकि सरकारी और अर्ध-सरकारी स्तर कि नौकरियों में मराठा समुदाय कि पर्याप्त भागीदारी नहीं है.इसलिए मराठा समाज को सामाजिक और शैक्षणिक तौरपर पिछड़ा माना जाना चाहिए जैसी कि इस समुदाय कि लम्बे समय से मांग रही है.पिछड़ा वर्ग आयोग ने इस आधार पर भी मराठा समुदाय के लिए आरक्षण की वकालत की है कि मराठा समाज को सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर पिछड़ा घोषित करने से असाधारण परिस्थिति बन गयी हैं.

बहरहाल जातीय राजनीति की महारष्ट्र में आज जो फसल तैयार खडी है,उसके बीज पिछली सदी के सत्तर के दशक में बालासाहब ठाकरे ने बोये थे.पर सवाल है क्या शिवसेना आज इस फसल को इतनी आसानी से भाजपा को काटने देगी ? जो लोग यह नहीं समझ पा रहे कि एक जैसी विचारधारा के बावजूद भाजपा और शिवसेना के बीच पिछले काफी दिनों से 36 का आंकड़ा क्यों है ? उन्हें तमाम बातों के अलावा इस बात पर भी गौर फरमाना चाहिए. क्योंकि शिवसेना ने इस साल जुलाई में पहली बार जाति के आधार पर मराठा आरक्षण का खुलकर समर्थन किया था वर्ना पहले वह इसे हवा देते हुए भी गोलमोल किया करती थी. मगर इस साल जुलाई में अपने विधायकों के साथ बैठक के बाद शिवसेना सुप्रीमों उद्धव ठाकरे ने कहा था कि सरकार को पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट का इंतजार किए बिना ही मराठा आरक्षण देना चाहिए. उन्?होंने इसके लिए विशेष अधिवेशन बुलाकर प्रस्ताव पारित करने तक की मांग की थी.

तमाम राजनीतिक विश्लेषकों के लिए उद्धव का यह बयान समझ के परे था क्योंकि बाल ठाकरे हमेशा से जाति के आधार पर आरक्षण के खिलाफ रहते थे. मराठा पहचान की राजनीति करने के बावजूद वह इस किस्म का संतुलन साधने की कलाबाजी करते थे.लेकिन उद्धव न तो इतने शार्प हैं और न ही उनका आभामंडल इतना प्रभावी है कि कई लोग चाहकर भी कुछ सवाल न पूछ सकें.इसलिए वह चाहकर भी अपने कुछ स्टैंड अस्पष्ट नहीं रख सकते थे. बहरहाल शिवसेना के रूख में इस बदलाव का कारण मराठवाड़ा में उसकी जड़ें कमजोर हो जाने की ठोस आशंका है.क्योंकि कोंकण के बाद शिवसेना का यह दूसरा मजबूत किला है.मतलब यह कि शिवसेना मराठा वोटबैंक को नाराज नहीं करना चाहती है.

लेकिन यह समझदारी खेल भी बिगाड़ सकती है अगर शिवसेना से ओबीसी नाराज हो जाएँ.क्योंकि अभी तक ओबीसी का अच्छा ख़ासा वोट शिवसेना को मिलता रहा है.ऐसे में यह भाजपा और शिवसेना दोनों के लिए आत्मघाती हो सकता है क्योंकि महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों में से केवल 75 से 83 सीटों पर वे मराठा निर्णायक भूमिका निभाते हैं, जिनके लिए आरक्षण की घोषणा की गयी है. मगर बहुत ज्यादा सीटों में प्रभावी न होने के बावजूद मराठों ने राजनीतिक पार्टियों पर दबाव बनाने की हाल के सालों में जो व्यवस्थित और बेहतरीन कोशिश की थी उसके चलते उनकी ताकत का प्रभा मंडल उनकी वास्तविक ताकत से कहीं ज्यादा बना.वास्तव में पिछले दो सालों मराठों ने महाराष्ट्र भर में 57 मौन मोर्चे निकालकर मुंबई में 58 वां मोर्चा लेकर आये थे जब मुख्यमंत्री ने आनन फानन में उनके लिए पलक पांवड़े बिछा दिए थे.

वह ऐसा करते भी क्यों न आखिर चकाचौंध करने के लिए मराठों ने पूरे महाराष्ट्र से 5000000 लोग इक_ा करके मुंबई लाने की घोषणा की थी और इतने तो नहीं लेकिन आज तक किसी भी आन्दोलन में मुंबई पहुंचे लोगों से ज्यादा लोग लेकर वे यहाँ आये थे,कुछ आकलनों के मुताबिक़ ये 10,000,00 से ज्यादा लोग थे. इसी वजह से महाराष्ट्र सरकार ने अगुवानी की शैली में उनका स्वागत किया था . मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस मराठों की मांग पर तब कहा था राज्य सरकार मराठा समुदाय को आरक्षण देने के पक्ष में है इसलिए इस मामले को पिछड़े वर्ग के आयोग के पास जल्द भेजा जायेगा और आयोग से सिफारिश करेगा कि वह जल्द से जल्द अपनी रिपोर्ट दे जिसे बंबई उच्च न्यायालय को सौंपा जा सके.उन्होंने इसके साथ ये घोषणा भी की थी कि जब तक फैसल नहीं होता तब तक आर्थिक रूप से पिछड़े मराठों को छात्रवृत्ति की सुविधा मिलेगी.

उन्होंने यह आश्वासन भी दिया कि यह सुविधा 605 पाठयक्रम तक बढ़ा दिया जायेगा.साथ ही 60 प्रतिशत अंक की पूर्व शर्त को ढीलाकर 50 प्रतिशत कर दिया जायेगा.इसके अलावा महाराष्ट्र के हर जिले में विद्यार्थियों के रहने के लिए आवास बनाया जायेगा जिसके लिए सरकार पांच करोड़ रुपए देगी. इसके अलावा अन्नासाहब पाटिल आर्थिक विकास आयोग के तहत कौशल विकास पाठ्यक्रमों को नि:शुल्क शुरू किया जायेगा जिससे मराठा समुदाय के तीन लाख विद्यार्थियों को इसका लाभ मिल सकेगा. उन्होंने यह भी कहा था कि सरकार जनता को जाति प्रमाण पत्र देने के लिए नीति बना रही है. यह सब पिछले साल मुंबई में निकाले गए मराठा क्रांति मोर्चा के अंत में मोर्चे के प्रतिनिधियों के साथ खुशनुमा माहौल में बातचीत करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था. गौरतलब है मराठा मोर्चा,मराठा समाज के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 16 प्रतिशत आरक्षण की मांग करता रहा है. लेकिन अभी तक सरकार ने आरक्षण की घोषणा तो कर दी है लेकिन कितने फीसदी आरक्षण होगा इसकी घोषणा नहीं कि तो क्या अब शिवसेना मराठों के हक़ के लिए सरकार को उनकी मांग के प्रतिशत को याद दिलाने का काम करेगी ?
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