अविश्वास प्रस्ताव के दांवपेंच, राहुल चूके या सियासत से सहजता?

जागरूक टाइम्स 197 Jul 23, 2018

इसमें कोई दो राय नहीं है कि 20 जुलाई 2018 की देर शाम संसद में मोदी सरकार के विरुद्ध पेश अविश्वास प्रस्ताव का नतीजा वही आया, जो आना था। भले प्रस्ताव के पहले विपक्षी नेता खासकर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने डींग हांकी थी कि कौन कहता है हमारे पास बहुमत नहीं है? लेकिन सियासतदां ही नहीं इस देश का आम आदमी भी इस बात को भली भांति जानता था कि किसके पास बहुमत है और किसके पास नहीं।

बावजूद इसके यह कहना बहुत सरलीकरण करना होगा कि इस अविश्वास प्रस्ताव से विपक्ष कुछ भी हासिल नहीं कर सका या कि राहुल गांधी अपनी गैर जरूरी उतावली हरकत से अपने ही जोरदार भाषण पर पानी फेर दिया। नि:संदेह संसद में पेश 27वें अविश्वास प्रस्ताव पर सबसे ज्यादा नजरें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर ही टिकीं थीं। देश के आम मतदाता ही नहीं बल्कि विपक्ष और सत्तापक्ष सभी में यह जानने की सहज उत्सुकता थी कि आखिरकार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी हाल के सालों में संसद के इस सबसे बड़े मौके पर अपने को किस तरह और कैसे पेश करते हैं? यह कहने में जरा भी संकोच नहीं होना चाहिए कि सत्तापक्ष को तो उम्मीद थी ही नहीं खुद विपक्ष और राहुल गांधी की अपनी पार्टी कांग्रेस को भी शायद यह उम्मीद नहीं रही होगी कि राहुल गांधी आज बिल्कुल अलग रंग में नजर आएंगे और यह भी कि वह सत्तापक्ष को ही नहीं मीडिया को भी कुछ मामलों में बगलें झांकने पर मजबूर कर देंगे।

राहुल गांधी ने सचमुच अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जिस अंदाज में अपनी बात कहनी शुरू की, वह उनका अब तक देखा गया बिल्कुल नया अंदाज था। उनके भाषण में न सिर्फ गंभीर आरोप थे बल्कि गंभीर आरोप लगाने की जो बेचैन बॉडी लैंग्वेज होती है, वह भी थी। उनके भाषण में जरूरत के हिसाब का जोरदार उतार-चढ़ाव था, अभिनय था और एक ऐसी बेफिक्री थी, जो अंतत: किसी नेता को हिट करने में बड़ी भूमिका निभाती है। राहुल ने शायद अपने अब तक के राजनीतिक जीवन में सर्वाधिक राजनीतिक भाषण दिया, जिसमें न सिर्फ साफ-साफ शब्दों में सरकार पर गंभीर आरोप थे बल्कि इन आरोपों को बिना किसी नाटकीयता के रखा गया था, जो सन्न कर देने वाला था। राहुल गांधी ने अपने जोरदार भाषण में सरकार पर खुलकर बोलने की हिम्मत दिखाई। साथ ही कांग्रेस के इतिहास के विरुद्ध उन्होंने कॉरपोरेट जगत को भी खुले तौर पर बहुत स्पष्टता के साथ कटघरे में खड़ा किया, यह कहते हुए कि जब से मोदी सरकार आई है, देश के 15 से 20 कॉरपोरेट घराने देश को ढाई लाख करोड़ रुपए की चपत लगा चुके हैं।

राहुल गांधी के मुताबिक मोदी सरकार ने इन कॉरपोरेट घरानों का इतना लोन बैंकों के बट्टे खाते में डलवाकर देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी के सबसे प्रभावशाली क्षेत्र यानी उनके विदेश नीति पर भी जमकर हमला बोला। कुछ मामलों में तो राहुल ने पारंपरिक प्रोटोकाल की बाध्यता का भी ध्यान नहीं दिया। राहुल गांधी ने खुलेआम सरकार पर आरोप लगाया कि राफेल विमान सौंदों पर वह गैरजरूरी ढंग से सौदे को छुपा रही है, जबकि फ्रांस के राष्ट्रपति ने उनसे मुलाकात के दौरान साफ-साफ कहा था कि इस संबंध में कोई गोपनीयता नहीं है, आप यह बात जिससे कहना हो, जाकर कहें।

हालांकि उनके इस भाषण के दौरान ही न सिर्फ मोदी सरकार ने उन्हें जबरदस्त ढंग से दस्तावेजों का हवाला देते हुए घेरने की कोशिश की बल्कि कुछ ही घंटे में फ्रांस की सरकार की भी एक ऐसी ही गोलमोल प्रतिक्रिया आ गई, जिस पर अगर भाजपा सत्ता में नहीं होती तो धरती आसमान एक कर देती। कुल मिलाकर देखें तो राहुल गांधी ने इस अविश्वास प्रस्ताव के बड़े मंच का अपने ढंग से भरपूर इस्तेमाल किया और पिछले काफी सालों से अपने जिस अंदाज को वह गंभीरता नहीं प्रदान कर पा रहे थे, उसे किसी हद तक गंभीर पहचान भी दिलाई। लेकिन सत्ता पक्ष ने जिस संगठित तरीके से उनके अंदाज पर आक्रमण किया और यह दर्शाने की कोशिश की कि तमाम कोशिशों के बावजूद राहुल गांधी राजनीति में अपने नौसिखिएपन को छुपा नहीं पाए, वह आक्रामक निष्कर्ष तात्कालिक तौर पर भले सत्ता पक्ष को हावी होने का सुख दे, लेकिन हकीकत यही है कि राहुल गांधी ने भाषण देकर जिस तरह प्रधानमंत्री के पास गए, उनसे खड़े होने के लिए कहा और प्रधानमंत्री के न खड़े होने पर करीब-करीब उनके गले पड़ गए, यह दृश्य तात्कालिक ताजेपन के कारण भले थोड़ा अटपटा लगे, थोड़ा इमैच्योर लगे, थोड़ा हास्यस्पद लगे लेकिन जैसे-जैसे यह दृश्य अपनी उम्र हासिल करेगा, जैसे-जैसे इसकी तात्कालिकता धुंधलाएगी और आम लोग इसके संदेश का मनन करेंगे, वैसे-वैसे राहुल का यह अंदाज उन्हें एक बड़ी और उदार छवि बख्शेगा।

तात्कालिक तौर पर भी उनका यह उतावला अंदाज पूरी तरह से उनके विरोध में नहीं गया। भले सत्ता पक्ष इसे उनकी हरकत कहे लेकिन राहुल गांधी भाषण देने के बाद प्रधानमंत्री के पास जिस तरह से चलकर गए, उनसे गले मिलने का निवेदन किया और रिस्पोंस न मिलने पर वह खुद उनके गले पड़ गए, उनकी इस औचक हरकत ने ही आज उन्हें मीडिया में प्रधानमंत्री के बराबर सुर्खियां बख्शी हैं। अपने इसी अंदाज से उन्होंने पहली बार सरकार को ही नहीं समूचे सत्ता पक्ष को अपने एजेंडे पर प्रतिक्रिया करने के लिए मजबूर कर दिया। इसमें कोई दो राय नहीं कि सत्ता पक्ष की तरफ से बोलने का ज्यादा व्यवस्थित अंदाज दर्शाया गया। राजनाथ सिंह, अनंत कुमार से लेकर अनुराग ठाकुर तक ने ज्यादा आक्रामक, ज्यादा व्यवस्थित और ज्यादा प्रभावशाली अंदाज में बोलने की कोशिश की और बोले भी। लेकिन समग्रता में देखा जाए तो यह सब सिर्फ राहुल गांधी के आरोपों का चतुराई से खंडन भर था। उन्हें झूठा या अनर्गल साबित करने के लिए किसी के पास ठोस तथ्य नहीं थे।

यहां तक कि प्रधानमंत्री ने जब राजनीतिक रैली के अंदाज में राहुल गांधी से लगभग तीन गुना लंबा भाषण दिया, तो उनके भाषण में भी एक किस्म से सफाई ही थी। हालांकि प्रधानमंत्री एक मंझे हुए वक्ता हैं इसलिए वह अपने अंदाज में तात्कालिक रूप से तालियां भी खूब बजवाईं और ग्लोबली लाइव होने के कारण समर्थकों की जय-जय भी खूब हासिल की। लेकिन सच यही है कि संसद के अविश्वास प्रस्ताव में राहुल चूके नहीं हैं बल्कि उन्होंने देश के मतदाताओं को अपना एक ज्यादा चटख और ज्यादा विश्वसनीय रंग दिखा पाने में सफलता हासिल की है। हां, अगर उनके गले मिलने को सत्ता पक्ष गले आ पडऩे के रूप में साबित करने में तात्कालिक रूप से सफल हो गया है तो यह सत्ता पक्ष की सफलता नहीं सियासत से चूक गई सहजता का नतीजा है।



जिसके कारण भारतीय राजनीति अपनी दिखावट में वास्तविकता से कहीं ज्यादा सजग और गंभीर दिखने की कोशिश करती है। जबकि हकीकत में वह देश और समाज के प्रति कितनी गंभीर है इसको दोहराये जाने की जरूरत नहीं है?


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