खुल गई विपक्षी एकता की कलई

जागरूक टाइम्स 263 Sep 21, 2018

 छतीसगढ़ में बसपा और अजीत जोगी की जनता कांग्रेस के बीच हुए समझौते के संबंध में आप किसी कांग्रेसी की राय जानने की कोशिश कीजिए तो वह आपका पूरा सवाल सुनने के पहले ही टेप की माफिक बजना शुरू हो जाएगा, यह भाजपा के इशारे पर हुआ समझौता है। कोई इन कांग्रेसियों से पूछे तो इसमें आश्चर्य क्या है? क्या भाजपा को तथाकथित विपक्षी एकता को मजबूत करने के लिए मायावती और अजीत जोगी के आपस में मिलने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए था। वास्तव में छत्तीसगढ़ में जो कुछ हुआ, वह न तो अप्रत्याशित है और न ही कहा जा सकता है कि उसकी आहट नहीं सुनाई दे रही थी। बहनजी ने पिछले 2 महीनों में तीन बार इशारों ही इशारों में जता दिया था कि ऐसा कुछ हो सकता है। बसपा सुप्रीमों बार-बार कह रही थीं कि वह उसी के साथ गठबंधन बनाएंगी जो बसपा को सम्मानजनक सीटें देगा। माना कि छत्तीसगढ़ में बसपा उतनी बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं है, बहन जी उसे जितनी बड़ी दिखाने की कोशिश कर रही थीं। बसपा को साल 2013 के विधानसभा चुनावों में सभी 90 सीटों में लडऩे के बावजूद महज 1 सीट और कुल 1.11 प्रतिशत मत मिले थे। इस तरह पिछले चुनावों में उसे 2008 के मुकाबले भी 1 सीट कम मिली थी और लोकप्रिय मत भी 1 प्रतिशत कम मिले थे।

लेकिन यह तो तय है कि यह न तो 2013 है और न ही 2008, जिसके आधार पर राजनीतिक ताकत का आंकलन और सीटों का बंटवारा हो। यह 2018 है और इसे महज तथ्यों के आईने से ही नहीं राजनीतिक माहौल के आईने से भी देखना होगा, जिसके लिए लगता नहीं है कि कांग्रेस तैयार है। कांग्रेस को नहीं बल्कि समूचे उस तथाकथित विपक्ष को सोचना चाहिए जो पिछले कई महीनों से एकता के बड़े-बड़े दावे कर रहा था कि राजनीति का यह असाधारण समय है कांग्रेस आज जितनी कमजोर है उतनी इतिहास में कभी नहीं रही। साथ ही गैर भाजपाई पार्टियों की एकता के लिए आज जितने तर्क मौजूद हैं, उतने पहले कभी नहीं रहे। इतने असाधारण समय में राजनीति को इतने साधारण तथ्यों के आईने में देखना आत्मघात नहीं तो फिर आत्मघात क्या है? बहनजी जी की मांग ज्यादा हो सकती थी, लेकिन उनकी इस ज्यादा की मांग में कहीं न कहीं उस अविश्वास की भूमिका थी जिसके प्रभाव में उन्हें लग ही नहीं रहा था कि कांग्रेस उनकी मांग मानेगी। अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस; छत्तीसगढ़.जे और मायावती की बीएसपी के बीच जो गठबंधन हुआ है, उसके मुताबिक 90 में से 35 सीटों पर बसपा लड़ेगी।

जबकि अजीत जोगी की पार्टी 55 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। इतनी सीटें निश्चित रूप से बसपा को कांग्रेस से नहीं मिलतीं। लेकिन बसपा भी इस बात को बेहतर ढंग से जानती है कि जोगी से इतनी सीटें पाने का मतलब यह नहीं है कि बसपा को बहुत ज्यादा फायदा हो जाएगा। इसलिए कांग्रेस अगर उसे इससे आधी सीटें भी देती तो बसपा खुशी खुशी ले लेती। लेकिन बंटवारे को लेकर कांग्रेस अभी भी अपने अतीत के हैंगओवर में है। 2013 के तथ्यों से गठबंधन की नई इबारत लिखी ही नहीं जा सकती, क्योंकि अतीत के तथ्यों से ज्यादा इस समय महत्वपूर्ण है भविष्य के समीकरण। इन समीकरणों के हल के लिए मौजूदा हकीकत को स्वीकार करना ही पड़ेगा। पहले ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि बसपा छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के साथ ही गठबंधन करेगी। लेकिन कहते हैं न कि रस्सी जल गई मगर अकड़ नहीं कम हुई। कांग्रेस के इसी अदृश्य गरूर का नतीजा है कि बसपा को मजबूरी में जोगी का हाथ थामना पड़ा। वास्तव में तथाकथित विपक्षी एकता के लिहाज से छत्तीसगढ़ की राजनीतिक जमीन सबसे बंजर जमीन थी। अगर इस बंजर में भी भाजपा अपनी रणनीतिक फसल लहलहा लेगी तो उसे यूपी जैसे सबसे संवेदनशील राज्य में भला विपक्षी एकता को छिन्न भिन्न करने में कौन रोक सकता है। मालूम हो कि सांसदों के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं।

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 73 सीटें जीतकर किसी भी संभावित समीकरण को ही खत्म कर दिया था। लेकिन राजनीति में कई बार जीत से यानी सीट से भी ज्यादा महत्वपूर्ण वोट स्टेटिस्टिक्स होती है। दरअसल, तब यूपी में भाजपा को कुल 42.30 प्रतिशत वोट मिले थे जौर उसके सहयोगी अपना दल को 1 प्रतिशत। इस तरह कुल ग्रांड टोटल देखें तो 43.30 प्रतिशत वोट बनते हैं। वहीं सपा को 22.20 प्रतिशतए बसपा को 19.60 प्रतिशत और कांग्रेस को 7.50 प्रतिशत वोट मिले थेण् यदि कांग्रेस.सपा.बसपा के वोटों को मिला लिया जाए तो ये 49.3 प्रतिशत हो जाते हैं। इस समीकरण को देखने के बाद बताने की को आवश्यकता नहीं है कि यदि 2019 में यह गठबंधन हो जाता है तो उसके नतीजे क्या होंगे? अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से यह कहा भी है कि 2019 में बसपा के साथ महागठबंधन के लिए वो कुछ सीटों की कुर्बानी भी दे सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ मायावती का बयान आ चुका है कि महागठबंधन उसी सूरत में होगा जब उन्हें पर्याप्त सीटें मिलेंगी। महागठबंधन की तीसरी कड़ी के रूप में मौजूद कांग्रेस और रालोद भी अधिक से अधिक सीटें हासिल करने की फिराक में हैं।

सवाल है कांग्रेस क्या तथ्यों की यह संवेदनशीलता समझेगी, क्योंकि न समझने की जिद में छत्तीसगढ़ को तो दोनों ने गंवा दिया। लेकिन अभी भी मध्य प्रदेश और राजस्थान हैं। यदि मध्य प्रदेश के चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलेगा कि यहां बसपा जबसे चुनाव लड़ रही है, उसका 6 से 7 प्रतिशत के आसपास सॉलिड वोट रहा है। पिछली बार भी मध्यप्रदेश में भाजपा को 4 सीटें और 6.42 प्रतिशत मत मिले थे। यदि इस बार ये वोट कांग्रेस के साथ मिल जाते हैं, तो जाहिर है कि मध्य प्रदेश में पिछले 15 साल से सत्ता की बाट जोह रही कांग्रेस के लिए सत्ता तक पहुंचने का रास्ता आसान हो जाएगा और बसपा को भी अपना जनाधार बढ़ाने का मौका मिल जाएगा। लेकिन अगर पुराने आंकड़ों के आईने में देखने की कोशिश की गई तो छत्तीसगढ़ वाला ही हाल हो गया क्योंकि तथ्य तो यही है कि इस समय लोकसभा में बसपा का एक भी सांसद नहीं है, साथ ही अपनी राजनीतिक मातृभूमि वाली यूपी विधानसभा की 403 सीटों में उसके पास महज 19 हैं।

लेकिन अगर इन आंकड़ों से बसपा की ताकत का अंदाजा लगाने की कोशिश की गई तो नि:संदेह कांग्रेस और समूची विपक्षी एकता के सूत्रधार गलती करेंगे क्योंकि बसपा को 2014 में भले संसद सदस्यों के हिसाब से देश के सबसे बड़े प्रदेश में एक भी सीट न मिली हो, लेकिन उसे तब भी 19.77 प्रतिशत वोट मिला था। अगर माना जाय कि बसपा के वोट बैंक का मुख्य आधार दलित वोट हैं तो उसके लिए यह कोई निराशाजनक आंकड़ा नहीं था यक्योंकि उत्तर प्रदेश में लगभग 20 फ़ीसदी दलित 19 फ़ीसदी मुसलमान और 27ण्5 फीसदी पिछड़ी जातियां हैंण् इन आंकड़ों से साफ़ पता चलता है कि मायावती अब भी उत्तर प्रदेश में एक ताकत हैं और सम्मानजनक हिस्सा माँगना उनका हक़ हैण्



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