उम्रदराज होती संसद में बढ़ते दागदार सांसद

जागरूक टाइम्स 179 May 27, 2019

राजनीति के अपराधीकरण पर विराम लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सराहनीय प्रयास अवश्य किये हैं, जैसे अगर किसी जनप्रतिनिधि को अदालत से दो वर्ष या उससे अधिक की सजा हो जाये तो तुरंत प्रभाव से उसकी सदन की सदस्यता समाप्त हो जायेगी, फिर मार्च 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि राजनीतिक नेताओं के खिलाफ जो विभिन्न अदालतों में अपराधिक मुकदमे चल रहे हैं, उनका निपटारा एक वर्ष के भीतर हो जाना चाहिए। लेकिन इस पर अमल न हो सका। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने सियासत को अपराधियों से मुक्त करने के लिए अपने प्रयासों को नहीं छोड़ा। सर्वोच्च अदालत में नवम्बर 2017 में न सिर्फ यह जानकारी तलब की, कि तब (2014) से अब (2017) तक नेताओं के विरुद्ध कितने नए मामले दायर किये गये हैं व अदालतों में उनकी स्थिति (स्टेटस) क्या है बल्कि केंद्र सरकार से यह भी कहा है कि वह नेताओं पर चल रहे अपराधिक मुकदमों को जल्द निपटाने के लिए विशेष अदालतें गठित करे। जाहिर है यह भी नहीं हुआ और अब स्थिति यह है कि जो नई लोकसभा गठित हुई है, उसमें कम से कम 233 सांसद ऐसे हैं जिनके विरुद्ध अपराधिक मामले चल रहे हैं। अगर 43 प्रतिशत सांसद अपराधिक आरोपों के साये में हैं तो सुप्रीम कोर्ट की कोशिशें कैसे सफल हो सकती हैं? इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि 2014 की लोकसभा की तुलना में 2019 की लोकसभा में 26 प्रतिशत सांसद अधिक हैं जिनके विरुद्ध अपराधिक मामले दर्ज हैं।

बीजेपी के 116 सांसदों (39 प्रतिशत) के विरुद्ध अपराधिक मामले हैं और इसके बाद कांग्रेस (29 सांसद, 57 प्रतिशत), जनता दल (यू) (13 सांसद, 81 प्रतिशत), द्रमुक (10 सांसद, 43 प्रतिशत) और तृणमूल कांग्रेस (9 सांसद, 41 प्रतिशत) का नंबर है। ऐसा एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉमर््स (एडीआर) की रिपोर्ट में कहा गया है। गौरतलब है कि 2014 की लोकसभा में 185 सांसदों (34 प्रतिशत) के विरुद्ध अपराधिक मामले थे, जिनमें से 112 के खिलाफ गंभीर आरोप (हत्या, बलात्कार आदि) थे। जबकि इससे पहले साल 2009 में गठित लोकसभा में 162 सांसदों (30 प्रतिशत) के विरुद्ध अपराधिक मामले थे, जिनमें से 14 प्रतिशत के खिलाफ गंभीर आरोप थे। दूसरे शब्दों में 2009 व 2019 के बीच 'अपराधी सांसदों' में 109 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इन आंकड़ों से एकदम स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट के प्रयासों के बावजूद लोकसभा में ऐसे सदस्यों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है, जिनके विरुद्ध अपराधिक मामले हैं। अमूमन इन सांसदों का इस संदर्भ में जवाब यह होता है कि यह मुकदमे राजनीति से प्रेरित हैं यानी उनके सियासी विरोधियों की साजिश है, लेकिन इस तथाकथित साजिश का कभी पर्दाफाश नहीं होता है। आखिर क्यों? 17वीं लोकसभा में लगभग 29 प्रतिशत मामले बलात्कार, हत्या, हत्या का प्रयास या महिलाओं के विरुद्ध अपराध से संबंधित हैं।

यहां इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए कि ऐसे नेताओं की संख्या भी कम नहीं है जिनके स्वयं के विरुद्ध तो कोई मुकदमा दर्ज नहीं है, लेकिन वह अपराधियों को शरण देते हैं। वर्तमान लोकसभा में 11 सांसद (5 बीजेपी, 2 बसपा के और एक-एक कांग्रेस, एनसीपी व व्हाईएसआर) ऐसे हैं जिनके विरुद्ध हत्या के चार्ज हैं। भोपाल से चुनी गईं बीजेपी सांसद प्रज्ञा ठाकुर के विरुद्ध आतंक (2008 मालेगांव विस्फोट) के आरोप हैं, जबकि 29 सांसदों के खिलाफ नफरत फैलाने से संबंधित आरोप हैं। इदुक्की (केरल) से कांग्रेस सांसद डीन कुरिअकोसे के विरुद्ध 204 अपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें धमकी, डकैती, गृह अतिक्रमण आदि आरोप हैं। जहां तक सांसदों की आर्थिक स्थिति का संबंध है तो इस बार 475 (88 प्रतिशत) विजेता करोड़पति हैं। 2014 में 443 (82 प्रतिशत) और 2009 में 315 (58 प्रतिशत) सांसद करोड़पति थे। यानी लोकसभा में 'अपराधियों' के साथ-साथ करोड़पतियों की संख्या में भी निरंतर इजाफा हो रहा है। 2019 के चुनाव में प्रति विजेता औसत एसेट्स 20.93 करोड़ रूपये रहे। 17वीं लोकसभा में 128 (24 प्रतिशत) सदस्य ऐसे हैं जिनकी घोषित शैक्षिक योग्यता 5वीं कक्षा (पास) और 12 कक्षा (पास) के बीच है। इसी तरह 392 (73 प्रतिशत) स्नातक या उससे ऊपर हैं। एक सदस्य ने अपने को निरक्षर घोषित किया है।

तो क्या इसका अर्थ यह है कि भारतीय लोकतंत्र में सांसद बनने के लिए अपराधिक रिकॉर्ड, अशिक्षित व करोड़पति होना अनिवार्य होता जा रहा है? साफ छवि वाले, शिक्षित 'गरीब' प्रत्याशियों जैसे कन्हैया कुमार, आतिशी, राघव चड्ढा आदि की पराजय से तो इसी बात को बल मिलता है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि राजनीति का अपराधीकरण एक बड़ी व गम्भीर समस्या है। जनता को जिन अपराधियों से मुक्ति चाहिए होती है, वह ही उसके प्रतिनिधि बन बैठते हैं, जिससे न अपराधों पर अंकुश लग पाता है और न ही भ्रष्टाचार पर। एक स्वच्छ व प्रगतिशील समाज के लिए बेदाग, शिक्षित, आधुनिक व दूरंदेश प्रतिनिधियों की आवश्यकता होती है जो खुले जहन के भी हों। लेकिन तथ्य यह है कि इस मुद्दे पर देश की राजनीतिक पार्टियों से अधिक स्वतंत्र संस्थाओं जैसे सुप्रीम कोर्ट व चुनाव आयोग को ही चिंता होती है। जब तक राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे में दिलचस्पी नहीं लेंगी व दागियों को चुनाव टिकट देना बंद नहीं करेंगी, तब तक इस पर कुछ ठोस हो पाना कठिन है। फिर यह भी समस्या है कि अदालतों में मुकदमे वर्षों तक चलते रहते हैं, जिससे गंभीर अपराधों के मामलों के बावजूद राजनीतिक वर्ग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अपराधों के बावजूद उनका सियासी कॅरियर बदस्तूर चलता रहता है। अदालती देरी के बारे में हर कोई जानता है, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि इसका लाभकारी प्रभाव असरदार आरोपी को ही मिलता है, वह जमानत लेकर अपनी सियासत ऐसे करते रहते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। इसके विपरीत यह है कि अगर कोई आरोपी गरीब व गैर-राजनीतिक है तो ट्रायल में देरी के कारण जेल में ही सड़ता रहता है। अधिकतर मामलों में ऐसा ही होता है। जबकि यह देखने में आता है कि अपराधिक मामलों का सामना कर रहे अनेक नेता अपनी रूटीन राजनीतिक गतिविधियों में लगे रहते हैं, चुनाव लड़ते हैं या पब्लिक ऑफिस सम्भाल रहे होते हैं।

Leave a comment