साहित्य को फैशनेबल लिबास बनाती साहित्यकारों की नई पीढ़ी

जागरूक टाइम्स 735 Nov 16, 2018

साहित्य को उत्पाद बनाने की कोशिशें भारतीय समाज में उदारीकरण और बाजार के हस्तक्षेप के साथ ही शुरू हो गई थीं। इन कोशिशों को लगभग तीन दशक बीत चुके हैं। हमें इस बात पर खुश होना चाहिए कि साहित्य को उत्पाद बनाने की ये कोशिशें अब सफल होती दिखाई पड़ रही हैं? हिन्दी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य पर यदि नजर डाली जाए तो कुछ ऐसी प्रवृतियां साफ तौर पर दिखाई पड़ती हैं, जिससे हमें भविष्य में हिन्दी साहित्य की एक धुंधली सी ही सही, लेकिन तस्वीर दिखाई पड़ती है।

पहले देखते हैं ये प्रवृत्तियां हैं क्या? आर्थिक उदारीकरण के बाद, या उससे कुछ समय पहले पैदा हुई पीढ़ी अब जवान हो चुकी है। इस पीढ़ी ने अन्य पेशों की तरह ही साहित्य में भी पुरजोर दस्तक दी है। लेकिन साहित्य लिखना इनके लिए कोई साधना या तपस्या नहीं है। साहित्य लिखना इनके लिए एक वैसा ही काम है, जैसे आप कंप्यूटर ठीक करते हैं, रेडियो या टीवी ठीक करते हैं। कहने का मतलब यह कि साहित्य लेखन को ये पीढ़ी एक तकनीकी काम ही मानकर चलती है। पढ़ी लिखी ये पीढ़ी बाजार को भी भरपूर अहमियत देती है। इनका मानना है कि बाजार को आप अनेदखा नहीं कर सकते।

लिहाजा यदि कोई किताब छपती है तो उसे बिकना भी चाहिए। किताबों के बिकने के वे तमाम तरीके अपनाए जाने चाहिए जो अन्य उत्पादों के बिकने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। ये नयी पीढ़ी किताबों की बिक्री के लिए हर वह तरीका अपना भी रही है। हालांकि फिर भी किताबें बिक रही हैं या नहीं यह कोई नहीं जानता। इस नई पीढ़ी ने लेखक और प्रकाशक के संबंधों को भी दोबारा परिभाषित किया है। बाजार के कथित दबावों के चलते ये लेखक अपनी किताबों के प्रकाशन के लिए खुद पैसा देने में गुरेज नहीं करते। इनका तर्क है कि प्रकाशक क्यों आप पर निवेश करे? आखिर वह बाजार में मुनाफा कमाने के लिए बैठा है।

चलिए अब प्रकाशकों की यह समस्या भी हल हो गई। अब न उन्हें निवेश करना है और न ही बेचने के लिए कोई प्रयास करना है। आप लेखक से ही पैसा लीजिए और किताब छाप दीजिए। किताब बेचने की जिम्मेदारी भी अब लेखक ही उठा रहा है। ऐसा नहीं है कि सभी लेखक पैसा देकर किताबें छपवा रहे हैं। लेकिन बिना कुछ निवेश किए प्रकाशक बने रहने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे बढ़ रही है। संभव है आने वाले तीस या पचास सालों बाद एक ऐसी स्थिति सामने आए, जिसमें केवल वही लेखक हो जिसकी जेब में पैसा है। आखिर बिना पैसे वाले लेखक को कोई क्यों छापेगा? प्रकाशक और लेखक इस नए संबंध में एक और दिलचस्प बात जुड़ गई है। अब प्रकाशक ही लेखकों को सुझाते हैं कि उन्हें क्या लिखना है।

लेखन अब प्रकाशकों के दिशानिर्देश पर ही हो रहा है। प्रकाशकों ने किताबों के व्यवसाय को पूरी तरह से जिंस के व्यवसाय में तब्दील कर दिया है। बाजार की जरूरतों को देखते हुए किताबों उसी तरह तैयार कराई जाती हैं, जिस तरह रेडीमेड पैंट्स या शट्र्स तैयार कराई जाती हैं। लप्रेक इसका एक जीता जागता उदाहरण है। जाहिर है ये प्रवृत्ति साहित्य को प्रोडक्ट में बदलने में एक अहम भूमिका निभा रही है। एक और आश्वर्यजनक प्रवृत्ति देखी जा रही है। लेखकों की यह नई नस्ल साहित्यिक इतिहास से वाकिफ होना नहीं चाहती। फणीश्वर नाथ रेणु, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, यशपाल, अज्ञेय, निर्मल वर्मा और निराला जैसे कालजयी रचनाकारों के बारे में नई पीढ़ी के लोग न जानते हैं और न ही जानना चाहते हैं।

जाने अनजाने ये लेखक साहित्य के इतिहास को उसी तरह खत्म कर देना चाहते हैं, जिस तरह राजनीति में भारत के इतिहास को समाप्त करने की पिछले कुछ सालों से लगातार कोशिशें हो रही हैं। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि युवा पीढ़ी को जब भी मैट्रो में, बस स्टॉप्स पर या पुस्तकालयों में पढ़ते देखते हैं तो उनके हाथों में हिन्दी की किताब न होकर अंग्रेजी की किताब होती है। अंग्रेजी की किताब पढऩे में कोई आपत्ति नहीं है लेकिन अंग्रेजीदां यह पीढ़ी हिन्दी पढऩे में अपनी तौहीन समझती है। हिन्दी में लेखन करने के बावजूद अधिकांश हिन्दी के ये नए लेखक दूसरे लेखकों की किताबें भी नहीं पढऩा चाहते। क्योंकि लेखन इनका ध्येय नहीं है। न ही इन लोगों का लेखन से कोई जुड़ाव है।

इनके लिए लेखन समाज में प्रतिष्ठित होने का जरिया मात्र है। या इनका लक्ष्य बॉलीवुड तक पहुंचना है। बॉलीवुड में आपके लिखे पर फिल्म बने इसमें भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। आपत्ति वहां से शुरू होती है, जब आप यह सोच कर लिखते हैं कि इस पर फिल्म बने। वर्तमान में साहित्य विरोधी दो धाराएं निरंतर अपना काम कर रहीं हैं। एक धारा यह प्रचार-प्रसार करने में लगी है कि अतीत में लिखा साहित्य गंभीर और न समझ आने वाला है। लिहाजा उसे क्यों पढ़ा जाना चाहिए। उसे समझने के लिए आप खुद को अपडेट करें, ऐसे प्रयास अमूमन कम ही दिखाई पड़ते हैं। आसान रास्ता यही है कि जो भी चीज आपकी समझ नहीं आ रही है, उसे खारिज करते चलें। नई नस्ल के अधिकांश लेखक यही कर रहे हैं।

ये वर्तमान में जीने वाली पीढ़ी अतीत को साथ लेकर नहीं चलना चाहती। इसका मानना है, 'जो कुछ है, वर्तमान ही हैÓ इसलिए यह पीढ़ी अपने समय के महान रचनाकारों को अप्रसांगिक मानने लगी है। इसकी ही एक उपधारा है सतही, मनोरंजनपूर्ण और सस्ते साहित्य को प्रचारित किया जाए। ऐसा किए जाने के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि ये रचनाएं अधिक संख्या में पढ़ी और पसंद की जाती है। पुराने दौर के भी ऐसा रचनाकारों को महान रचनाकार बनाने के प्रयास हो रहे हैं। इन धाराओं का सीधा सा गणित है कि आपकी तुलना गंभीर साहित्यकारों से नहीं होगी और सस्ते साहित्य से तुलना होने पर आप अपना अस्तित्व बचाए रख सकेंगे। बेस्ट सेलर इन धारणाओं को जमीन देने का काम कर रहा है।

एक और मजेदार बात यह भी है कि साहित्य की जो नई नस्ल तैयार हो रही है वह भी बाजार में दो चार साल ही रह पाती है। लगभग उसी तरह जिस तरह कोई भी नया फैशन कुछ समय बाद आउटडेटेड हो जाता है। यही नियम अब साहित्य पर भी लागू हो रहा है। दो चार सालों में ही चर्चित लेखकों की जगह नए लेखक सामने आते दिखाई पड़ते हैं। पुराने हाशिए पर चले जाते हैं। बाजार के अनुसार इन लेखकों की उम्र बहुत ज्यादा नहीं है। जरा कल्पना कीजिए यदि यही स्थिति पचास साल तक चलती रही तो हिन्दी का साहित्य कहां पहुंचेगा? ऐसा भी नहीं है कि साहित्य में गंभीर नहीं लिखा जा रहा। लेकिन उसे एक योजना के तहत हाशिये पर धकेला जा रहा है। लगता है कि हमने बाजार के अनुरूप ही साहित्य को भी एक उत्पाद के रूप में स्वीकार कर लिया है।



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